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Indore: इंदौर गौरव दिवस- कस्बे से महानगर बनने का सफर नर्मदा के बगैर नहीं था आसान
Wed, 29 May 2024 08:07 PM IST
अभिषेक चेंडके
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: अभिषेक चेंडके
Updated Wed, 29 May 2024 08:07 PM IST
सार
इंदौर कस्बे का उल्लेख 17 वीं शताब्दी में औंरगजेब की सनदों में मिलता है। 18 वीं शताब्दी में इंदौर एक सूबे का आकार ले चुका था। तब परगना कपेंल हुआ करता था। मराठा सरदारों के आने के बाद इंदौर का महत्व और बढ़ गया।
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पुरानेे इंदौर में साफ नदी बहती थी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
स्वच्छता के मामले में देशभर में अपनी खास पहचान बना चुके इंदौर का जन्मदिन 31 मई को है। शहरवासी इसे गौरव दिवस के रूप में मना रहे हैं। गुरुवार से ही शहर में आयोजन शुरू हो गए। इंदौर 17 वीं शताब्दी के शुरूआती दौर में एक कस्बा था। उसके महानगर बनने तक का सफर आसान नहीं था। इसमें शहर की प्यास बुझाने वाली नर्मदा जल परियोजना की अहम भूमिका है।
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इंदौर के आसपास कोई बड़ी नदी नहीं थी, लेकिन 70 किलोमीटर दूर बहने वाली मध्य प्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा इंदौर के लिए भी लाइफ लाइन साबित हुई। रोज नर्मदा नदी अपने तटबंधों को लांघ कर विंध्याचल के पर्वतों को पार कर शहरवासियों की प्यास बुझाने इंदौर आती है। यदि नर्मदा नदी का पहला चरण इंदौर नहीं आता तो 45 साल पहले ही इंदौर से पलायन शुरू हो जाता।
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औरंगजेब की सनदों में इंदौर का जिक्र
इंदौर कस्बे का उल्लेख 17 वीं शताब्दी में औरंगजेब की सनदों में मिलता है। 18 वीं शताब्दी में इंदौर एक सूबे का आकार ले चुका था। तब परगना कंपेल हुआ करता था। मराठा सरदारों के आने के बाद इंदौर का महत्व और बढ़ गया। इतिहासकारों के अनुसार इंदौर में एक इंद्रेश्वर मंदिर हुआ करता था। उसके नाम के कारण इंदौर को पहले इंद्रपुर, फिर इंदूर के नाम से पहचाना जाने लगा। बाद में शहर इंदौर हो गया।
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1932 में मल्हारराव को मिली जागीरी
सन 1932 को इंदौर की जागीरी मल्हारराव होलकर को मिली थी। इसके बाद दूसरे स्थानों व्यापारियों को इंदौर में बसने के लिए प्रेरित किया गया और धीरे-धीरे इंदौर का विकास हुुआ। वर्ष 1931 के सरकारी गजेटियर के अनुसार मराठा शासकों को इंदौर पसंद आने लगा। देवी अहिल्या बाई ने कार्यालय कंपेल से इंदौर स्थानांतरित कराया।
नदी के आसपास बसा शहर
कान्ह नदी के आसपास सबसे पहले बसाहट शुरू हुई। नर्मदा आंदोलन से जुड़े शिवाजी मोहिते बताते हैं कि 70 के दशक में इंदौर को भीषण जलसंकट झेलना पड़ा, क्योंकि इंदौर की बसाहट तो बढ़ गई, लेकिन जलस्रोत सीमित थे। इसके बाद शहरवासियों ने नर्मदा को इंदौर में लाने के लिए आंदोलन शुरू किया। एक माह तक लगातार चले आंदोलन का असर यह रहा कि तत्कालीन प्रदेश सरकार को नर्मदा का पहला चरण मंजूर करना पड़ा।
1978 में आई नर्मदा
वर्ष 1978 में नर्मदा जल इंदौर आया। इसके बाद इंदौर में उद्योग-धंधे और पनपने लगे। सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी के अनुसार यदि इंदौर में नर्मदा जल नहीं आता तो इंदौर का विकास अवरुद्ध हो जाता। वर्ष 2005 के बाद फिर इंदौर की प्यास बुझाने नर्मदा का तीसरा चरण आया। अब चौथे चरण की जरुरत महसूस की जा रही है।
आईटी, एज्यूकेशन हब में तब्दील इंदौर
इंदौर की पहचान पहले एज्यूकेशन हब के रूप में थी। यहां आईआईटी के साथ आईआईएम भी है। इंदौर में 100 से ज्यादा आईटी कंपनियां भी संचालित हो रही हैं। इंदौर के पास देश का पहला एसईझेड पीथमपुर में विकसित हो चुका है।
