फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   bhoal gas tragedy_gas miyan

'गैस मियां' को गैस कांड की बरसी से मतलब नहीं

Tue, 03 Dec 2013 02:24 PM IST
ऋषि पांडे
ऋषि पांडे Updated Tue, 03 Dec 2013 02:24 PM IST
विज्ञापन
bhoal gas tragedy_gas miyan

नाम- 'गैस मियां'। पता- यूनियन कार्बाइड के सामने वाली राजगढ कॉलोनी। उम्र- 29 साल। जन्म- दो और तीन दिसंबर 1984 की आधी रात के वक्त, इसी दिन यूनियन कार्बाइड के कारखाने से गैस का रिसाव हुआ था। काम- मजदूरी। बीमारी- कई, मसलन सांसें तेज चलना, आंखों के आगे अंधेरा छाना, खांसी, चक्कर आदि-आदि।

विज्ञापन


यह परिचय है उस शख्स का जिसने पहली बार जब दुनिया का दीदार करने के लिए आंखे खोली थी तब भोपाल का मंजर खौफजदा था। चारों तरफ बदहवासी का आलम था। सब भागे जा चले जा रहे थे।
विज्ञापन


आधे से ज्यादा शहर इस बात से बेखबर था कि आखिर माजरा क्या है। भीड-भाड भरे रास्तों पर सब एक दूसरे को धकियाते हुए भागे चले जा रहे थे।

किसी को किसी की फिक्र न थी। फिक्र थी तो बस खुद की जान बचाने की। 'गैस मियां' का परिवार तब यूनियन कार्बाइड कारखाने से लगी राजगढ कॉलोनी में रहता था।

उस वक्त के माहौल का जिक्र करते हुए गैस मियां कहते हैं, "अम्मी बताती हैं कि गैस फैलने की बात जब पता चली तो वे दो बहनों के साथ घर के बाहर निकली और जिधर राह दिखी उस और चल दी। अब्बा एक बहन को लेकर अम्मी से बिछड गए। आगे चल कर अम्मी को एक ट्रक मिला। उसमें उन्होंने दोनों बहनों को चढाया।"
विज्ञापन
विज्ञापन


वो आगे कहते हैं, "लोगों से ठसाठस भरे ट्रक में अम्मी भी सवार हो गईं। ट्रक जब रुका तब इनको पता चला कि ये लोग शहर से बाहर मंडीदीप आ गए हैं। मंडीदीप पहुंचने के घंटे भर बाद अस्पताल में मेरा जन्म हुआ। अब्बा को तो मोहल्ले वालो ने बताया कि आपका परिवार ट्रक में गया है। अगले दिन वे ढूंढते-ढूंढते वहां पहुंच पाए।"
तकलीफें बहुत सारी

मंडीदीप भोपाल से लगा एक औद्योगिक क्षेत्र है जोकि भोपाल से कोई 18 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

मौत के खौफनाक मंजर से रूबरू डरे सहमे लोग खासतौर से यूनियन कार्बाइड से लगे इलाके के लोग बैरागढ, बीएचईएल टीटी नगर तो गए ही, साथ ही कई लोग आस-पास के शहरों की ओर भी कूच कर गए थे। गैस मियां का परिवार भी उन्हीं डरे सहमे लोगों में से एक था।

गैस मियां को ये नाम कैसे मिला, इस सवाल पर वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, "असली नाम तो इकबाल था लेकिन गैस राहत विभाग वाले मेरे पैदा होने के दिन को देखकर मुझे गैस मियां कहने लगे। अब तो सब मुझे इसी नाम से पुकारते हैं।"

वो कहते हैं, "बचपन में बहुत सारे लोग मुझे देखने आते थे। लोगों को लगता था कि जब गैस ने इतने सारे लोगों को मार डाला तो यह जिंदा कैसे बच गया।"

गैस मियां को गैस कांड की बरसी से खास लेना-देना नहीं है। वे मजदूरी करते हैं। उनसे मुलाकात भी ईंटखेडी गांव के अंदर सडक बना रहे मजदूरों की टोली के साथ हुई। यहां पर वो डामर पिघलाने का काम कर रहे थे। इस टोली में वे अपनी पत्नी पप्पी बी के साथ मजदूरी करते हैं।

गैस मियां का कहना है कि बुरी चीज को क्या याद करना। वे खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं कि गैस ने उनके किसी परिवार वाले या नाते रिश्तेदार को उनसे नहीं छीना। "हां, तकलीफें बहुत सारी दे गई ये गैस।"
गैस के कारण

उन्होंने गिनाना शुरू किया, "अम्मी की तबीयत बहुत खराब रहती है। उनका पेट बार-बार फूल जाता है। उनसे कोई काम नहीं हो पाता। जरा सा चल लें तो सांसें तेज हो जाती हैं। गैस कांड के पहले तक तो वह बहुत काम करती थीं। गैस कांड के बाद तकलीफों के बावजूद वह बैठे काम कर लेती थीं। मंडी से केले सेव फल लाकर वह बेचती थी जिससे चार पैसे तो मिलते थे।"

वो आगे कहते हैं, "अब तो अम्मी से कुछ नहीं होता। अब्बा का भी यही हाल है। वो तो फिर भी कुछ-कुछ कर लेते हैं। बहनें अपने अपने ससुरालों में हैं पर सब गैस से मिली बीमारियों की वजह से परेशान रहती हैं। गैस के कारण मुझसे भी ज्यादा काम नहीं हो पाता लेकिन क्या करें। तीन बच्चों और मां-बाप को देखते हुए काम तो करना ही पडता है।"

गैस मियां अपनी तकलीफें बताते हैं, "मेरी भी आंखें लाल रहती हैं। सांस फूलने की शिकायत भी है। काम के दौरान यदि थोडा सुस्ता लूं तो उठते वक्त चक्कर आते हैं। आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है।"

क्या डॉक्टर को बताया कभी? इस सवाल पर वे कहते हैं, "हां, डॉक्टर का कहना है कि यह सब गैस के कारण हो रहा है।"

वे सफाई देते हैं, "मेरा भले ही जन्म नहीं हुआ था लेकिन अम्मी ने तो भागते-भागते गैस खाई थी। उसका असर मुझ पर हुआ और अब मेरे बच्चों पर भी हो रहा है।"

वो बताते हैं, "बीच वाला लडका सूखी लकडी की तरह पतला है। उसके पैर की उंगलियां चिपकी हुई हैं। बहुत इलाज कराया लेकिन कोई फर्क नहीं पडा।"
मुकददर से कौन जीता?
कुछ पैसा वगैरह मिला? इस सवाल पर उनका जवाब था, "हां, दो बार 25-25 हजार रुपए मिले थे। उसके बाद कुछ नहीं मिला।"

इस सवाल पर कि क्या कभी अपना जन्म दिन मनाया? गैस मियां कहते हैं, "कभी नहीं।" गैस कांड की बरसी की कुछ यादें हैं क्या? गैस मियां कहते हैं, "बचपन में तो इस दिन हम पुतले वगैरह जलाते थे। बडे हुए तब से मजदूरी करने लग गए।"

वो बताते हैं, "एक दिन भी घर नहीं बैठ सकते। एक दिन के काम के 300 रुपए और पत्नी को 200 रुपए रोज मिलते हैं। तीन लडके हैं जिनमें से दो सरकारी स्कूलों में पढ रहे हैं।"


बच्चे किस कक्षा में पढते हैं, ये गैस मियां को ठीक से याद नहीं था। सोचते-सोचते वे बताते हैं, "बडा वाला शायद तीसरी में है।"

गैस कांड नहीं होता तो क्या जिंदगी बेहतर होती? इस सवाल पर उनका जवाब था, "हो भी सकता था। हम पढ लिख जाते तो कोई नौकरी-वौकरी लग जाती।" फिर ठंडी सांस छोडते हुए गैस मियां कहते हैं, "पर साहब मुकददर से कौन जीत पाया है आज तक?"

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed