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यूपी: परमाणु व रासायनिक हमलों के खतरों पर लखनऊ में होगा शोध, कमांड अस्पताल बनेगा केंद्र; जानिए डिटेल

Wed, 29 Jul 2026 10:51 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Wed, 29 Jul 2026 10:51 PM IST
सार

Nuclear attack:रक्षामंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि यह विभाग सैनिकों को उन्नत चिकित्सा सहायता सुनिश्चित कर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा।

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UP: Research on the dangers of nuclear and chemical attacks will be conducted in Lucknow
राजनाथ सिंह ने किया शुभारंभ। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

रासायनिक, परमाणु व रेडियोलाॅजिकल हमलों से पैदा होने वाले खतरों पर अध्ययन एवं शोध लखनऊ में होगा। छावनी स्थित मध्य कमान के कमांड अस्पताल में देश का पहला मिलिट्री मेडिसिन विभाग बुधवार को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने शुरू किया गया है। उन्होंने वर्चुअल माध्यम से यह शुभारंभ किया।

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इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए यह विभाग रासायनिक, जैविक, विकिरण और परमाणु संबंधी खतरों(सीबीआरएन) के अध्ययन और शोध का अहम केंद्र बनेगा। रक्षामंत्री ने कहा कि आज युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। आज के दौर में पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ व्यापक विनाश के हथियारों का खतरा भी लगातार बना हुआ है। चाहे रासायनिक एजेंट हों, जैविक युद्ध हो या विकिरण संबंधी खतरे, इन नए प्रकार के खतरों के अध्ययन में यह विभाग शोध का केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि इस विभाग में ऑपरेशनल और मिलिट्री मेडिसिन, कॉम्बैट मेडिसिन, कॉम्बैट सर्जरी, ट्रॉमा केयर और बड़े पैमाने पर हताहतों के प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित की जाएगी। उन्होंने लक्ष्य रखा कि इसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बैटलफील्ड मेडिसिन रिसर्च सेंटर बनाया जाए। मध्य कमान के जनसंपर्क अधिकारी शांतनु प्रताप सिंह ने बताया कि विभाग चिकित्सा सेवा महानिदेशालय(सेना) के तत्वावधान में स्थापित किया गया है। 
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रक्षामंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि यह विभाग सैनिकों को उन्नत चिकित्सा सहायता सुनिश्चित कर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा। यह सैन्य आघात नियंत्रण, युद्ध मनोचिकित्सा व रासायनिक, जैविक, विकिरणीय, परमाणु एवं विस्फोटक(सीबीआरएनई) चिकित्सा प्रतिक्रिया जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित करेगा। विभाग दूरस्थ चिकित्सा व अनुकरण-आधारित प्रशिक्षण में नवाचार को भी बढ़ावा देगा। इसका विकास चरणबद्ध तरीके से होगा, जिसमें पहले शैक्षणिक कार्यक्रम और फिर उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जाएंगे। कार्यक्रम में सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, सेना उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन, मध्य कमान के सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्या सेनगुप्ता, सेना चिकित्सा कोर के महानिदेशक सर्जन वाइस एडमिरल आरती सरीन आदि उपस्थित रहे।
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सैन्य चिकित्सा का महत्व
लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह ने सैन्य चिकित्सा के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह युद्ध और युद्ध जैसी स्थितियों में मानव शरीर पर पड़ने वाले शारीरिक व मानसिक तनावों का अध्ययन करती है। हमारे सैनिक दुनिया के कुछ सबसे जटिल क्षेत्रों और कठोर जलवायु में तैनात हैं। यह नया विभाग इन परिचालन वातावरणों के अनुरूप चिकित्सा प्रोटोकॉल विकसित करेगा। कहाकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपकरणों का उपयोग कर सैनिकों के स्वास्थ्य की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकती है।

रक्षा बल विजन में पेश किया खाका
पिछले दिनों जारी रक्षा बल विजन-2047 दस्तावेज में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) खतरों पर गंभीर चिंता जताई गई थी। इसमें भविष्य के युद्ध में इन चुनौतियों से बचाव के लिए आधुनिक सुरक्षा प्रणाली बनाने का खाका पेश किया गया था। विजन दस्तावेज में कहा गया था कि अब खतरे पारंपरिक और छद्म युद्ध से आगे निकलकर सामूहिक विनाश के हथियारों तक पहुंच गए हैं। इस नीतिगत दस्तावेज में विशेष रूप से जैविक खतरों की पहचान व संक्रमण रोकना एक बड़ी चुनौती बताया गया था। क्योंकि यह अदृश्य तरीके से फैलते हैं।


 जानिए मौजूदा स्थिति
वर्तमान में सेना के पास कोर ऑफ इंजीनियर्स के तहत विशेष दस्ता है जो सीबीआरएन खतरों का जिम्मा संभालता है। पिछले साल सेना ने 223 ऑटोमैटिक केमिकल एजेंट डिटेक्शन एंड अलार्म सिस्टम खरीदे हैं। यह वास्तविक समय में रसायनों का पता लगा सकते हैं। स्वदेशी मोबाइल डिकंटेमिनेशन सिस्टम जैसे उपकरण भी हैं। डीआरडीओ भी सीबीआरएन खतरों से रक्षा के लिए उन्नत तकनीक विकसित कर रहा है। सरकार की कोशिश है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच बिखराव दूर कर एक एकीकृत सुरक्षा प्रणाली तैयार की जाए, ताकि किसी हमले की स्थिति में प्रतिक्रिया में लगने वाला समय कम से कम किया जा सके।

 

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