वक्फ बोर्ड विवादः अरबों की सम्पत्ति के लिए हो रहा 'खेल'
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प्रदेश में वक्फ की अरबों-खरबों रुपये की संपत्ति है। इन पर नेताओं से लेकर धर्मगुरुओं तक की निगाह लगी रहती है। ये लोग वक्फ बोर्ड में अपने लोगों को शामिल कराकर वक्फ की बेशकीमती संपत्तियों को बेच देते हैं।
यही कारण है कि अरबों की बेशकीमती जमीन होने के बावजूद वक्फ बोर्ड घाटे में चल रहे हैं। समय-समय पर ये सरकार से अनुदान भी मांगते रहते हैं।
दरअसल, वक्फ संपत्तियों पर शिया व सुन्नी वक्फ बोर्डों का नियंत्रण होता है। इस कारण सरकार इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर पाती।
ज्यादातर वक्फ संपत्तियों में विवाद
शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के चुनाव कराए जाते हैं। इनमें राज्य से इन समुदायों के दो-दो सांसद, दो-दो विधायक, कानूनी मामलों के दो-दो जानकार और एक लाख रुपये से अधिक की आय वाले वक्फ के दो मुतवल्ली बतौर सदस्य चुने जाते हैं।
इसमें अपने-अपने गुट के लोगों को वक्फ बोर्ड में पहुंचाने के लिए राजनीति होती है। प्रदेश में 1.30 लाख वक्फ संपत्तियों में से ज्यादातर में विवाद चल रहा है। आए दिन वक्फ संपत्तियों पर अवैध कब्जे बढ़ते जा रहे हैं।
कई स्थानों पर तो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधक (मुतवल्ली) ही जमीनों को बेचकर वहां अवैध कब्जे करवा रहे हैं। वक्फ अधिनियम 1995 के तहत वक्फ संपत्तियों का खरीदना व बेचना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद पूरे प्रदेश में यह खेल हो रहा है।
तो इसलिए नहीं हट पाते अवैध कब्जे
अपर महाधिवक्ता जफरयाब जिलानी कहते हैं कि वक्फ संपत्तियों पर से अवैध कब्जे हटवाने का काम वक्फ बोर्ड के सीईओ का होता है, लेकिन पिछले 12 वर्षों में छह साल से अधिक समय तक सुन्नी वक्फ बोर्ड में सीईओ ही नहीं रहे हैं।
जो रहे भी उन्होंने कभी अवैध कब्जे हटाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। बढ़ते अवैध कब्जों की दूसरी वजह मुतवल्ली हैं। ये भी ट्रिब्यूनल व हाईकोर्ट में ढंग से पैरवी नहीं करते हैं।
इसके अलावा अवैध कब्जे हटाने के लिए वक्फ अधिनियम की धारा 54, 55 में जो व्यवस्था दी गई है, उसमें वक्फ बोर्ड जिला प्रशासन की सहायता से इन्हें हटवाता है।
इनमें अस्थाई प्रकृति के अतिक्रमण ही जिला प्रशासन हटवाता है, लेकिन डीएम व एसडीएम वक्फ संपत्तियों से कब्जा खाली करवाने में रुचि नहीं दिखाते हैं।
यूपी में वक्फ कानून में बदलाव की तैयारी
जफरयाब जिलानी कहते हैं कि प्रदेश सरकार वक्फ कानून में बदलाव करने जा रही है। इसके तहत सबसे पहले वक्फ संपत्तियों के कब्जे को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाया जाएगा। प्रत्येक जिले के डीएम व एसएसपी को कब्जा हटवाने की जिम्मेदारी दी जाएगी।
डीएम वैसे भी वक्फ संपत्तियों के अपर सर्वेक्षण आयुक्त होते हैं। वहीं, एसएसपी की जिम्मेदारी होगी कि वे कब्जे हटाने के लिए पर्याप्त पुलिस बल मुहैया कराएं। इस संशोधन प्रस्ताव पर न्याय विभाग से राय ली जा रही है।
अभी अधिनियम में व्यवस्था न होने के कारण अतिक्रमण करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। स्थाई अतिक्रमण हटाने की अधिनियम में कोई व्यवस्था नहीं है।
वे कहते हैं कि केंद्र सरकार भी वक्फ कानून में संशोधन की बात कह रही है। ऐसे में इसका ध्यान रखा जाएगा कि केंद्र व राज्य के कानूनों को लेकर कोई विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न न हो।
संपत्ति बचाने के लिए फेसबुक पर भी मुहिम
प्रदेश में वक्फ संपत्तियों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। इस कारण कुछ जागरूक लोगों ने फेसबुक पर भी एक पेज बनाकर मुहिम छेड़ दी है।
सेव वक्फ बोर्ड नाम से इस पेज पर लोगों ने तरह-तरह से अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। ज्यादातर ने इसमें अपने गुस्से हा इजहार किया है।
कैसे-कैसे विवाद
-अक्सर वक्फ बोर्ड अपनी बेशकीमती जमीनों को आय बढ़ाने के नाम पर कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स बनाने के लिए बिल्डरों को लीज पर दे देते हैं। हालांकि वक्फ बोर्ड को इससे कोई आय नहीं होती, लेकिन मुतवल्ली से लेकर सदस्य तक मालामाल हो जाते हैं।
-कई जगह संपत्तियां वक्फ की हैं या नहीं, इस पर भी विवाद चल रहा है। सहारनपुर की घटना भी इसी का परिणाम है। वक्फ बोर्ड उसे अपनी संपत्ति बता रहा था। बाद में यह मामला ट्रिब्यूनल के बाद हाईकोर्ट चला गया। वहां से दूसरे पक्ष को राहत मिली। इसके बाद वहां दोनों पक्षों में विवाद हो गया।
-वक्फ संपत्तियों में मुतवल्ली बनाने व हटाने में भी बड़े-बड़े खेल होते हैं। दरअसल, मुतवल्ली के पास ही संपत्ति के प्रबंधन का जिम्मा होता है। इसके साथ ही समिति बनाने में भी खूब गड़बड़ घोटाले होते हैं।
प्रदेश में कुल वक्फ संपत्तियां
सुन्नी-1,23,115
शिया-7,368
जानें- क्या होता है वक्फ
वक्फ का शाब्दिक अर्थ है रोक रखना। वक्फ अधिनियम 1995 के अनुसार इस्लाम धर्म में निष्ठा रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा अपनी किसी संपत्ति का धार्मिक, पवित्र व खैराती प्रयोजनों के लिए उसे हमेशा के लिए दे देना वक्फ कहलाता है।
वक्फ कानून पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब द्वारा स्थापित सिद्धांतों पर आधारित है। वक्फ का लाभ मानव जाति को मिले यही इसका उद्देश्य है। वक्फ में दो तरह की संपत्तियां आती हैं। पहली है ‘वक्फ अलल खैर’, इसमें वे सभी धार्मिक संपत्तियां आती हैं जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग इबादत करते हैं।
जैसे-मस्जिद, इमामबाड़ा, ईदगाह, दरगाह व कब्रिस्तान आदि। दूसरी वक्फ संपत्ति ‘वक्फ अलल औलाद’ होती है। इनमें वे संपत्तियां आती हैं जिनमें एक हिस्से को वक्फ के लिए दिया जाता है, जबकि बाकी हिस्सा दान करने वाला व्यक्ति अपनी औलाद के लिए रख देता है। इन संपत्तियों का प्रबंधन उन्हीं की औलादों के हाथ में होता है।
लखनऊ की वक्फ संपत्तियों में भी खूब विवाद
राजधानी लखनऊ की भी वक्फ संपत्तियों पर भी खूब विवाद हैं। इनमें ज्यादातर विवाद अवैध कब्जे व संपत्तियों को बेचने के हैं।
हजरतगंज स्थित सिब्तैनाबाद इमामबाड़े की वक्फ संपत्तियों का तो पता ही नहीं चल पा रहा है। इसकी बहुत सी बेशकीमती संपत्तियों पर कब्जे हो गए तो कुछ आपसी मिलीभगत से बेच दी गईं।
काला इमामबाड़ा को लेकर वक्फ बोर्ड का सरकार से ही विवाद चल रहा है। प्रदेश सरकार और वक्फ बोर्ड इसे अपनी-अपनी संपत्ति बता रहे हैं।
यह मामला लखनऊ ट्रिब्यूनल में चल रहा है। इसी बीच वक्फ बोर्ड ने यहां की जमीन बिल्डर को दे दी और वहां दुकानें बनने लगीं। बाद में सरकार ने हस्तक्षेप कर इस काम को रुकवाया।
ज्यादातर के केस न्यायालय में
शिया वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी गुलाम सैयदेन बताते हैं कि ज्यादातर संपत्तियों के विवाद न्यायालय में चल रहे हैं। तालकटोरा करबला में वहां की कमेटी को लेकर ही पारिवारिक विवाद है।
गुफरान मॉब व अन्य कब्रिस्तानों का भी यही हाल है। यहां कब्रों को पाटकर कब्रिस्तानों की जमीन बेच दी जा रही हैं। कई बेशकीमती जमीन तो बिल्डरों को दे दी गईं।
वक्फ संपत्ति हाजी मसीता शिया व सुन्नी दोनों ही वक्फ बोर्डों में दर्ज है। इसको लेकर भी मामला चल रहा है। दोनों ही पक्ष इसे अपना-अपना बता रहे हैं। इसी तरह नरही में स्थित करबला को लेकर भी विवाद है।
वन विभाग, मिशनरी व वक्फ बोर्ड सभी इसे अपनी-अपनी जगह बताते हैं। ऐशबाग करबला हो या फिर राजाजीपुरम करबला, सभी में अवैध कब्जे हैं। टिकैतराय तालाब व उजरियांव के कब्रिस्तान में भी अवैध कब्जे हो रखे हैं।
लखनऊ में वक्फ संपत्तियां
शिया-588
सुन्नी-1650