{"_id":"6abf2e147a064210900195bf","slug":"gwalior-hc-says-obc-creamy-layer-cannot-be-decided-by-salary-alone-orders-fresh-review-in-6-weeks-2026-10-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"ग्वालियर: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केवल सैलरी से तय नहीं होगा ओबीसी क्रीमीलेयर, नए सिरे से जांच के आदेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ग्वालियर: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केवल सैलरी से तय नहीं होगा ओबीसी क्रीमीलेयर, नए सिरे से जांच के आदेश
Fri, 02 Oct 2026 09:37 AM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Fri, 02 Oct 2026 09:37 AM IST
सार
ग्वालियर हाईकोर्ट ने OBC क्रीमीलेयर को लेकर अहम स्पष्टता दी है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के बच्चे का क्रीमीलेयर तय करते समय केवल माता-पिता की सैलरी नहीं देखी जा सकती। सेवा पद, कैडर और पदोन्नति से जुड़े नियमों की भी जांच जरूरी है।
विज्ञापन
ग्वालियर हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण और क्रीमीलेयर के नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अभ्यर्थी के क्रीमीलेयर का निर्धारण केवल उसके माता-पिता के वेतन या सालाना आय को देखकर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति आनंद पाठक की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि क्रीमीलेयर तय करने के लिए केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सभी नियमों, माता-पिता के सेवा पद और पदोन्नति के समय की विस्तृत जांच करना अनिवार्य है।
विज्ञापन
उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने यह निर्णय रागिनी राठौर नाम की एक अभ्यर्थी के अन्य पिछड़ा वर्ग जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। याचिकाकर्ता के पिता मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में न्यायाधीश यानी जज के पद पर कार्यरत हैं और उनका सालाना वेतन 16.99 लाख रुपये है। याचिकाकर्ता ने सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से गैर-क्रीमीलेयर श्रेणी के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था।
विज्ञापन
वेतन के आधार पर आवेदन खारिज करने पर आपत्ति
राजस्व विभाग के अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उनके पिता की वार्षिक सैलरी 16.99 लाख रुपये है। अधिकारियों का तर्क था कि यह राशि क्रीमी लेयर के लिए तय आठ लाख रुपये की वैधानिक सीमा से काफी अधिक है। सक्षम प्राधिकारियों ने केवल वेतन के आंकड़ों को आधार मानकर अभ्यर्थी को क्रीमीलेयर की श्रेणी में डाल दिया और उसे आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया था।
विज्ञापन
राजस्व अधिकारियों के इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आनंद पाठक की पीठ ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने नियमों को समझने में भूल की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब बात सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों की आती है, तो क्रीमीलेयर का आकलन सिर्फ उनके बैंक खाते में आने वाली सैलरी या कृषि आय से नहीं होता।
ये भी पढ़ें: जबलपुर: बच्चे की कस्टडी पर हाईकोर्ट का अहम फैसला, जिला अदालत का आदेश रद्द, फैमिली कोर्ट में होगी सुनवाई
डीओपीटी दिशा-निर्देशों के तहत जांच का आदेश
न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने अपने फैसले में कहा कि इस संबंध में केंद्र सरकार और कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग के स्पष्ट दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं। सक्षम प्राधिकारियों को अभ्यर्थी के माता-पिता के सेवा स्तर, उनके पद और उस पद पर उनकी पदोन्नति किस तारीख या किस उम्र में हुई थी, इन सभी बातों पर बारीकी से जांच करना आवश्यक है। केवल वेतन पर्ची देखकर निर्णय लेना प्रशासनिक प्रक्रिया के विपरीत है।
उच्च न्यायालय ने अधिकारियों की तरफ से पूर्व में जारी किए गए दोनों निरस्तीकरण आदेशों को रद्द कर दिया है। इसके अलावा पीठ ने संबंधित सक्षम अथॉरिटी को सख्त निर्देश दिया कि वे छह सप्ताह के भीतर सभी नियमों को ध्यान में रखकर नया और न्यायसंगत आदेश पारित करें।
सरकारी सेवा में कार्यरत परिवारों को बड़ी राहत
अदालत के इस फैसले को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह फैसला उन सभी युवाओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिनके माता-पिता न्यायिक सेवा, प्रशासनिक सेवा या अन्य सरकारी विभागों में कार्यरत हैं और जिनकी सालाना आय आठ लाख रुपये की सीमा को पार कर जाती है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के नियमों के अनुसार सरकारी कर्मचारियों के मामले में क्रीमीलेयर का निर्धारण उनके पद, जिसमें प्रथम वर्ग या द्वितीय वर्ग अधिकारी की श्रेणी और पदोन्नति की उम्र शामिल है, के आधार पर होता है, न कि केवल उनकी सैलरी को जोड़कर।
