Mission Election : 2024 की चुनावी बिसात बिछाएंगे मैनपुरी लोकसभा और खतौली-रामपुर विधानसभा सीटों के नतीजे
भाजपा के लिए सुकून की बात यह है कि उसने सपा के दिग्गज चेहरे आजम खां का किला ध्वस्त कर भगवा परचम लहरा दिया है। रामपुर में पहली बार कमल खिलाकर कीर्तिमान ही नहीं बनाया है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मुस्लिम वोटों की सियासत की प्रासंगिकता निरंतर घटने के संदेश पर मुहर लगाई है।
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नतीजे भले ही उपचुनाव के हों, लेकिन निहितार्थ दूरगामी होंगे। मैनपुरी लोकसभा और खतौली व रामपुर विधानसभा सीटों के नतीजे 2024 की चुनावी बिसात बिछाएंगे। विपक्ष के बीच सपा का महत्व तो बढ़ेगा ही साथ ही भाजपा, कांग्रेस और बसपा की चुनौती भी बढ़ेगी। हालांकि, भाजपा के लिए सुकून की बात यह है कि उसने सपा के दिग्गज चेहरे आजम खां का किला ध्वस्त कर भगवा परचम लहरा दिया है। रामपुर में पहली बार कमल खिलाकर कीर्तिमान ही नहीं बनाया है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मुस्लिम वोटों की सियासत की प्रासंगिकता निरंतर घटने के संदेश पर मुहर लगाई है।
इसके बावजूद लोकसभा की मैनपुरी सीट के जीत के संदेश के साथ चाचा-भतीजे एक हो गए हैं। शिवपाल ने लगभग छह साल पहले बनी अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का सपा में विलय कर दिया है। उधर, मुजफ्फरनगर की खतौली सीट भी भाजपा की झोली से निकलकर सपा-रालोद के गठबंधन के पास चली गई है। यह इस बात का संकेत है कि 2024 के मद्देनजर भाजपा को पूरी रणनीति पर नए सिरे से सोच-विचार करना होगा। कारण, तीनों सीटों के राजनीतिक और सामाजिक समीकरण जिस तरह के हैं, उसको देखते हुए ये भविष्य में भाजपा की रणनीतिक चुनौती बढ़ाते नजर आ रहे हैं। उपचुनाव की सफलता से निश्चय ही निकाय चुनावों में सपा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा।'
सहानुभूति लहर का लाभ
यह बात सही है कि उपचुनाव के आधार पर 2024 के लोकसभा चुनाव के समीकरणों को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। अतीत में लोस की गोरखपुर, फूलपुर, कैराना और विस की नूरपुर सीटों के उपचुनाव में हारने के बावजूद भाजपा के 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ी सफलता हासिल करने का उदाहरण सामने है। यह भी कहा जा सकता है कि मैनपुरी सीट पर सपा को मुलायम सिंह यादव के निधन के कारण सहानुभूति की लहर का लाभ मिला है, पर राजनीति में धारणाओं का बड़ा महत्व होता है। नतीजों ने इस धारणा को तो मजबूत ही किया है कि लोकसभा की रामपुर, आजमगढ़ तथा विधानसभा की लखीमपुरखीरी की गोला सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा की जीत का अर्थ इसका अजेय हो जाना नहीं है। अगर ये जीत मिली थी तो उसके पीछे यादव परिवार में मतभेद तथा विपक्ष के वोटों में बंटवारा था। नतीजों ने भाजपा को चुनावी रणनीति पर लगातार काम करते रहने के साथ उसकी समीक्षा की भी जरूरत समझाई है ।
क्या करवट लेगी मुस्लिम सियासत....
रामपुर में 50% से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। यहां भाजपा की जीत के बाद मुस्लिम सियासत के भावी रुख को लेकर जिज्ञासा स्वाभाविक है। कारण, रामपुर जिला ही सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला नहीं है, बल्कि रामपुर सीट पर भी मुस्लिम मतदाता 50 फीसदी से अधिक हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रदेश में मुस्लिम राजनीति अप्रासंगिक हो रही है? भाजपा के हिंदुत्व के कार्ड ने मुस्लिम समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है? ऐसा लगता है कि केंद्र और राज्य की योगी सरकार के गरीब कल्याणकारी योजनाएं और तीन तलाक जैसे फैसले मुस्लिम आबादी के बीच भाजपा के विरोध को कम कर रहे हैं। हालांकि अभी यह कहना मुश्किल है कि उनके बीच भाजपा का समर्थन बढ़ रहा है, लेकिन विरोध के कमजोर होते स्वर उन्हें भाजपा के प्रति तटस्थ बनाते जरूर दिख रहे हैं।
नतीजों के निहितार्थों को समझना जरूरी
नतीजे भाजपा को अति आत्मविश्वास से बचने की सलाह देते नजर आ रहे हैं। तीनों सीटों के राजनीतिक तथा सामाजिक सरोकारों के समीकरण काफी व्यापक हैं। खासतौर से मैनपुरी और खतौली सीटों पर पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या निर्णायक है। मैनपुरी में जिस तरह डिंपल को वोट मिले हैं, वे भाजपा को यादव और जाटव जोड़ो अभियान की समीक्षा की सलाह दे रहे हैं। यह स्थिति लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सपा को भाजपा के खिलाफ प्रदेश में मजबूत विकल्प बनने की कोशिश करने की ताकत दे रही है।