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Devi Ahilya Birth Anniversary: अहिल्या बाई ने खुद युद्ध नहीं लड़ा, उनके राज में होल्कर सेना कोई जंग नहीं हारी

Fri, 30 May 2025 09:45 AM IST
Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Fri, 30 May 2025 09:45 AM IST
सार

देवी अहिल्या बाई कभी युद्ध मैदान में प्रत्यक्ष नहीं गईं पर उनके द्वारा सैनिकों में उत्साह का संचार करने और पूर्ण सहयोग करने से उनके कार्यकाल में हुए युद्ध या विवाद में वे हमेशा विजयी रहीं। यह उनकी दूरदर्शी नीतियों और कूटनीति का परिणाम था।

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Devi Ahilya Bai did not fight any war but during her rule the Holkar army did't lose any war
देवी अहिल्या की 300वीं जन्म जयंती पर विशेष - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवी अहिल्या बाई होल्कर राजवंश की धर्म और शांति प्रिय शासिका थीं। पूना के पेशवा का उन्हें पूर्ण संरक्षण और सहयोग रहता था। वे स्वयं शस्त्र कला में निपुण थीं। वे निडर और साहसिक होने के साथ कूटनीतिज्ञ भी थीं। देवी अहिल्या बाई अपनी शक्ति, ज्ञान और समय का उपयोग किसी को नष्ट करने में लगाने के बजाए लोगों की भलाई करने में लगाती थीं। ससुर मल्हाराव होल्कर के कार्यकाल के वक्त वे कूटनीतिज्ञ मंत्रणा में सम्मिलित होकर उन पर होने वाली चर्चाओं में भाग लेती थीं। इतिहास गवाह है कि देवी अहिल्या कभी स्वयं युद्ध मैदान में नहीं गईं पर उनके कार्यकाल में हुए युद्ध अथवा विवाद में वे हमेशा विजयी रहीं।
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रामपुरा के चंद्रावत को हराया
मंदसौर जिले के रामपुरा का एक अधिकारी चंद्रावत राजपूत उदयपुर घराने का प्रमुख व्यक्ति था। उसे होल्कर राज्य के मल्हारराव होल्कर की अधीनता से परेशानी थी, पर वह कुछ कर नहीं पाता था। मल्हार राव होल्कर के निधन के बाद मालेराव गद्दी पर बैठे, लेकिन उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा। जब 1767 में देवी अहिल्या बाई होल्कर राज्य की प्रमुख बनीं तो रामपुरा के चंद्रावत को लगा कि अब मौका है, इस महिला शासिका को आसानी से परास्त किया जा सकता है। चंद्रावत ने राजपूत राजाओं को भड़का कर अपने समूह में शामिल कर लिया। चंद्रावत ने कई सैनिकों को एकत्र कर निम्बाहेड़ा, जावद और आसपास के कई गांवों को घेर लिया। जब यह खबर देवी अहिल्या बाई को मिली तो उन्होंने अम्बाजीपंत को मुकाबला करने भेजा पर वे मारे गए। फिर अहिल्या बाई ने अब्बाजी रणछोड़ पागनीस को बड़ी फौज लेकर भेजा और आदेश दिया की विवाद करने वालो का मुकाबला करना। अहिल्या बाई ने कहा -'मेरी जरूरत लगे तो बताना, मैं युद्ध मैदान में आने को तैयार हूं। मैं भी युद्ध लड़ूंगी, पराजय स्वीकार मत करना।' 
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तीन माह चला रामपुरा का युद्ध
मंदसौर के समीप जनवरी से मार्च 1771 तक युद्ध हुआ, अहिल्या बाई की फौज ने बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और चंद्रावत और उसकी राजपूतों की फौज को पराजित कर दिया। इस युद्ध के बाद रामपुरा स्थाई रूप से होल्कर राज्य का अंग हो गया। इस युद्ध में विजय की सूचना जब नाना फडणवीस को मिली तो उन्होंने कहा-'अहिल्या बाई की धार्मिक प्रशंसा तो सुनी थी, पर मुझे यह नहीं मालूम था कि  वे इतनी वीर भी हैं कि राजपूतों को भी परास्त कर सकती हैं, उन्होंने देवी अहिल्या बाई के साहसपूर्ण कार्य की तारीफ कर उन्हें तोपों की सलामी दी।


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जयपुराधीश से विवाद में सिंधिया को हराया
जयपुराधीश यानी जयपुर रियासत से तत्कालीन शासन प्रमुख से कुछ रुपयों के लेनदेन का होल्कर और सिंधिया का विवाद था। जयपुराधीश के मंत्री दौलतराव ने इंदौर के होल्कर और ग्वालियर के शासक सिंधिया को पत्र लिखा कि दोनों का हम पर तकाजा है, हमारे पास इतनी राशि नहीं है कि हम दोनों का हिसाब कर सकें, पर जिसमें शक्ति हो वह हमसे पहले पैसा ले ले। इस जवाब के कारण होल्कर राज्य के तत्कालीन सेनापति तुकोजीराव प्रथम कुछ सैनिकों को लेकर निकले ही थे कि मार्ग में सिंधिया के सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया। यह बात तुकोजीराव ने देवी अहिल्या बाई तक पहुंचाई। होल्कर सेना के सैनिकों पर सिंधिया के हमले से अहिल्या बाई नाराज हो गईं। उन्होंने तुकोजीराव के पास 1800 सैनिक और पांच लाख रुपये खर्च हेतु तत्काल भिजवाए। साथ ही खबर भिजवाई कि यदि मेरी जरूरत लगे तो बताना मैं भी आने को तैयार हूं, इस जंग में भी होल्कर सेना की विजय हुई। इसी तरह 1788 में निम्बाहेड़ा में राजपूतों से हुए एक विवाद में देवी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा भिजवाई सेना की विजय हुई थी। 

हमेशा जीत हासिल की
जाहिर है देवी अहिल्या बाई कभी युद्ध मैदान में प्रत्यक्ष नहीं गईं पर उनके द्वारा सैनिकों में उत्साह का संचार करने और पूर्ण सहयोग करने से उनके कार्यकाल में हुए युद्ध अथवा विवाद में वे हमेशा विजयी रहीं, यह उनकी दूरदर्शी नीतियों और कूटनीति का परिणाम था।

 
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