बकस्वाहा के जंगल नहीं होंगे स्वाहा: एनजीटी ने लगाई रोक, शिवराज की बढ़ी मुसीबत, मेधा मैदान में
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संकल्प लिया है कि वे रोज अपनी दिनचर्या की शुरुआत एक पौधा लगाकर करेंगे। लेकिन इन दिनों प्रदेश का ही एक जंगल उनके लिए मुसीबत बनते हुए दिखाई दे रहा है। पर्यावरणप्रेमी छतरपुर के बक्सवाहा के जंगल को बचाने के लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं। हालांकि एनजीटी ने हीरा खनन परियोजना पर रोक लगा दी है।
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नर्मदा बचाओ आंदोलन के बाद मध्यप्रदेश सरकार के लिए अब छतरपुर जिले के बक्सवाहा का जंगल नई मुसीबत बन गया। पर्यावरण प्रेमियों ने राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार को चुनौती देते हुए कहा है कि अगर सरकार जंगल के एक भी पेड़ को हाथ लगाती है तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे। राज्यभर में जल्द ही नर्मदा बचाओं आंदोलन की तर्ज पर पर्यावरण बचाने को लेकर नया आंदोलन शुरु करने की तैयारी की जा रही है। बढ़ते विवाद के बीच गुरुवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) भोपाल ने हीरा खदानों के लिए पेड़ काटने पर रोक लगा दी है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने अमर उजाला से चर्चा करते हुए कहा, 'मुझे लगता है कि बक्सवाहा का जंगल बचेगा। वहां के आदिवासियों, स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और सभी पर्यावरणप्रेमियों के साथ आज पूरा मध्यप्रदेश खड़ा है।' मेधा पाटकर ने कहा कि एनजीटी द्वारा जंगल की कटाई पर रोक लगाने के फैसले से सभी खुश है। एनजीटी और कई सरकारी संस्थाएं पर्यावरण की रक्षा के लिए बनी है,लेकिन ये सभी राजनीतिकरण का शिकार हैं। जब लोग पर्यावरण के लिए आवाज उठाते है तो फिर ये संस्थाएं रोक लगाने का काम करती है।
सीएम पहले नर्मदा घाटी में लगाए पेड़ बताएं: मेधा पाटकर
शिवराज के रोज एक पौधा लगाने के संकल्प पर यह कहा
सीएम शिवराज सिंह चौहान के हर दिन एक पेड़ लगाने के संकल्प पर मेधा पाटकर ने कहा कि आज शिवराज भले ही रोज एक पौधा लगा रहे हो लेकिन आज के नेताओं की जो उपभोगवादी जीवन प्रणाली है वो एक दिन में दस से ज्यादा पेड़ खा जाती है।
60 हजार करोड़ के हीरे हैं बकस्वाहा के जंगल में
बकस्वाहा के जंगल में कई तरह के पेड़ है। यहां सागौन, बबूल, केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा और अर्जुन समेत कई दुर्लभ प्रजाति के पेड़ मौजूद हैं। ये पेड़ और इनसे मिलने वाली लकड़ियां यहां के लोगों की आजीविका है। 2017 में जियोलॉजी एंड माइनिंग मध्य प्रदेश और रियो टिंटो कंपनी की रिर्पोट में बताया गया था कि यहां पर बहुतायत में वन्य जीवों का निवास है। इसमें मोर, हिरण, नीलगाय, बंदर, खरगोश, रिजवा, जंगली सुअर, लोमड़ी, भालू, चिंकारा, वन बिल्ली आदि पाए जाते है।
बताया जाता है कि बकस्वाहा जंगल के अलावा पन्ना में भी हीरे के भंडार मौजूद हैं। यहां करीब 22 लाख कैरेट हीरे हैं। जबकि बकस्वाहा के जंगल में इससे कहीं ज्यादा 3 करोड़ 42 लाख कैरेट हीरे का भंडार मौजूद है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 60 हजार करोड़ रुपये है।
लाखों वन्य जीवों पर पड़ेगा असर
इससे इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ेगा। कंपनी को इन पेड़ों को काटने की भी अनुमति के बाद ही पर्यावरणविदो ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था। माना जा रहा है कि अगर यह प्रोजेक्ट सफल रहा तो यह एशिया की सबसे बड़ी हीरा खदान बन सकती है। हालांकि इस परियोजना से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर चिंताएं पूरे देश में पर्यावरणविदों द्वारा उठाई जा रही हैं।
विकास के नाम पर पर्यावरण हो रहा बर्बाद
बक्सवाहा जंगल बचाओ अभियान के सदस्यों ने अमर उजाला से कहा, इस प्रोजेक्ट से करीब 17 गांव प्रभावित होंगे। बुंदेलखंड की पथरीली माटी में से एक-एक कंकड़ बीनकर हमारे पूर्वजों ने इसे खेती लायक बनाया। ऐसे में दो लाख पेड़ों की कटाई ठीक नहीं है। बात सिर्फ दो लाख पेड़ों की नहीं है उन जंगलो में रहने वाले हजारों पशु-पक्षियों की भी है। इसके अलावा बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे के लिए दो लाख पेड़ और केन-बेतवा लिंक परियोजना से 23 लाख पेड़ प्रभावित होंगे। यदि बुंदेलखंड में पर्यावरण का इसी तरह दोहन होता रहा तो हमारी आने वाली नस्लें बर्बाद हो जाएंगी।
ये कहा है एनजीटी ने
गुरुवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण भोपाल ने छतरपुर जिले के बक्सवाहा में संरक्षित वन क्षेत्र में 2.15 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने के संबंध में लगी दो याचिकाओं सुनवाई की। इन याचिकाओं पर एनजीटी ने निर्देश दिया कि वन विभाग की अनुमति के बगैर एक भी पेड़ न काटा जाए। अधिकरण ने वन संरक्षण कानून 1980 का पालन कराने, टीएन गोधावर्मन कमेटी की गाइडलाइन का अनुसरण करने और भारतीय वन अधिनियम 1927 के नियमों के तहत कार्रवाई करने के लिए भी कहा है। इस मामले पर सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है। अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।
क्या है मामला
- मप्र सरकार ने 20 साल पहले छतरपुर के बक्सवाहा में बंदर प्रोजेक्ट के तहत एक सर्वे शुरू किया था।
- दो साल पहले सरकार ने इस जंगल की नीलामी की थी, जिसे आदित्य बिड़ला ग्रुप के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने खनन के लिए खरीदा।
- हीरा भंडार वाली 62.64 हेक्टेयर जमीन को मध्यप्रदेश सरकार ने इस कंपनी को 50 साल के लिए लीज पर दिया है।
- कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा है। कंपनी का तर्क है कि बाकी 205 हेक्टेयर जमीन का उपयोग खदानों से निकले मलबे को डंप करने में किया जाएगा।
- कंपनी इस प्रोजेक्ट में 2500 करोड़ रुपये का निवेश करने जा रही है।
- 382.131 हेक्टेयर के इस क्षेत्र के जंगल कटने से 40 से ज्यादा प्रकार के दो लाख 15 हजार 875 पेड़ों को काटना होगा।