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India Vs Bharat: 'हमारा तो प्रांत ही मध्य भारत है, भारत नाम पर हमसे ज्यादा खुश कौन होगा'

Wed, 06 Sep 2023 04:57 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: दिनेश शर्मा Updated Wed, 06 Sep 2023 04:57 PM IST
सार

जी20 सम्मेलन के आमंत्रण में प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखे जाने को लेकर बहस छिड़ गई है। देश का नाम इंडिया के बजाय सिर्फ भारत रखने के पक्ष और विपक्ष में तमाम दलीलें दी जा रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि उस समय का मध्य प्रदेश इस पर क्या सोचता था?

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India Vs Bharat: 'Our province is Central India, who will be happier than us in the name of India'
संविधान समिति के सदस्य राम सहाय तिवारी। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत बनाम इंडिया को लेकर छिड़ी बहस में इतिहास का वह पन्ना भी सामने आना जरूरी है कि आज के मध्य प्रदेश और तब के मध्य भारत की सोच क्या थी? संविधान सभा में मध्य भारत के प्रतिनिधि के तौर पर राम सहाय ने भाग लिया था। उन्होंने भी देश का नाम भारत रखे जाने की पैरवी की थी। उन्होंने यह तक कह दिया था कि हमारा तो प्रांत ही मध्य भारत है, देश का नाम भारत होने पर हमसे ज्यादा खुश कौन होगा।
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संविधान सभा में 18 सितंबर 1949 को संविधान के उस हिस्से पर बहस हुई थी, जिसमें देश का नामकरण होना था। इस  इस दौरान मध्य भारत के प्रतिनिधि राम सहाय ने भी भारत की पैरवी की थी। उन्होंने कहा था कि भारत नाम हमें खुशी देता है। नामकरण के प्रस्ताव पर राम सहाय ने उसका समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि सदन में जब हिंदी के सवाल पर चर्चा हुई, तब मैंने कहा था कि मध्य भारत संघ का हिस्सा रहे ग्वालियर में पचास साल से हिंदी हमारी राजभाषा है। मुझे इस सदन में यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि अप्रैल 1948 में ही ग्वालियर, इंदौर और मालवा के संघों ने खुद को मध्य भारत कहना शुरू कर दिया था। इस बात की हमसे ज्यादा खुशी किसे हो सकती है कि जिस आधार पर हमने अपने प्रांत का नाम मध्य भारत रखा है, उस आधार पर देश का नाम भारत रखा जाए। जैसा कि सेठ गोविंद दास को भी लगता है कि यह नाम हमें खुशी देता है। 
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नामकरण तो पहले ही हो जाना था
राम सहाय ने यह भी कहा था कि प्राचीन परंपराओं के अनुसार नामकरण संस्कार सबसे पहले होता है। हालांकि, आधुनिक व्यवहार में जब हम विधेयक या कानून पर चर्चा करते हैं तो पहले अनुच्छेद (आर्टिकल) पर यानी नाम पर चर्चा सबसे आखिर में करते हैं। परंपरा के अनुसार हमने संविधान के ज्यादातर अनुच्छेदों पर विचार कर लिया है। इसके बाद ही हम पहले अनुच्छेद पर चर्चा कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि देश का नाम भारत हो। हमारे धार्मिक ग्रंथों में और तमाम हिंदी साहित्य में देश को भारत ही कहा गया है। हमारे नेता भी इस देश को अपने भाषणों में भारत कहकर ही पुकारते हैं। 
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खुशी है कि बिना विरोध के नाम स्वीकार हुआ
सहाय ने कहा था कि कुछ समय के लिए महसूस हुआ कि इस नाम से कुछ परेशानियां आ सकती हैं। यह मेरे लिए खुशी की बात है कि हम देश का नाम बिना किसी विरोध के भारत के तौर पर स्वीकार कर रहे हैं। वह लोग जिन्हें अछूत, शेष भारत से अलग माना गया, उन्हें भी भारत का हिस्सा माना जाएगा। उन्हें इससे अधिक खुशी नहीं हो सकती कि संविधान को आकार देते समय उनके मुद्दों पर भी समानता के साथ चर्चा की गई। आज भी जब देश का नाम तय होना है, वे भी उसी उत्साह से इसमें शामिल हैं जैसे अन्य राज्यों और प्रांतों के लोग हैं। 


कौन थे राम सहाय तिवारी?
संविधान सभा में मध्य भारत के प्रतिनिधि राम सहाय तिवारी एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समाज सुधारक थे। खजुराहो से तीन बार सांसद रहे राम सहाय तिवारी कांग्रेस नेता थे। विंध्य प्रदेश और छतरपुर प्रांत के प्रमुख पदों पर रहे तिवारी को पांच बार जेल भी जाना पड़ा था। अस्थायी लोकसभा के सदस्य रहे और फिर पहली और दूसरी लोकसभा के भी सदस्य रहे। 
 
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