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दुखद : व्यंग्य विधा के अनूठे शिल्पी उर्मिल कुमार थपलियाल नहीं रहे, आंतों के कैंसर से थे पीड़ित

Tue, 20 Jul 2021 11:26 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Tue, 20 Jul 2021 11:26 PM IST
सार

कानपुर में प्रोफेसर सत्यमूर्ति द्वारा स्थापित नाट्य संस्था दर्पण की लखनऊ में स्थापना 1972 में हुई। उसके संस्थापक सदस्यों में उर्मिल कुमार थपलियाल भी शामिल थे।

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Urmil Kumar Thapliyal, a unique artist of satirical genre, was no more, was suffering from colon cancer
उर्मिल कुमार थपलियाल (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जाने माने नाट्य निर्देशक, व्यंग्यकार और लखनऊ रंगकर्म के स्तंभ उर्मिल कुमार थपलियाल (78 वर्ष )का मंगलवार को निधन हो गया। वे आंतों के कैंसर से पीड़ित थे और बीते कुछ दिनों से लखनऊ के नोवा अस्पताल में भर्ती थे। हालांकि बीते 17 जुलाई को वह अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ गए थे। इंदिरानगर स्थित आवास पर ही उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से लखनऊ ही नहीं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली और मुंबई का रंगमंच भी शोक में डूब गया।

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उर्मिल थपलियाल अपने पीछे 70 वर्षीय पत्नी बीना थपलियाल, ऋतेश थपलियाल, पुत्री ऋतुन मिश्रा व दामाद सत्येंद्र मिश्र को छोड गए हैं। दामाद सत्येंद्र मिश्र ने बताया कि उनके निधन केबाद से लगातार उनके फोन की घंटी बज रही है। हर कॉल को वही उठा रहे हैं।  बुधवार सुबह 9 बजे भैंसाकुंड में उर्मिल थपलियाल का अंतिम संस्कार किया जाएगा।
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लखनवी रंगमंच का स्तंभकार चला गया
कानपुर में प्रोफेसर सत्यमूर्ति द्वारा स्थापित नाट्य संस्था दर्पण की लखनऊ में स्थापना 1972 में हुई। उसके संस्थापक सदस्यों में उर्मिल कुमार थपलियाल भी शामिल थे। शुरुआती दिनों में बतौर अभिनेता मंच पर दिखने वाले उर्मिल कुमार थपलियाल का रुझान धीरे-धीरे नाट्य निर्देशन में हुआ। उनके साथी रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी बताते हैं, हजारों नाटकों का निर्देशन कर चुके उर्मिल कुमार के निर्देशन में मैंने अपने कॅरियर के सबसे ज्यादा नाटक किए हैं। नौटंकी से लेकर व्यंग्य तक में महारत हासिल थी उन्हें। उनके बिना दर्पण ही नहीं लखनऊ का रंगमंच सूना हो गया।
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इन्होंने जताया शोक
वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ अनिल रस्तोगी ने बताया कि उर्मिल थपलियाल दर्पण का 75 प्रतिशत भाग थे। बाकी सब 25 प्रतिशत में शामिल हैं। उनकेबिना दर्पण अधूरा रह गया है, जिसे पूरा नहीं किया जा सकता। उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता। रंगकर्मी लारेब ने बताया कि उर्मिल थपलियाल बेहद जीवंत व्यक्ति थे। जिसकेसाथ बैठते, उसकेहो जाते। हर समय मार्ग दर्शन करते थे। नौटंकी शैली में उनका कोई जोड़ नही है।

उनके साथ काम तो नहीं किया, पर उन्हें जाना-समझा और देखा बहुत

Urmil Kumar Thapliyal, a unique artist of satirical genre, was no more, was suffering from colon cancer
सलीम आरिफ - फोटो : अमर उजाला
सलीम आरिफ बताते हैं कि बात 1974 की है, जब पहली बार मेरा उनका सामना हुआ। रविन्द्रालय के मंच पर नाटक ‘पंक्षी जा, पंक्षी आ’ का मंचन हो रहा था और बतौर अभिनेता उसमें उर्मिल कुमार थपलियाल जी थे। हालांकि हम सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ जी के मेघदूत ग्रुप से जुड़े थे और वे दर्पण के संस्थापक सदस्य थे। इसके बावजूद हमारे बीच रंगकर्म ने एक रिश्ते की मजबूत डोर बांध दी थी। हम लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे, उन दिनों। जहां सुना उर्मिल जी का नाटक है, साइकिल दौड़ाते पहुंच जाया करते थे। यह उनके अभिनय का जादू था। प्रेक्षागृहों के अलावा हमारी मुलाकात अक्सर आकाशवाणी में हो जाया करती थी। वे शाम को 7.30 पर प्रसारित होने वाले प्रादेशिक समाचार पढ़ा करते थे। मुलाकात हो या न हो, हम उनके समाचार जरूर सुना करते थे। यह उनकी आवाज की कशिश थी, जो हमें खींच ही लेती थी।

लखनऊ के आधुनिक रंगमंच की एक पहचान
जिस वक्त वे अभिनय से निर्देशक बने थे, उनकी ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर थी। वे राष्ट्रीय स्तर के निर्देशक थे। 70 के दशक में लखनवी रंगमंच को एक मुकाम देने वालों की बात करें तो एक नाम उर्मिल जी का भी है। मुझे याद है कि आगा हश्र खां के शताब्दी वर्ष में यहूदी की लड़की का मंचन किया था। सही मायने में लखनऊ का जो आधुनिक रंगमंच है, उसे एक पहचान देने में उनका बड़ा योगदान है।

कॉमिक टाइमिंग का कोई जवाब नहीं
सूर्य की पहली किरण से लेकर सूर्य की अंतिम किरण तक का निर्देशन करने वाले उर्मिल जी की कॉमिक टाइमिंग का कोई जवाब नहीं। जितने अच्छे लेखक थे, उतने अच्छे निर्देशक और उतने ही अच्छे अभिनेता भी थे।

एक शहर में हों सलाम-दुआ न हो, ऐसा हो नहीं सकता
एक स्थापित शख्स ने हमेशा मेरे जैसे स्टूडेंट को राह भी दिखाई है। वे गर्व से कहते थे कि लखनऊ का एक लड़का मुंबई में जाकर अच्छा कर रहा है। एक शहर में हों और दुआ-सलाम न हो ऐसा हो ही नहीं सकता था।
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