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मध्यप्रदेश: बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद सीएमएचओ हटाए गए, डिंडौरी से डॉ. मनोज पांडेय संभालेंगे जिम्मेदारी

Wed, 02 Sep 2026 09:48 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Wed, 02 Sep 2026 09:48 PM IST
सार

बालाघाट में बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच सरकार ने सीएमएचओ बदल दिया है। डिंडौरी के सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडेय को बालाघाट की जिम्मेदारी दी गई है।

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Madhya Pradesh: CMHO removed following children's deaths in Balaghat; Dr. Manoj Pandey from Dindori takes over
सीएमएचओ डॉ. परेश उपलव को हटाया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बालाघाट में बच्चों की मौत और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सरकार ने जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को बदल दिया है। डिंडौरी के सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडेय को बालाघाट की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि डॉ. परेश उपलव को पद से मुक्त किया जाएगा। बता दें कि अमर उजाला ने 28 अगस्त को ‘मई में दो बच्चों की मौत, फिर भी नहीं जागा सिस्टम; सीएमएचओ बोले-1500 गांव अकेला नहीं जा सकता, कल बालाघाट जाएंगे सीएम’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। खबर में बच्चों की मौत के बाद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए गए थे। साथ ही यह मुद्दा भी उठाया गया था कि डॉ. परेश उपलव को जिला टीकाकरण अधिकारी के पद से हटाए जाने के बावजूद उन्हें सीएमएचओ की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया गया। ऐसे में अब नए सीएमएचओ की पदस्थापना को बालाघाट की स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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बता दें बालाघाट के बैहर और बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौत के मामले ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए। जिले में  29 बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई है, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में मौत का आकड़ा कम हैं। मलेरिया, खसरा और कुपोषण को बच्चों की बीमारी और मौत की प्रमुख वजहों में बताया गया है।  मला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की टीमें प्रभावित गांवों में पहुंचीं। जिला मलेरिया अधिकारी और जिला टीकाकरण अधिकारी को जिम्मेदारी से हटाया जा चुका है। अब सरकार ने सीएमएचओ डॉ. परेश उपलव को भी हटाकर डिंडौरी के सीएमएचओ डॉ. मनोज पांडेय को बालाघाट की जिम्मेदारी दी है। 
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इस पूरे मामले में मई की घटनाएं भी अहम हैं। मई में ही दो बच्चों की मौत हो गई थी। इसके बाद जून-जुलाई में बच्चों के बीमार होने और मौत के मामले बढ़े। ऐसे में सवाल उठे कि मई में खतरे की शुरुआती जानकारी मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी के कारणों की पहचान और रोकथाम के लिए समय रहते बड़े स्तर पर कदम क्यों नहीं उठाए। टीकाकरण को लेकर भी सवाल हैं। जिले में पिछले दो-तीन वर्षों में बच्चों का टीकाकरण करीब 60 से 70 प्रतिशत ही रहने की बात सामने आई है।  
 
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