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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Dussehra Without Ravana Burning: Vidisha Village Worships Him as Deity, Offering the First Wedding Invitation

दशहरे पर यहां नहीं होता रावण दहन: लंकापति को मानते हैं इष्टदेव, शादी का पहला न्यौता भी रावण बाबा को

Mon, 19 Oct 2026 11:43 AM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, विदिशा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, विदिशा Published by: प्रिया वर्मा Updated Mon, 19 Oct 2026 11:43 AM IST
सार

इस गांव में दशहरे पर रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि ग्रामीण उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। गांव के प्राचीन परमारकालीन मंदिर में रावण बाबा की करीब 12 फीट लंबी प्रतिमा विराजमान है। विजयादशमी पर यहां रामायण पाठ और महाभंडारे का आयोजन होता है।

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Dussehra Without Ravana Burning: Vidisha Village Worships Him as Deity, Offering the First Wedding Invitation
यहां नहीं होता रावण दहन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विजयादशमी पर जहां पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानकर रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में स्थित रावण गांव में आस्था का अनूठा रूप दिखाई देता है। इस गांव में दशहरे पर रावण दहन नहीं किया जाता और न ही पटाखों की गूंज सुनाई देती है। यहां के ग्रामीण रावण दहन को देखना अथवा करना बेहद अशुभ मानते हैं।

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स्थानीय निवासियों के लिए रावण कोई जलाया जाने वाला पुतला नहीं, बल्कि वे उन्हें अपने ग्राम देवता और इष्ट देव के रूप में पूजते हैं। गांव के लोग लंकापति को अत्यंत श्रद्धा के साथ रावण बाबा कहते हैं और हर मांगलिक कार्य की शुरुआत उनका पूजन करके ही करते हैं।
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प्राचीन परमारकालीन मंदिर
गांव के मध्य में परमारकालीन प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर में रावण बाबा की लगभग 12 फीट लंबी भव्य प्रतिमा विश्राम मुद्रा में विराजमान है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह-शाम पूर्ण विधि-विधान से आरती और पूजा-अर्चना की जाती है। गांव में जब भी कोई नया वाहन खरीदा जाता है अथवा विवाह या अन्य कोई धार्मिक अनुष्ठान होता है, तो सबसे पहले रावण बाबा का पूजन होता है। 
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विवाह तय होने पर शादी का पहला निमंत्रण पत्र रावण बाबा को ही अर्पित किया जाता है। इसके बाद प्रतिमा की नाभि में तेल चढ़ाकर ही शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रावण बाबा के आशीर्वाद के बिना कोई भी मांगलिक कार्य निर्विघ्न संपन्न नहीं हो सकता।

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खुद को लंकापति का वंशज मानते हैं ग्रामीण
गांव के लोगों का रावण बाबा के प्रति जुड़ाव इतना गहरा है कि यहां के ब्राह्मण परिवार स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं। गांव के युवा अपनी गाड़ियों पर जय लंकेश लिखवाते हैं और अपने शरीर पर भगवान लंकेश के चित्र व टैटू बनवाना पसंद करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में रावण बाबा ने इसी स्थान पर आकर एक शक्तिशाली दैत्य का घमंड चूर किया था और फिर विश्राम मुद्रा में स्थापित हुए थे। इसी कारण इस गांव की पहचान रावण गांव के रूप में बनी। ग्राम रावण और बमोरी के सरपंच प्रतिनिधि राजेश धाकड़ बताते हैं कि गांव की पहचान इस प्राचीन प्रतिमा से ही है। गांव का कोई भी व्यक्ति न तो रावण दहन देखने बाहर जाता है और न ही गांव में दहन होता है।


दशहरे पर भव्य आयोजन और महाभंडारा
दशहरे के दिन पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता है। इस दिन गांव का हर व्यक्ति, चाहे वह काम के सिलसिले में बाहर रहता हो, मंदिर आकर पूजन में शामिल होता है। विजयादशमी पर मंदिर प्रांगण में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और विशेष महाभंडारे का आयोजन किया जाता है। 

रावण बाबा मंदिर के पंडित नरेश तिवारी बताते हैं कि रावण बाबा प्राचीनकाल से यहां विराजमान हैं और पूरा गांव उनकी छत्रछाया में निवास करता है। आने वाले भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं। ग्रामीण गोविंद नारायण तिवारी का कहना है कि शादी के समय सबसे पहले तेल-हल्दी का न्योता बाबा को चढ़ाया जाता है। दशहरे पर विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और महाप्रसाद ग्रहण करने के लिए आते हैं।

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