{"_id":"671fa4d61cf3c6ffef0f0438","slug":"up-digital-arrests-are-also-taking-place-through-hit-and-run-people-get-trapped-in-haste-2024-10-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"UP: हिट एंड रन के जरिए भी हो रहे डिजिटल अरेस्ट, हड़बड़ी में फंसते हैं लोग, लाखों रुपये की हो रही ठगी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
UP: हिट एंड रन के जरिए भी हो रहे डिजिटल अरेस्ट, हड़बड़ी में फंसते हैं लोग, लाखों रुपये की हो रही ठगी
Mon, 28 Oct 2024 08:21 PM IST
ishwar ashish
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 28 Oct 2024 08:21 PM IST
सार
डिजिटल अरेस्ट के जरिए ठग लोगों को रैंडम तरीके से भी शिकार बना रहे हैं। सीबीआई, नारकोटिक्स, कस्टम, पुलिस, ईडी आदि एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को ठगा जा रहा है।
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : FREEPIK
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
डिजिटल अरेस्ट करने वाले अपराधियों का शिकार केवल सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहने वाले लोग ही नहीं बनते हैं, बल्कि इनके संगठित गिरोह ''हिट एंड रन'' के फॉर्मूले के जरिए भी आसानी ने फंसा लेते हैं। राजधानी स्थित एसजीपीजीआई की महिला डॉक्टर के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इस गिरोह की तलाश करने में एसटीएफ को भी खासी मशक्कत करनी पड़ी थी, जिसके बाद पांच राज्यों की खाक छानने के बाद असली गुनहगारों का पता चला था।
विज्ञापन
साइबर क्राइम के बढ़ते मामलों के बाद डिजिटल अरेस्ट पुलिस के लिए चुनौती बन चुका है। ऐसे अधिकांश मामलों में पुलिस तक शिकायत नहीं पहुंचती है अथवा वह साइबर क्राइम सिक्योरिटी पोर्टल 1930 पर शिकायत कर कार्रवाई का इंतजार करते रह जाते हैं। डिजिटल अरेस्ट के मामलों की जांच करना भी आसान नहीं होता है। इनका नेटवर्क कई राज्यों के साथ खाड़ी देशाें तक है, जिसकी वजह से कई बार हड़पी गई रकम की बरामदगी नहीं हो पाती है। इस रकम को खाड़ी देशों में ट्रांसफर करने के बाद क्रिप्टो करेंसी में बदल दिया जाता है। बाद में इसे वापस अपने खाते में मंगाकर आपस में बांट लिया जाता है। इससे अपराध करने वाले की पहचान नहीं हो पाती है।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें - रामलला की पहली दिवाली: 84 कोस तक फैली दीपोत्सव की आभा, रोशन होंगे 200 से अधिक मठ-मंदिर
विज्ञापन
ये भी पढ़ें - यूपी: दिवाली की छुट्टी में फंसा पेंच, एक नवंबर को प्रदेश में खुले हैं माध्यमिक विद्यालय, अभिभावक-शिक्षक परेशान
बड़े फायदे के लिए जुड़े
डिजिटल अरेस्ट भले की एक व्यक्ति अपनी पहचान बदल करता है, लेकिन इसके पीछे पूरा संगठित गिरोह होता है। सीबीआई, नारकोटिक्स, कस्टम, पुलिस, ईडी आदि एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को ठगा जाता है। अपराध करने वाला वर्दी के साथ ऑफिस का सेटअप भी बना लेता है ताकि किसी को शक न हो। गिरोह सोशल मीडिया के साथ ''हिट एंड रन'' (रैंडम कॉल) के तरीके से भी लोगों को शिकार बनाता है। इसमें सफल रहने पर गिरोह के बाकी सदस्यों की भूमिका शुरू होती है और वह पीड़ित को पूरी तरह अपने जाल में फंसा लेते हैं।
हड़बड़ी से फंसते हैं लोग
एसजीपीजीआई की डॉक्टर को डिजिटल अरेस्ट करने वाले गिरोह को पकड़ने वाले एसटीएफ के डिप्टी एसपी दीपक सिंह के मुताबिक अधिकतर मामलों में लोग हड़बड़ी करने की वजह से फंसते हैं। गिरोह के सदस्य अक्सर ऐसे तरीकों से फंसाते हैं, जो किसी भी व्यक्ति को आसानी से भयभीत कर दे। लोग इसे खुद पर आई कोई मुसीबत मानकर डर जाते हैं, जिसका फायदा अपराधियों को होता है। लिहाजा इस तरह की कॉल आने पर बिना डरे अपने करीबियों और पुलिस को सूचित करना चाहिए। कोई भी एजेंसी अथवा पुलिस किसी को फोन करके उसके अपराध में शामिल होने के बारे में नहीं बताती है।
आसान नहीं रकम की वापसी
इस तरह के मामलों में कई बार ठगी गई रकम की वापस भी आसान नहीं होती है। यदि पुलिस रकम को बरामद कर लेती है तो उसे अदालत के आदेश पर पीड़ित को दिया जाता है। हालांकि इसके लिए पीड़ित को अदालत में गारंटी की रकम जमा करानी होती है। कई मामलों मे पीड़ित अपनी पूरी पूंजी गंवा चुका होता है, जिसकी वजह से उसे अदालत के जरिए रकम वापसी में मुश्किलें आती हैं।