उज्जैन: एक साल बाद खुला नागचंद्रेश्वर मंदिर का कपाट, कोरोना की वजह से पहली बार भक्तों को नहीं मिला प्रवेश
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हिंदू धर्म में नागों की पूजा करने की परंपरा सदियों से चला आ रही है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
इस साल भक्तों को नहीं मिला प्रवेश
इस साल भी उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर में नाग पंचमी के दिन मंदिर का कपाट खुला, लेकिन सिर्फ मंदिर के पुजारी ने पूरे विधि-विधान से पूजा की। कोरोना महामारी के चलते इस साल भक्तों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।
जानकारी के मुताबिक, ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर के शीर्ष पर स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट नागपंचमी के लिए एक साल बाद शुक्रवार मध्यरात्रि खोले गए। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरीजी महाराज के सान्निध्य में भगवान नागचंद्रेश्वर की पूजा-अर्चना की गई। कोरोना संक्रमण की वजह से 300 साल में पहली बार भक्तों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया है।
नेपाल से उज्जैन लाई गई थी मूर्ति
नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में भगवान शंकर, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं।
