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हमेशा बुझाई प्यास, अब खुद हो गए प्यासे
लखनऊ/ज्ञान सक्सेना
Updated Mon, 05 Aug 2013 02:13 AM IST
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रजवाड़ों व मुगलकालीन समय में कुएं और तालाब का निर्माण कराना राज्य का जनहित से जुड़ा एक अहम कार्य माना जाता था।
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धनवान व्यक्ति भी गरीबों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कुआं खुदवाने के कार्य को पुण्य मानते थे, लेकिन वर्तमान में बेतहाशा बढ़ते शहरीकरण व अनियोजित विकास के चलते राजधानी में कुओं का वजूद लगभग खत्म होने की कगार पर है।
आज से दस साल पहले राजस्व अभिलेखों में दर्ज 27 सौ से अधिक कुओं में से 26 सौ कुएं अपना वजूद खो कर इतिहास बन चुके हैं।
पेयजल क्षमता के साथ वर्तमान में करीब सवा सौ कुएं ही दूरदराज के इलाकों में बचे हैं। राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी भी मानते हैं कि अगर सार्थक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में ये शेष बचे कुएं भी इतिहास के पन्नों में दर्ज नजर आएंगे।
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वैवाहिक रस्म में जरूरी कुआं पूजन
हिंदू रीति रिवाज में इन कुओं का अपना अलग ही वैदिक महत्व है। वैवाहिक रस्म में दूल्हा बनने से पूर्व कुआं पूजन की परंपरा आज भी अनिवार्यता के साथ पूरी की जाती है।
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परिवर्तन बस इतना आया है कि पहले वर की मां अपने आंचल की छांव में दूल्हे को लोकगीत गाते हुए कुएं पर ले जाकर चक्कर लगवाती थी। वहीं, अब कुओं के खत्म होते वजूद के कारण घरों में ही पानी की बाल्टी भर कर औपचारिकता पूरी करनी पड़ती है।
सूखे की तैयारियों ने उजागर की हकीकत
अभिलेखों के अनुसार, जिले में 2732 कुएं हैं, लेकिन वर्तमान में इनमें से 132 ही ऐसे कुएं बचे हैं जो पेयजल क्षमता से युक्त हैं। बाकी के 26 सौ कुओं या तो वजूद खो देने से पाट दिए गए हैं अथवा सूखे पड़े हैं।
शहरीकरण व विकास की चपेट में आए इन कुओं की रिपोर्ट बीते कुछ माह पहले तब सामने आई जब प्रशासन ने सूखे को लेकर जिले की सिंचाई और पेयजल व्यवस्था का संबंधित विभागों से ब्योरा तलब किया।
इस दौरान राजस्व अभिलेखों के आधार पर जो जानकारी उपलब्ध कराई गई। इससे खत्म होने की कगार पर खड़े कुओं के वजूद की हकीकत पता चली।
शहरी क्षेत्रों में इंदारा बने बचे कुएं
अधिकारियों की मानें तो पेयजल क्षमता वाले कुओं के बचे वजूद में से शहरी क्षेत्रों में मात्र दो से ढाई दर्जन तक कुएं ही आते हैं। इनमें से भी आधे का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।
बाकी बचे कुओं में भूगर्भ जल के गिरते स्तर से इनके स्वरूप को बदल कर इंदारा कुओं में तब्दील कर दिया गया है। इसके तहत पानी निकालने के लिए कुओं के मुहानों पर बड़ी मोटरें लगा कर पानी बाहर निकाला जाता है। ऊपरी तौर से इन्हें इस तरह कवर कर दिया जाता है कि बरसात का पानी इनमें न जाने पाए।
शहर में कालीचरन डिग्री कॉलेज के समीप , ठाकुरगंज में बाबा हजाराबाग इलाका चौक के अहिरी टोला और चौपटिया के कश्मीरी मोहल्ले में अभी भी इंदारा कुओं में तब्दील पुराने परंपरागत कुएं का स्वरूप देखा जा सकता है। जबकि शहर की कई पुरानी हवेलियों व मकानों में बने कुएं पाट कर पूरी तरह खत्म किए जा चुके हैं।
प्यास बुझा रहा संवत 1954 में बना कुआं
मेडिकल कॉलेज चौराहे के समीप छाछी मंदिर स्थित कुआं राजधानी में सबसे पुराना कुआं माना जाता है।
हालांकि राजस्व अभिलेखों में इसका कोई जिक्र नहीं है, लेकिन शहर के बुजुर्ग निवासियों की माने तो यह कुआं संवत 1584 के पूर्व वजूद में आया था।
पहले इसे बंजारों वाला कुएं के नाम से जाना जाता था। उस समय महाराज का कमंडल कुएं में गिर गया। जब उसे निकाला गया तो उसमें छाछ भरी मिली। इसके बाद इस इलाके को छाछी मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
इसी कुएं से हनुमान जी की बारह भुजाओं वाली मूर्ति भी निकली थी जो आज भी मंदिर में स्थापित है। वर्तमान में इसको पाटकर पंप लगा इंदारा कुएं का स्वरूप दे दिया गया है।
भूजल की माप था अमीनाबाद का कुआं
अमीनाबाद थाना परिसर में स्थित कुआं आज भी पुराने लखनऊ में भूजल स्तर की माप का पैमाना माना जाता है।
इसी कुएं के भूमिगत जलस्तर की माप के आधार पर बीते कई सालों तक भूगर्भ जल विभाग के लोग जमीन के नीचे पानी की घटती बढ़ती माप को तय करने में इस्तेमाल करते थे।