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MP News: मौत का समय अब और सटीक जान पाएंगे विशेषज्ञ, एम्स में फॉरेंसिक अपडेट पर आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण
Sat, 22 Nov 2025 03:07 PM IST
संदीप तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Sat, 22 Nov 2025 03:07 PM IST
सार
एम्स भोपाल में आयोजित दो दिवसीय ‘फॉरेंसिक अपडेट–VIII’ में देशभर के विशेषज्ञ एक मंच पर जुटे, जहां मृत्यु के बाद बीते समय का निर्धारण करने वाली आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों पर गहन चर्चा और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण दिया गया।
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एम्स भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
किसी भी आपराधिक मामले में मौत कब हुई-यह जांच का सबसे अहम सवाल होता है। इसी सवाल का वैज्ञानिक जवाब और अधिक सटीक रूप से खोजने के लिए एम्स भोपाल में 21-22 नवंबर को देशभर के फॉरेंसिक विशेषज्ञ जुटे। संस्थान में ‘फॉरेंसिक अपडेट–VIII’ के नाम से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में उन आधुनिक तकनीकों पर खास फोकस रहा, जिनसे मृत्यु के बाद बीते समय (टाइम-सिंस-डेथ) का निर्धारण पहले से कहीं अधिक सटीक किया जा सकेगा।
देशभर से जुटे 70 से ज्यादा विशेषज्ञ
कार्यशाला में विभिन्न मेडिकल संस्थानों के 70 से अधिक फॉरेंसिक विशेषज्ञ, फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और पीएचडी स्कॉलर शामिल हुए। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. माधवानंद कर के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. रजनीश जोशी, डीन (एकेडमिक्स), ने किया। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ फॉरेंसिक विशेषज्ञ प्रो. डॉ. बी.पी. दुबे और डॉ. डी.एस. बड़कुर भी मौजूद रहे।
सड़ चुके, जले या दफन शवों में भी समय पता लगाने की तकनीकें
कार्यशाला में बताया गया कि मृत्यु के समय का पता लगाना अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर तब जब शव सड़ चुका हो, जला हो, पानी में रहा हो,विकृत हो चुका हो,या दफन मिले। ऐसे मामलों में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकें जैसे फॉरेंसिक एंटोमोलॉजी, पोस्ट-मॉर्टम रेडियोलॉजी, बायोकेमिकल और मेटाबोलिक मार्कर्स, जीनोमिक्स, प्रोटीओमिक्स और माइक्रोबायोलॉजी जांच को बेहद सटीक बना देती हैं। इन सभी उन्नत विषयों पर विशेषज्ञों ने विस्तृत सत्र लिए।
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यह भी पढ़ें-फैशन डिजाइनर ने AIG राजेश मिश्रा पर ठगी और शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए, जांच शुरू
प्रैक्टिकल ट्रेनिंग रहा आकर्षण का केंद्र
कार्यशाला का सबसे बड़ा आकर्षण था प्रतिभागियों को दिया गया प्रैक्टिकल प्रशिक्षण। इसमें डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने खुद आधुनिक उपकरणों का उपयोग करते हुए यह सीखा कि सटीक बायोकेमिकल बदलाव कैसे रिकॉर्ड किए जाते हैं, कीटों की मौजूदगी से मृत्यु का समय कैसे समझा जाता है,रेडियोलॉजी मृत्योत्तर जांच में कैसे मदद करती है, और आणविक स्तर पर शरीर में होने वाले परिवर्तन मृत्यु का समय कैसे बताते हैं। इससे प्रतिभागियों को वास्तविक अपराध जांच जैसी परिस्थितियों में काम करने का अनुभव मिला।
यह भी पढ़ें-राजधानी भोपाल में लगातार हो रहीं वारदातें, वाइसरॉय कॉलोनी में 4 युवकों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा
फॉरेंसिक शिक्षा को नई दिशा
लगातार आठ वर्षों से आयोजित हो रहा फॉरेंसिक अपडेट अब देश में फॉरेंसिक साइंस की शिक्षा और कौशल विकास का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। एम्स भोपाल का कहना है कि इस तरह के प्रशिक्षण से न्यायिक प्रक्रिया और अपराध जांच दोनों में वैज्ञानिक सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
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देशभर से जुटे 70 से ज्यादा विशेषज्ञ
कार्यशाला में विभिन्न मेडिकल संस्थानों के 70 से अधिक फॉरेंसिक विशेषज्ञ, फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और पीएचडी स्कॉलर शामिल हुए। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. माधवानंद कर के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. रजनीश जोशी, डीन (एकेडमिक्स), ने किया। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ फॉरेंसिक विशेषज्ञ प्रो. डॉ. बी.पी. दुबे और डॉ. डी.एस. बड़कुर भी मौजूद रहे।
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सड़ चुके, जले या दफन शवों में भी समय पता लगाने की तकनीकें
कार्यशाला में बताया गया कि मृत्यु के समय का पता लगाना अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है, खासकर तब जब शव सड़ चुका हो, जला हो, पानी में रहा हो,विकृत हो चुका हो,या दफन मिले। ऐसे मामलों में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकें जैसे फॉरेंसिक एंटोमोलॉजी, पोस्ट-मॉर्टम रेडियोलॉजी, बायोकेमिकल और मेटाबोलिक मार्कर्स, जीनोमिक्स, प्रोटीओमिक्स और माइक्रोबायोलॉजी जांच को बेहद सटीक बना देती हैं। इन सभी उन्नत विषयों पर विशेषज्ञों ने विस्तृत सत्र लिए।
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प्रैक्टिकल ट्रेनिंग रहा आकर्षण का केंद्र
कार्यशाला का सबसे बड़ा आकर्षण था प्रतिभागियों को दिया गया प्रैक्टिकल प्रशिक्षण। इसमें डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने खुद आधुनिक उपकरणों का उपयोग करते हुए यह सीखा कि सटीक बायोकेमिकल बदलाव कैसे रिकॉर्ड किए जाते हैं, कीटों की मौजूदगी से मृत्यु का समय कैसे समझा जाता है,रेडियोलॉजी मृत्योत्तर जांच में कैसे मदद करती है, और आणविक स्तर पर शरीर में होने वाले परिवर्तन मृत्यु का समय कैसे बताते हैं। इससे प्रतिभागियों को वास्तविक अपराध जांच जैसी परिस्थितियों में काम करने का अनुभव मिला।
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फॉरेंसिक शिक्षा को नई दिशा
लगातार आठ वर्षों से आयोजित हो रहा फॉरेंसिक अपडेट अब देश में फॉरेंसिक साइंस की शिक्षा और कौशल विकास का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। एम्स भोपाल का कहना है कि इस तरह के प्रशिक्षण से न्यायिक प्रक्रिया और अपराध जांच दोनों में वैज्ञानिक सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
