देखिए, बेटियों के लिए कितना सुरक्षित है लखनऊ
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तब से 730 दिन बीत चुके हैं। दिल्ली में 16 दिसंबर को ‘बिटिया’ से हैवानियत के खिलाफ पूरा लखनऊ एक बेटी के लिए सड़कों पर उतर पड़ा था।
हमने आवाज तो बुलंद की लेकिन बेटियों के लिए शहर का माहौल सुरक्षित नहीं बना सके। उस हैवानियत के बाद दो साल में शहर में 114 बेटियां दुष्कर्म की शिकार हो चुकी हैं। 85 दहेज के लिए मारी जा चुकी हैं। न वह घर में सुरक्षित है, न घर से बाहर।
आज फिर वही तारीख है। 16 दिसंबर। यही दिन है यह जानने का कि दो साल पहले ‘हैवानियत’ के खिलाफ आक्रोशित लखनऊ का माहौल बेटियों के लिए कितना सुरक्षित है? बेटियों के प्रति लोगों की सोच कितनी बदली है?
यह जानने के लिए अमर उजाला ने सोमवार को अपनी वूमन रिपोर्टर्स को फील्ड में भेजा। हमारी रिपोर्टर एक आम लखनवी की तरह घर से अकेले निकली। इस दौरान अदब के शहर की जो तस्वीर सामने उभरी, वह वाकई किसी डरावने सफर से कम नहीं थी। हालात को जानें उन्हीं के शब्दों में...
टैंपो वाला नजदीक आने की कोशिश कर रहा था
समय- दोपहर 2:40
पॉलिटेक्निक चौराहे पर टैंपो का इंतजार कर रही थी। जान-बूझकर ऐसी जगह खड़ी हुई जहां ट्रैफिक पुलिस थी। मैंने खुद को सुरक्षित मान लिया। एक टैंपो रुका। पूछा- कहां जाना है?
जवाब देने से पहले ही सटकर खड़ा होने की कोशिश करने लगा। उसे धकियाया, पीछे हटी। पहले ही अनुभव ने डरा दिया।
आप क्या कर सकते हैं, जब टैंपो वाला ही आपके सामने कुछ ऐसा कर जाए जिसके लिए उसको थप्पड़ भी नहीं मारा जा सकता और जिसे सामान्य हरकत समझकर अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। आसपास खड़े लोग ऐसे घूर रहे थे जैसे कोई फिल्म देख रहे हों। मजे ले रहे हों।
'लड़की हो तो क्या पूरी बस खरीद ली है।
समय-शाम 4:15
हजरतगंज शहर का सबसे हैपनिंग प्लेस है। यहां से चारबाग के लिए बस में चढ़ी। मेरे साथ कैमरामैन भी था। गेट के राइट हैंड पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर कुछ पुरुष बैठे थे। एक महिला अपने किसी परिजन के साथ बस में खड़ी थी। उसके पास पीछे से आए कुछ लड़कों ने भीड़ बढ़ानी शुरू कर दी।
उनसे बचने के लिए धीरे-धीरे वह कोने में दुबकती चली गई। किसी तरह उसने खुद को सीटों के बीच एडजस्ट किया। हुसैनगंज के पास बस कुछ खाली हुई तो सामने की सीट पर बैठी कुछ लड़कियों के बीच जा बैठी। इनमें से एक अनु विश्वकर्मा ने बताया कि लड़कियों की सीट पर बैठे लड़कों को उठाने की कोशिश की तो जवाब मिला, ‘लड़की हो तो क्या पूरी बस खरीद ली है?’
दूसरी लड़की शिवानी ने बताया कि बगल में अधेड़ बैठा हो तो वह भी कोहनी मारता है। पहले लगता है शायद भीड़ की वजह से ऐसा किया होगा, लेकिन जब यह बार-बार होता है तो अहसास हो जाता है कि जानबूझकर किया जा रहा है।
'वे घूर रहे थे मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी'
समय-शाम 5:30 बजे
चारबाग के पास रेलवे स्टेशन से आती भीड़। उन्हें ढोने को तैयार टेंपो, ऑटो और सिटी बसों का जमावड़ा। मैं वहां थोड़ी देर खड़ी रही। जीआरपी भी थी और पुलिस भी। लोग घूर रहे थे।
मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी। तब लौटने के लिए मैंने सिटी बस का इंतजार करने का फैसला किया। वहां खड़ी रही तो ऐसा लगा कि लोग मुझे मनोरंजन की तरह ले रहे हैं। ऐसे घूर रहे थे मानो मेरा वहां खड़ा होना कोई अपराध है।
मुझे घबराहट होने लगी। फिर लगा कुछ भी तो नहीं बदला। आज 16 दिसंबर है तो माहौल भी उस दिन जैसा ही। अगर मेरे साथ कैमरा टीम नहीं होती तो शायद मैं वहां एक सेकंड भी रुकने की हिम्मत नहीं कर पाती।
एक भी लड़की नहीं दिखी कहीं सड़क पर
स्थान: हजरतगंज, अशोक मार्ग, कैसरबाग, चारबाग
समय-रात 11 बजे
माहौल में ही डर है। रात 11 बजे हैं, और यह बात बेहद डरा रही है कि एक भी लड़की, एक भी महिला, यहां तक की एक भी महिला पुलिस सड़कों पर नजर नहीं आई।
चाहे हजरतगंज हो या फिर अशोक मार्ग, कैसरबाग या चारबाग, सभी जगहों पर केवल मैं ही अकेली लड़की हूं, जो इस वक्त वहां खुले में मौजूद है। कुछ पुरुष पुलिसकर्मी नजर आए। मान सकती हूं कि वे सुरक्षा के लिए ही तैनात होंगे पर वे इसका एहसास नहीं करा पा रहे।
अगर महिला पुलिस कर्मी ड्यूटी पर मिलती तो शायद ऐसा नहीं लगता। बहुत संभव है कि कुछ और लड़कियां भी घर से अकेले निकलने का सोच पातीं।
शुक्र है पहुंच ही गई घर
समय-रात 12:30
गुडनाइट... टेक केयर
देर रात काम से या यात्रा से अकेले लौटने वाली लड़कियों और महिलाओं के सामने कैसे डर और चुनौतियां सामने आ सकती है, इसे समझने के लिए मैंने चारबाग से अपने घर डालीबाग आने का निर्णय किया। चारबाग पहुंच घर जाने के लिए कैब का इंतजार करने लगी। कैब नहीं दिखी तो कुछ आगे बढ़ गई।
आगे रोशनी कम होने की वजह से घबराहट बढ़ रही थी। रुक कर इंतजार करना मुनासिब लगा। लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि अकेले खड़ा रहना और भी मुश्किल है। रास्ते से गुजर रहा हर शख्स पलट कर देखता। कुछ देर बाद एक गाड़ी रुकी और कार सवार निकलकर असहज करने वाली बातें करने लगे।
मैंने वहां से दूर हो जाना ही बेहतर समझा। इसी बीच बाइक रुकी और बाइक सवार वहीं खड़ा हो गया। वहां से निकलने को जैसे आगे बढ़ी तभी दो लोग कार से आए और पूछने लगे कि मैडम कोई परेशानी है क्या? एकबारगी लगा कि वे सभ्य हैं, हो सकता है सचमुच मदद करना चाहते हों, लेकिन मैं उन्हें अपनी परेशानी नहीं बता पाई। शायद अवचेतन में ही अविश्वास की बात बैठ गई थी।
लड़कियों के स्कूल के आसपास सादे कपड़ों में रहेगी पुलिस
महिलाओं से संबंधित अपराध सामाजिक समस्या बन गए हैं। छेड़खानी व दुष्कर्म पर अंकुश लगाने के ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। लड़कियों के स्कूल के आसपास सादे कपड़ों में पुलिस की ड्यूटी लगाने के साथ सीसीटीवी कैमरे से भी शोहदों पर नजर रखने की तैयारी चल रही है।
एसएसपी यशस्वी यादव ने बताया कि पूरे शहर में पांच हजार सीसीटीवी कैमरे लगाने का लक्ष्य है। इससे लूट, चोरी व अन्य अपराधों पर अंकुश लगने के साथ महिलाओं की भी हिफाजत होगी। पुलिस कंट्रोल रूम में मुस्तैद टीम लड़कियों के स्कूल खुलने व छुट्टी के समय विशेष नजर रखेगी।
शोहदों को चिह्नित करके कुछ दूरी पर मौजूद पुलिस टीम को सूचना दी जाएगी और चंद मिनट में शोहदा गिरफ्त में होगा। फिलहाल महिला कॉलेजों के आसपास पुलिस की मोबाइल टीम मौजूद रहती है। इसके साथ सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाने के निर्देश दिए गए हैं। छेड़खानी या दुष्कर्म की शिकायत को तुरंत संज्ञान में लेकर कार्रवाई की जाती है।
टैंपो, ऑटो व सिटी बसों पर भी नजर
शहर में टैंपो-ऑटो के चालकों के सत्यापन का अभियान चलाया जा चुका है। चालकों को सुरक्षा के टिप्स दिए गए हैं। इसके अलावा चारबाग, कैसरबाग, अमीनाबाद, चौक, पॉलीटेक्निक चौराहा व अन्य खास टैंपो स्टैंडों पर सूर्यास्त के बाद चौकसी बढ़ाने के थाना प्रभारियों को आदेश दिए गए हैं।
लखनऊ में महिला अपराध 2014
दुराचार : 59 दुराचार हो चुके हैं
- हर छठे दिन एक बेटी से दुराचार
छेड़छाड़ : 147 लड़कियों ने लिखवाई रिपोर्ट
- 147 द्वारा हिम्मत की गई, इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है ताकि पुलिस तक शिकायत पहुंचे और कार्रवाई हो।
दहेज हत्या : 46 बेटियों की मौत का कलंक
- हर आठवें दिन एक बेटी दहेज के लालची परिवारों की भेंट चढ़ रही है।
भद्दे कमेंट्स व टिप्पणियां : 19
- इतने कम मामलों में एफआईआर होना बताता है कि आवाज बुलंद करने और सख्ती की आज भी कितनी जरूरत है।
लखनऊ में महिला अपराध : 2013
महिलाओं पर अपराध
- 1431 गंभीर अपराध हुए महिलाओं के साथ
- 4 महिलाओं से हर रोज गंभीर अपराध
- प्रमुख शहरों में लखनऊ आठवां
दुराचार : 55 महिलाओं से दुराचार किया गया
- देश के प्रमुख शहरों में 25वां स्थान
अपहरण : 270 अपहरण लखनऊ में किए गए
- मुंबई से ज्यादा अपहरण
दहेज हत्याएं : 39 विवाहिताएं दहेज की बलि चढ़ीं लखनऊ में
- हर नवें दिन एक बली
घरेलू हिंसा : 802 महिलाओं ने घरेलू हिंसा के मामले दर्ज करवाए
- देश में 7वें स्थान पर लखनऊ
दुराचार के प्रयास 261 मामले दर्ज हुए
- हर हफ्ते 5 बनीं शिकार
1090 पर हर रोज आ रही हैं शिकायतें
- 85 महिलाएं और लड़कियां शिकायत कर रहीं हर रोज
- 62 हजार हैरेसमेंट की शिकायतें दर्ज हुईं।
- 11,179 शिकायत करने वाली कामकाजी महिलाएं और युवतियां
- 18,501 हाउस वाइव्स हैं
- 32,349 स्कूल-कॉलेज की छात्राएं
(आंकड़ों का स्रोत: 2014 : लखनऊ पुलिस 15 दिसंबर 2014 तक 2013 : एनसीआरबी)
महिलाएं भी हों जागरूक
अप्रिय वारदात से बचने के लिए महिलाओं को भी जागरूक होना पड़ेगा। मसलन, किसी स्थान पर शोहदों द्वारा फब्तियां कसकर, मोबाइल पर एसएमएस या कॉल से छेड़खानी पर तुरंत 100 नंबर डॉयल करके पुलिस कंट्रोल रूम या वीमेन पॉवर लाइन 1090 को सूचना दें।
टैंपो, ऑटो या सिटी बस में सवार होने से पहले उसका नंबर नोट कर लें, ताकि चलते वाहन में कुछ गड़बड़ नजर आने पर पुलिस को सूचना देने में आसानी रहे।
समाज का भी सहयोग जरूरी
छेड़खानी सामाजिक समस्या है। ऐसे में स्वयं सेवी संगठनों व जागरूक नागरिकों को भी आगे आना चाहिए। कहीं भी अराजक तत्वों का जमघट या छेड़खानी होते देखकर 100 नंबर डायल करके पुलिस को सूचना देने में कोताही न करें।