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महिला दिवस विशेष: जिनके हौसलों को एवरेस्ट ने भी किया सलाम

Tue, 08 Mar 2016 02:46 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 08 Mar 2016 02:46 AM IST
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अरुणिमा सिन्हा - फोटो : amar ujala
कश्ती लहरों से लड़ती हुई आगे बढ़ जाती है
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एक कदम बढ़ाओ, हिम्मत खुद हिमालय चढ़ जाती है...

यही फलसफा है उन बेटियों की जिनके हौसलों को एवरेस्ट भी सलाम करता है। ये बेटियां विषम परिस्थितियों में घबराती नहीं। उनका इरादा इतना बुलंद है कि पर्वतारोहण जैसे खतरनाक और जोखिम वाले काम को भी वे आसानी से अंजाम देने लगी हैं।

एक-दो बार नहीं, कई बार... पहाड़ों को चुनौती देने का उनका जज्बा बढ़ता ही जा रहा है। महिला दिवस पर आज ऐसी बेटियों के अदम्य साहस के बारे में बता रही हैं रोली खन्ना..।
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अरुणिमा सिन्हा (एक पैर से एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला)

तारीख : 21 मई 2013
समय : 10.55 मिनट
स्थान : माउंट एवरेस्ट

जिंदगी की जंग जीत ली, पहाड़ क्या चीज है...

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अरुणिमा की कहानी लोगों के लिए प्रेरणा का सबब है - फोटो : amar ujala

यह वहीं तारीख है जब एक चट्टान सी इरादों वाली लड़की महज एक पैर से माउंट एवरेस्ट फतह कर जाती है। अरुणिमा की कहानी लोगों के लिए प्रेरणा का सबब है। न तो माउंट एवरेस्ट की राहें सपाट थीं और न ही अरुणिमा के लिए जिंदगी... पर दम जीतने के बाद ही लिया।

आखिर इतना हौसला आया कहां से? अरुणिमा कहती हैं, ‘मेरा पैर सिर्फ चलने के लिए लगाया गया था, लेकिन मैं उससे एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए निकल पड़ी थी। रास्ते में एक समय ऐसा आया कि पैर अलग हो गया।

किसी तरह घिसटते हुए, एक हाथ में कृत्रिम पैर और दूसरे हाथ में रोप लिए, आगे बढ़ी। पर मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। ऑक्सीजन खत्म हो गई। पर भरोसा था ‘मुझे जीतना है’। ...और मैं जीत गई।’

पैर कट गया, हौसले ने दी ताकत

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अरुणिमा को अपना एक पैर ट्रेन हादसे में गंवाना पड़ा - फोटो : amar ujala
कभी वालीबॉल खिलाड़ी रहीं अरुणिमा को अपना एक पैर ट्रेन हादसे में गंवाना पड़ा। जमाने ने हजारों लांछन लगाए। कभी चरित्र पर अंगुली उठाई तो कभी कायर बता खुदकुशी की कोशिश करने का आरोप लगाया।

खामोशी से सब सुना और सहा। न जवाब दिया न किसी पर आरोप मढ़ा। अब जो कुछ था हौसला ही था। इसी की बदौलत दुनिया की ऐसी पहली महिला पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल हुआ जिसने एक पैर से एवरेस्ट फतह किया।

रुकना मुझे मंजूर नहीं
अरुणिमा की जिद है दुनिया के सातों महाद्वीप की ऊंची चोटियों को फतह करना। पांच पर तिरंगा फहरा चुकी हैं। बस अंटार्कटिका और इंडोनेशिया की सबसे ऊंची चोटी को फतह करना बाकी है। अरुणिमा कहती हैं कि सब ठीक रहा तो दिसंबर तक अंटार्कटिका के लिए निकलूंगी। फिलहाल स्पोर्ट्स अकादमी खोलने में जुटी हुई हूं।
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दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का इरादा

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अपर्णा कुमार - फोटो : amar ujala
नाम- अपर्णा कुमार (आईपीएस)

तारीख : अगस्त 2014
समय : सुबह 7 बजे
स्थान : माउंट किलिमंजारो, तंजानिया

आईपीएस अफसर का चैलेंजिंग कॅरिअर के अपर्णा कुमार ने पर्वतारोहण को अपना शगल बना लिया है। वह दुनिया के सातों महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराना चाहती हैं। कहती हैं कि मुरादाबाद में नौंवी बटालियन पीएसी में तैनाती के बाद पहली बार पर्वतारोहण के विषय में जाना। मन में पर्वत को जानने की जिज्ञासा पैदा हुई। तय कर लिया कि मैं खुद एवरेस्ट तक जाऊंगी।

खुद को तैयार करने के लिए मनाली के अटल बिहारी वाजपेई इंस्टीट्यूट ऑफ माउटेनरिंग जॉइन किया। यहां 2013 में बेसिक और 2014 में एडवांस ट्रेनिंग कोर्स करने के बाद मुझमें इतना आत्मविश्वास आ गया कि मैं किसी भी एक्सपीडिशन का हिस्सा बनने के लिए तैयार थी।

डर कभी लगा ही नहीं
अपर्णा बताती हैं कि आईपीएस की टफ ट्रेनिंग करके आई थी। इसके बाद मनाली में माउनटेनरिंग कोर्स किया था। इससे जो थोड़ा बहुत डर रह गया था, वह भी निकल गया। पहला एक्सपीडिशन दक्षिण अफ्रीका केतंजानिया में सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो थी। एक पल को भी कहीं नहीं लगा कि मैं ये नहीं कर सकती।

भूकंप ने दहला दिया था हमें
पिछले साल नेपाल में आए भूकंप के दौरान घिरने वाले पर्वतारोहियों में अपर्णा कुमार भी शामिल थीं। कहती हैं कि हम सब एक जगह इकट्ठा हो गए थे और एक पल के लिए भी हमारी नजर नहीं झपकी। क्योंकि पल-पल मौत का खतरा मंडरा रहा था। अगले दिन पांच बजे हम निकले, लेकिन ऑफ्टरशॉक के चलते चलना तक मुश्किल था। उस वक्त मौत काफी करीब नजर आई थी, लेकिन जिजीविषा मजबूत थी।

अब बारी एवरेस्ट फतह की
पांच महाद्वीप की सबसे ऊंची तक पहुंच चुकीं अपर्णा अब एवरेस्ट से मुलाकात के लिए बैचेन हैं। बस कुछ ही दिन शेष हैं। अप्रैल में उनका एवरेस्ट एक्सपीडीशन शुरू होगा।

स्क्वाड्रन लीडर से बन गईं माउंटेनियर

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अपर्णा कुमार - फोटो : amar ujala

तूलिका रानी--पर्वतारोही

तारीख - 9 अगस्त 2009
समय - 12 बजे दिन
स्थान : माउंट स्टोक कांगड़ी, लेह

दस साल तक वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर रहकर देश के लिए जांबाज तैयार करने वाली तूलिका रानी अब पर्वतारोही के रूप में दुनिया की 14 खतरनाक चोटियों को फतह करना चाहती हैं।

2012 में माउंट एवरेस्ट को जीतने वाली तूलिका दिसंबर 2015 में वायुसेना से रिटायर हुई। इसके बाद वे पूरा समय पर्वतरोहण को दे रही हैं। हाल ही में उन्होंने अफ्रीका महाद्वीप की किलिमंजारो चोटरी पर तिरंगा फहराया है। वे एशिया के सबसे बड़े ज्वालामुखी माउंट डामा (इराक में) तक जा चुकी हैं।

वे कहती हैं कि पर्वतारोहण के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर मजबूत होना जरूरी है। यह मजबूती एक -दो दिन में नहीं, बल्कि लगातार कोशिश कठिन मेहनत से हासिल होती है।

नजरें खतरनाक चोटियों पर

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तूलिका रानी - फोटो : amar ujala

दुनिया की 14 सबसे ऊंची और खतरनाक मानी जाने वाली चोटियों तक पहुंचना। इनमें से पांच पाकिस्तान में है, वहां के लिए परमिशन लेना भी एक चुनौती है।

अगला अभियान जुलाई में : जम्मू में भारतीय साइड की एलओसी पर हिमालयन रेंज की सबसे ऊंची चोटी मां नून को फतह करना। इसकी ऊंचाई 7135 फीट है। सितंबर-अक्तूबर में वह 8201 की ऊंचाई पर स्थित नेपाल के माउंट छो यू तक जाने की योजना बना रही हैं।

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