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3 पदों के लिए M.P कांग्रेस में उठा-पटक
जयप्रकाश पाराशर/भोपाल
Updated Fri, 13 Dec 2013 11:39 AM IST
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मध्य प्रदेश कांग्रेस में अब तीन पदों- विधानसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और प्रदेशाध्यक्ष के लिए उठापटक शुरू हो गई है।
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पिछली बार कांग्रेस ने तीनों पदों को जातीय समीकरण के हिसाब से बांटा था। लेकिन इस बार मेरिट के आधार पर पद दिए जाने की मांग उठ रही है, जबकि दूसरा खेमा चुनाव कराने पर जोर दे रहा है। अब गेंद आलाकमान के पाले में पहुंच गई है।
नेता प्रतिपक्षः परंपरा के मुताबिक विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को जाता है। चुरहट से जीतकर आए अजयसिंह पहले भी नेता प्रतिपक्ष थे। नेता प्रतिपक्ष रहते हुए उन्होंने शिवराज के खिलाफ चार्जशीट बनाई, मॉक विधानसभाएं लगाईं और शिवराज की पत्नी साधना सिंह पर निशाने साधे, जिन्हें मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत मानकर मुकदमा भी लगाया।
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फिर भी कांग्रेस की सीटें घटकर 58 पर आ गईं। माना जा रहा है कि उनके विरोध को जनता ने स्वीकार नहीं किया। उन्हें दिग्विजय सिंह गुट में माना जाता है। प्रदेशाध्यक्ष पद पर पहले ही दिग्विजय समर्थक कांतिलाल भूरिया हैं, इसलिए यह पद किसी और को जा सकता है।
अटेर से चुनाव जीते फायरब्रांड नेता सत्यदेव कटारे का दावा मजबूत है। सिंधिया समर्थक कटारे को विधानसभा में उत्कृष्ट विधायक का पुरस्कार भी मिला है।
पार्टी ने उन्हें पांच बार विधानसभा टिकट दिया, जिसमें से कटारे ने चार चुनाव जीते हैं। इस बार जिस तरह की भाजपा लहर थी, उसमें भी कटारे ने 11,000 से ज्यादा मार्जिन से जीत दर्ज की है।
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भाजपा बिलकुल नहीं चाहेगी कि सत्यदेव कटारे को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए। वरिष्ठता के हिसाब से भी वह 1985 में विधायक बन गए थे। पार्टी ने 1990 में टिकट नहीं दिया। जब 1993 में टिकट दिया तो वह जीत गए। पार्टी ने 1998 में टिकट नहीं दिया, लेकिन 2013 में बड़े मार्जिन से जीत दर्ज की।
सिंधिया समर्थक महेंद्र सिंह कालूखेड़ा का नाम भी लिया जा रहा है। ग्वालियर-चंबल से ही दिग्विजय समर्थक दो वरिष्ठ विधायक केपी सिंह और डॉ. गोविंदसिंह भी मुकाबले में हैं। कुछ लोगों का तर्क है कि जीतू पटवारी जैसे नौजवान को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए, जो मालवा में भाजपा की लहर के बावजूद जीतकर आया, लेकिन अनुभवहीनता उनके खिलाफ जाती है।
विधानसभा उपाध्यक्षः पिछली बार तो कांग्रेस ने जातीय समीकरण बैठाने के लिए ठाकुर हरबंस सिंह को उपाध्यक्ष बनाया था। एक थ्योरी कांग्रेस में यह चल रही है कि विधानसभा उपाध्यक्ष बनाने के लिए मौजूदा विधायकों में से चुनाव करा लिया जाए। विधायकों की पसंद के आधार पर विधानसभा उपाध्यक्ष बनाया जाए।
दूसरा खेमा इसका विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि दिग्विजय सिंह-अजय सिंह खेमे के विधायकों की संख्या ज्यादा है, क्योंकि ज्यादा टिकट भी उन्हें ही मिले थे, इसलिए सारे पद उन्ही के कब्जे में चले जाएंगे। इसलिए हाईकमान को मेरिट के आधार पर निर्णय करना चाहिए। दिग्विजय समर्थक केपी सिंह का नाम वरिष्ठता के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष बनाने के लिए लिया जा रहा है।
प्रदेशाध्यक्षः खबर तो यह है कि कांतिलाल भूरिया इस्तीफा देने दिल्ली पहुंच गए लेकिन कांग्रेस आलाकमान को अभी ऐसा कोई नेता दिखाई नहीं दे रहा है जिसे प्रदेशाध्यक्ष बनाया जा सके। लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं। इसलिए दो संभावनाएं बनती हैं। कांतिलाल भूरिया को ही लोकसभा चुनाव तक बनाया रखा जाए। अरुण यादव जैसे युवा नेता को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया जाए।
लोकसभा चुनाव तक यदि कांतिलाल भूरिया को ही बनाए रखा जाता है तो कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को देखते हुए बाद में कई नेता प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।
फिलहाल कांग्रेस में एक ऐसे नेता को प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की मांग तेज हो गई है, जो संगठन को नए सिरे से ताकतवर बना सके और बड़ी संख्या में युवाओं को सामने ला सके।
