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ये नतीजे डराते भी हैं: चुनाव ने सत्ता व संगठन में बेहतर तालमेल का दिया संदेश, सपा के लिए बड़ा झटका, कांग्रेस परिदृश्य से ही बाहर

Sun, 04 Jul 2021 09:56 AM IST
शाहरुख खान महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 04 Jul 2021 09:56 AM IST
सार

जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में सत्ताधारी दल भाजपा को मुख्य विपक्षी सपा से भी कम सीटें मिली थीं। बड़ी संख्या में बागी चुनाव जीत गए थे। बागियों ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों को हराया था। बागियों को फिर से पार्टी में न लेने का एक वर्ग का दबाव भी था। दूसरा, इन बागियों का दूसरे दलों के साथ जाने का खतरा खड़ा था। 

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up zila panchayat election 2021 Psychological gain for BJP disappointment for Samajwadi Party
फाइल फोटो - फोटो : amar ujala

विस्तार

जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव सभी दलों के लिए किसी न किसी मायने में महत्वपूर्ण है। यह सत्ताधारी दल भाजपा व योगी आदित्यनाथ सरकार को विधानसभा चुनाव से पूर्व बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ देने वाला है तो मुख्य विपक्षी सपा को मायूस करने वाला। कांग्रेस जैसा राष्ट्रीय दल व बसपा इस प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर रही हैं। भविष्य के लिहाज से यह रणनीति इन दोनों दलों के लिए और भी मुश्किलें बढ़ा सकती हैं।
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जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में सत्ताधारी दल भाजपा को मुख्य विपक्षी सपा से भी कम सीटें मिली थीं। बड़ी संख्या में बागी चुनाव जीत गए थे। बागियों ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों को हराया था। बागियों को फिर से पार्टी में न लेने का एक वर्ग का दबाव भी था। दूसरा, इन बागियों का दूसरे दलों के साथ जाने का खतरा खड़ा था। 
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इन परिस्थितियों में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा की रणनीति पर सभी की निगाहें थीं। इन विकट परिस्थितियों में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व सामने आया और विधानसभा चुनाव से पहले हाथ से निकलती बाजी को हथियाने के लिए संगठन से सरकार तक के बीच समन्वय कर पुख्ता रणनीति तैयार कराई। न सिर्फ बागियों को अभियान चलाकर पार्टी में वापस लाया गया, बल्कि कई जगह उन्हें अध्यक्ष का प्रत्याशी बना दिया। यही नहीं विरोधी दलों के सदस्यों को साथ जोड़ने की भी मुहिम चलाई और जहां वे जिताऊ लगे, उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी का प्रत्याशी बना दिया। 
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वहीं, सरकार और संगठन के बीच पिछले साढ़े चार वर्ष में पहली बार सबसे बेहतर समन्वय सामने आया है। संगठन व सरकार के मंत्रियों ने फील्ड में पूरे समन्वय से काम किया है। पंचायत आम चुनाव में सदस्यों के टिकट वितरण में पैदा हुई नाराजगी जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव तक काफी हद तक दूर कर ली गई। 75 में से भाजपा के 67 जिला पंचायत अध्यक्षों की जीत इसी रणनीति का नतीजा माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव पूर्व संगठन व सरकार में बेहतर तालमेल का संदेश विधायकों व सांसदों से लेकर फील्ड के कार्यकर्ताओं तक का मनोबल बढ़ाने का काम करेगा।
 

योगी की प्रशासनिक पकड़ का पुख्ता संदेश

इन नतीजों से योगी सरकार की प्रशासनिक पकड़ भी बुलंद हुई है। फील्ड के कार्यकर्ताओं व नेताओं द्वारा प्रशासनिक मशीनरी से किसी भी स्तर से सहयोग न मिलने के आरोप लगाए जा रहे थे। इन नतीजों से मुख्यमंत्री की प्रशासनिक  पकड़ का पुख्ता संदेश गया है। 

किसान आंदोलन का असर बागपत तक सिमटा
जिला पंचायत सदस्य चुनाव के बाद पश्चिम में किसानों की बड़ी नाराजगी के तौर पर पेश किया जा रहा था। सभी विपक्षी दल भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो गए थे। लेकिन, जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में ये दावे हवाई साबित हुए। बागपत में रालोद व एटा में सपा का अध्यक्ष जीत सका है। इसके अलावा पश्चिम यूपी की सभी सीटें भाजपा ने जीत ली हैं।

ये चुनाव नतीजे डराते भी हैं
जिला पंचायत सदस्य का चुनाव आम मतदाता करते हैं, जिसे भविष्य के चुनावों के लिए जनता के मूड के तौर पर देखा जाता रहा है। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होते हैं, लिहाजा इनमें सत्ता की खूब चलती है। पिछले कई चुनावों से देखा जा रहा है कि सत्ताधारी दल जनता से होने वाले जिला पंचायत सदस्य चुनाव में कम सफलता हासिल करते हैं लेकिन अध्यक्ष का चुनाव अपने सत्ताई प्रबंधन से जीत लेते हैं।

एक तरह से वे जनता के मूड को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि अप्रत्यक्ष चुनाव की जीत की खुमारी विधानसभा चुनावों में भारी पड़ जाती है। बसपा व सपा सत्ता में रहते हुए बड़ी संख्या में जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव जीतने के बावजूद वापसी नहीं कर पाए। भाजपा को इस एकतरफा जीत में यह जरूर याद रखना चाहिए।
 

सपा के लिए बड़े झटके की तरह हैं नतीजे

सपा के लिए जिपं अध्यक्ष के चुनाव बड़े झटके की तरह हैं। सत्ताधारी दल से अधिक जिपं सदस्य जीतने का दावा करने वाली पार्टी इटावा छोड़कर अपने गढ़ वाले जिलों में भी अध्यक्ष नहीं बना पाई है। मैनपुरी, कन्नौज, औरैया व फिरोजाबाद में भी पार्टी अध्यक्ष नहीं बना पाई।

दूसरा, पार्टी के तमाम जिपं सदस्य सत्ताधारी दल के साथ चले गए। विधानसभा चुनावों के बूथ प्रबंधन में इनकी बड़ी भूमिका होती है। यदि ये सत्ताधारी दल के साथ बने रहते हैं तो पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में भी इनकी कमी का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

बसपा का मैदान से हटना भविष्य में पड़ सकता है उलटा
बसपा ने बड़ी संख्या में जिपं सदस्य जिताने के दावे किए थे। कई जिलों में पार्टी के नेता अध्यक्ष चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। पर चुनाव के ऐन मौके पर मायावती ने अध्यक्ष चुनाव से पार्टी को हटाने का एलान कर दिया। नतीजा ये हुआ कि पार्टी के सदस्य भाजपा, सपा या अन्य किसी दल के साथ चले गए। स्वाभाविक रूप से जिन दलों को बसपा सदस्यों ने वोट किया है, अब उन्हीं के जिला पंचायत अध्यक्षों के नेतृत्व में काम करेंगे।

अपने क्षेत्र के काम के लिए अब इनका निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्षों से बेहतर तालमेल भी रखना होगा। ऐसे में  तमाम सदस्यों के दूसरों दलों के साथ बने रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। चुनाव मैदान से हटने की रणनीति भारी पड़ सकती है।

कांग्रेस परिदृश्य से ही बाहर

यह पहला चुनाव है, जब कांग्रेस पूरे प्रदेश में एक भी जिला पंचायत अध्यक्ष नहीं जिता पाई। वास्तव में यह राष्ट्रीय पार्टी पंचायत चुनाव कभी भी रणनीति के साथ लड़ती नजर नहीं आई। पार्टी के तमाम दिग्गज नेता कहीं भी इन चुनावों की अगुवाई करते नजर नहीं आए।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र रायबरेली हो या राहुल का संसदीय क्षेत्र अमेठी, प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू का जिला कुशीनगर हो या कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा मोना का जिला प्रतापगढ़, कांग्रेस कहीं भी राष्ट्रीय दल की तरह नजर नहीं आई। पंचायत चुनाव से पार्टी का इस तरह प्रदर्शन भविष्य के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा है।
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