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पंचायतों में चक्रानुक्रम आरक्षण की कार्यवाही का रास्ता साफ, योगी कैबिनेट ने दी मंजूरी
Wed, 10 Feb 2021 09:34 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Wed, 10 Feb 2021 09:34 AM IST
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
- फोटो : amar ujala
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योगी सरकार मंगलवार को कैबिनेट बाई सर्कुलेशन 12 अहम प्रस्तावों को मंजूरी दे दी। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पंचायत चुनाव को लेकर है। कैबिनेट ने चुनाव से पहले त्रिस्तरीय ग्रामीण पंचायतों की नियामावली में संशोधन कर आरक्षण व्यवस्था संबंधी आदेश जारी करने की अड़चन दूर कर दी है। इससे से ग्राम पंचायतों व ग्राम पंचायत सदस्यों के चक्रानुक्रम आरक्षण की कार्यवाही का रास्ता साफ हो गया है। अब आरक्षण संबंधी गाइडलाइन कभी भी जारी की जा सकती है।
प्रदेश में वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में यूपी पंचायतराज (स्थानों व पदों का आरक्षण व आवंटन) नियमावली 1994 में 10वां संशोधन किया गया था। नियमावली का नियम-4 ग्राम प्रधानों व नियम-5 ग्राम पंचायत सदस्यों से संबंधित है। इसमें एक नया प्रावधान जोड़ा गया था- अगर सामान्य निर्वाचन के पूर्व परीसीमन (सामान्य पुनर्गठन) की कार्यवाही जनसंख्या वृद्धि अथवा अन्य कारणों से की जाती है तो उस चुनाव में पिछले आरक्षणों को शून्य मानते हुए आरक्षण नए सिरे से किया जाएगा। 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए इस नियम के आधार पर 2015 के चुनाव में ग्राम पंचायत सदस्य व ग्राम प्रधान के पदों के लिए नए सिरे से आरक्षण की व्यवस्था की गई। मगर, चार जिलों गोंडा, शामली, मुरादाबाद व गौतमबुद्धनगर में सामान्य पुनर्गठन 2015 में पूरा नहीं हो सका।
इसके बावजूद नए सिरे से आरक्षण की कार्यवाही की गई थी। इन चार जिलों में सामान्य पुनर्गठन की कार्यवाही नवंबर-दिसंबर, 2020 में हुई। ऐसे में 2015 में नियमावली में जोड़े गए प्रावधान को यदि समाप्त नहीं किया जाता तो इन चार जिलों में नए सिरे से पंचायतों के आरक्षण की कार्यवाही करनी पड़ती, जो बाकी 71 जिलों की व्यवस्था से भिन्न होगी। एक तरह से सभी जिलों में चक्रानुक्रम आरक्षण समान रूप से आगे नहीं बढ़ पाता।
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इस विसंगति को दूर करने के लिए सरकार ने यूपी पंचायतराज (स्थानों व पदों का आरक्षण व आवंटन) नियमावली 1994 में 11वां संशोधन कर पुनर्गठन के बाद नए सिरे से आरक्षण का प्रावधान समाप्त कर दिया है। इस तरह पूरे प्रदेश में चक्रानुक्रम आरक्षण का रास्ता साफ हो गया है।
आरक्षण की गाइडलाइन कभी भी हो सकती है जारी
प्रदेश सरकार पंचायतों में आरक्षण के दिशानिर्देश कभी भी जारी कर सकती है। हाईकोर्ट ने सरकार को ग्राम प्रधानों के चुनाव 30 अप्रैल तक कराने के निर्देश दिए हैं। इस निर्देश के बाद शासन स्तर पर कार्यवाही में तेजी आ गई है। सरकार ने 17 मार्च तक आरक्षण की कार्यवाही पूरा करने का एलान किया है।
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प्रदेश में वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में यूपी पंचायतराज (स्थानों व पदों का आरक्षण व आवंटन) नियमावली 1994 में 10वां संशोधन किया गया था। नियमावली का नियम-4 ग्राम प्रधानों व नियम-5 ग्राम पंचायत सदस्यों से संबंधित है। इसमें एक नया प्रावधान जोड़ा गया था- अगर सामान्य निर्वाचन के पूर्व परीसीमन (सामान्य पुनर्गठन) की कार्यवाही जनसंख्या वृद्धि अथवा अन्य कारणों से की जाती है तो उस चुनाव में पिछले आरक्षणों को शून्य मानते हुए आरक्षण नए सिरे से किया जाएगा। 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए इस नियम के आधार पर 2015 के चुनाव में ग्राम पंचायत सदस्य व ग्राम प्रधान के पदों के लिए नए सिरे से आरक्षण की व्यवस्था की गई। मगर, चार जिलों गोंडा, शामली, मुरादाबाद व गौतमबुद्धनगर में सामान्य पुनर्गठन 2015 में पूरा नहीं हो सका।
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इसके बावजूद नए सिरे से आरक्षण की कार्यवाही की गई थी। इन चार जिलों में सामान्य पुनर्गठन की कार्यवाही नवंबर-दिसंबर, 2020 में हुई। ऐसे में 2015 में नियमावली में जोड़े गए प्रावधान को यदि समाप्त नहीं किया जाता तो इन चार जिलों में नए सिरे से पंचायतों के आरक्षण की कार्यवाही करनी पड़ती, जो बाकी 71 जिलों की व्यवस्था से भिन्न होगी। एक तरह से सभी जिलों में चक्रानुक्रम आरक्षण समान रूप से आगे नहीं बढ़ पाता।
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इस विसंगति को दूर करने के लिए सरकार ने यूपी पंचायतराज (स्थानों व पदों का आरक्षण व आवंटन) नियमावली 1994 में 11वां संशोधन कर पुनर्गठन के बाद नए सिरे से आरक्षण का प्रावधान समाप्त कर दिया है। इस तरह पूरे प्रदेश में चक्रानुक्रम आरक्षण का रास्ता साफ हो गया है।
आरक्षण की गाइडलाइन कभी भी हो सकती है जारी
प्रदेश सरकार पंचायतों में आरक्षण के दिशानिर्देश कभी भी जारी कर सकती है। हाईकोर्ट ने सरकार को ग्राम प्रधानों के चुनाव 30 अप्रैल तक कराने के निर्देश दिए हैं। इस निर्देश के बाद शासन स्तर पर कार्यवाही में तेजी आ गई है। सरकार ने 17 मार्च तक आरक्षण की कार्यवाही पूरा करने का एलान किया है।
सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को मिलेगी ग्रेच्युटी
प्रदेश में तीन हजार से अधिक सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में एक अप्रैल 2005 से पहले नियुक्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ग्रेच्युटी दी जाएगी। योगी कैबिनेट ने मंगलवार को बाई सर्कुलेशन प्रदेश में सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में 1 अप्रैल 2005 से पहले नियुक्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पर ग्रेच्युटी का लाभ देने का प्रस्ताव मंजूर किया है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का लाभ देने पर एक अरब 24 करोड़ 52 लाख 83 हजार रुपये का व्यय भार आएगा। यह व्यय भार तत्काल राजकोष पर नहीं आएगा बल्कि आगामी 15 से 20 वर्षों में क्रमिक रूप से आएगा। एक अप्रैल 2005 से पहले सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी का लाभ दिया जाएगा।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का लाभ देने पर एक अरब 24 करोड़ 52 लाख 83 हजार रुपये का व्यय भार आएगा। यह व्यय भार तत्काल राजकोष पर नहीं आएगा बल्कि आगामी 15 से 20 वर्षों में क्रमिक रूप से आएगा। एक अप्रैल 2005 से पहले सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी का लाभ दिया जाएगा।
पांच पेज से अधिक की खतौनी पर शुल्क बढ़ाने का फैसला
प्रदेश सरकार ने स्वामित्व योजना व भू-अभिलेखों के डिजिटाइजेशन के क्रियान्वयन में बजट की व्यवस्था का रास्ता निकाल लिया है। सरकार ने पांच पेज से अधिक की खतौनी पर शुल्क बढ़ाने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि इससे आम काश्तकार बढ़े शुल्क के भार से बचे रहेंगे, लेकिन बड़े काश्तकारों को बढ़ी राशि देनी होगी। प्रदेश सरकार ने मंगलवार को कैबिनेट बाई सर्कुलेशन इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
प्रदेश में यूपी अधिकारों का अभिलेख कंप्यूटरीकरण (तृतीय संशोधन) नियमावली-2012 के जरिए कंप्यूटरीकृत खतौनी नकल (उद्धरण) के लिए 15 रुपये व सेवा प्रदाता के जरिए 30 रुपये में इलेक्ट्रॉनिकली हस्ताक्षरित खतौनी की नकल प्राप्त करने की व्यवस्था है। प्रदेश सरकार ने नियमावली में चौथा संशोधन करते हुए शुल्क में वृद्धि को मंजूरी दे दी है। अब आवेदन के साथ 15 रुपये के प्रयोक्ता प्रभार व पांच पेज से अधिक की खतौनी पर प्रति पेज एक रुपये का अतिरिक्त प्रयोक्ता प्रभार देना होगा। विभागीय वेबसाइट से भी तय प्रयोक्ता प्रभार व सेवा प्रदाता प्रभार देकर इलेकक्ट्रॉनिकली हस्तारक्षित खतौनी की नकल प्राप्त की जा सकेगी।
वर्तमान मेंप्रयोक्ता प्रभार से प्राप्त राशि से तहसील कंप्यूटर केंद्र व राजस्व न्यायालयों के सुदृढ़ीकरण, आधुनिकीकरण, अनुरक्षण व संचालन संबंधी कार्य होते हैं। अब यह राशि स्वामित्व योजना (आबादी का सर्वे व घरौनी वितरण) के कार्यों, भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण तथा अन्य ई-गवर्नेंस, कंप्यूटरीकरण से संबंधित प्रोजेक्ट पर भी खर्च हो सकेगी। इससे इन कार्यों के क्रियान्वयन व संचालन में तेजी आएगी और किसानों व आम लोगों को स्वामित्व योजना के तहत आबादी के अधिकार देने संबंधी कार्यवाही भी तेजी से हो सकेगी।
प्रदेश में यूपी अधिकारों का अभिलेख कंप्यूटरीकरण (तृतीय संशोधन) नियमावली-2012 के जरिए कंप्यूटरीकृत खतौनी नकल (उद्धरण) के लिए 15 रुपये व सेवा प्रदाता के जरिए 30 रुपये में इलेक्ट्रॉनिकली हस्ताक्षरित खतौनी की नकल प्राप्त करने की व्यवस्था है। प्रदेश सरकार ने नियमावली में चौथा संशोधन करते हुए शुल्क में वृद्धि को मंजूरी दे दी है। अब आवेदन के साथ 15 रुपये के प्रयोक्ता प्रभार व पांच पेज से अधिक की खतौनी पर प्रति पेज एक रुपये का अतिरिक्त प्रयोक्ता प्रभार देना होगा। विभागीय वेबसाइट से भी तय प्रयोक्ता प्रभार व सेवा प्रदाता प्रभार देकर इलेकक्ट्रॉनिकली हस्तारक्षित खतौनी की नकल प्राप्त की जा सकेगी।
वर्तमान मेंप्रयोक्ता प्रभार से प्राप्त राशि से तहसील कंप्यूटर केंद्र व राजस्व न्यायालयों के सुदृढ़ीकरण, आधुनिकीकरण, अनुरक्षण व संचालन संबंधी कार्य होते हैं। अब यह राशि स्वामित्व योजना (आबादी का सर्वे व घरौनी वितरण) के कार्यों, भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण तथा अन्य ई-गवर्नेंस, कंप्यूटरीकरण से संबंधित प्रोजेक्ट पर भी खर्च हो सकेगी। इससे इन कार्यों के क्रियान्वयन व संचालन में तेजी आएगी और किसानों व आम लोगों को स्वामित्व योजना के तहत आबादी के अधिकार देने संबंधी कार्यवाही भी तेजी से हो सकेगी।
जबरन धर्मांतरण के खिलाफ विधेयक के मसौदे को मंजूरी
प्रदेश में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए प्रदेश कैबिनेट ने यूपी विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2021 के मसौदे को मंगलवार को मंजूरी दे दी। इसमें जबरन धर्मांतरण कराने वाले को 10 वर्ष तक की सजा और 50 हजार रुपये तक का प्रावधान है। यही नहीं, पीड़ित को पांच लाख रुपये तक की क्षतिपूर्ति की भी व्यवस्था की गई है।
सरकार ने गत वर्ष इसे अध्यादेश के रूप में लाकर लागू किया था। तब विधानमंडल सत्र नहीं चल रहा था। किसी अध्यादेश को छह माह में विधानमंडल की मंजूरी दिलाना जरूरी होता है। इसलिए उक्त अध्यादेश को कानूनी मान्यता देने के लिए विधेयक के रूप में लाकर उसे कैबिनेट बाई सर्कुलेशन पास कर दिया गया। विधेयक को 18 फरवरी से शुरू हो रहे विधानमंडल सत्र में दोनों सदनों में रखा जाएगा। पास होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। विधेयक में यह भी व्यवस्था की गई है कि अगर कोई अपने पूर्व के धर्म को वापस ग्रहण करता है तो वह इस अध्यादेश के दायरे में नहीं आएगा।
जबरन धर्मांतरण कराने वाले को 10 वर्ष तक की सजा, 50 हजार का जुर्माना
यूपी विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2021 के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति जबरन, लालच देकर, दबाव बनाकर या अपने प्रभाव में लेकर किसी का धर्म परिवर्तन कराता है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी। यह एफआईआर पीड़ित के माता, पिता, भाई, बहन या कोई भी रक्त या विवाह संबंधी और गोद लिया हुआ व्यक्ति करा सकता है।
इस विधेयक में जबरन धर्मांतरण पर अलग-अलग श्रेणियों में एक वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की सजा और पंद्रह हजार से लेकर पचास हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। कोर्ट को यह अधिकार दिया गया है कि वह पीड़ित को क्षतिपूर्ति के तहत पांच लाख रुपये तक का हर्जाना देने का आदेश भी कर सकता है। यही नहीं एक से अधिक बार धर्मांतरण से जुड़ा अपराध करने पर दोगुनी सजा का प्रावधान है।
- कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से करना चाहता है तो उसे 60 दिन पहले डीएम या उनके द्वारा अधिकृत किए गए एडीएम के यहां आवेदन करना पड़ेगा।
- अगर कोई व्यक्ति या संस्था धर्म परिवर्तन का आयोजन करवा रहे हों उन्हें एक माह पहले डीएम या एडीएम को इसकी जानकारी देनी होगी। इसके बाद डीएम के स्तर से पुलिस के जरिए करवाई जाएगी। अगर कोई दबाव बनाकर, लालच देकर या अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके जिला प्रशासन को गलत सूचना देकर धर्म परिवर्तन करवाता पाया जाएगा तो यह अवैध और शून्य हो जाएगा।
- खुद को जबरन धर्मांतरण में निर्दोष साबित करने का भार आरोपी पर ही होगा।
- धर्म परिवर्तन के लिए परामर्श देने वाले, मदद करने वाले और अपराध के लिए दुष्प्रेरित करने वालों को भी इसमें आरोपित बनाया जाएगा।
सरकार ने गत वर्ष इसे अध्यादेश के रूप में लाकर लागू किया था। तब विधानमंडल सत्र नहीं चल रहा था। किसी अध्यादेश को छह माह में विधानमंडल की मंजूरी दिलाना जरूरी होता है। इसलिए उक्त अध्यादेश को कानूनी मान्यता देने के लिए विधेयक के रूप में लाकर उसे कैबिनेट बाई सर्कुलेशन पास कर दिया गया। विधेयक को 18 फरवरी से शुरू हो रहे विधानमंडल सत्र में दोनों सदनों में रखा जाएगा। पास होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। विधेयक में यह भी व्यवस्था की गई है कि अगर कोई अपने पूर्व के धर्म को वापस ग्रहण करता है तो वह इस अध्यादेश के दायरे में नहीं आएगा।
जबरन धर्मांतरण कराने वाले को 10 वर्ष तक की सजा, 50 हजार का जुर्माना
यूपी विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2021 के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति जबरन, लालच देकर, दबाव बनाकर या अपने प्रभाव में लेकर किसी का धर्म परिवर्तन कराता है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी। यह एफआईआर पीड़ित के माता, पिता, भाई, बहन या कोई भी रक्त या विवाह संबंधी और गोद लिया हुआ व्यक्ति करा सकता है।
इस विधेयक में जबरन धर्मांतरण पर अलग-अलग श्रेणियों में एक वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की सजा और पंद्रह हजार से लेकर पचास हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। कोर्ट को यह अधिकार दिया गया है कि वह पीड़ित को क्षतिपूर्ति के तहत पांच लाख रुपये तक का हर्जाना देने का आदेश भी कर सकता है। यही नहीं एक से अधिक बार धर्मांतरण से जुड़ा अपराध करने पर दोगुनी सजा का प्रावधान है।
- कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से करना चाहता है तो उसे 60 दिन पहले डीएम या उनके द्वारा अधिकृत किए गए एडीएम के यहां आवेदन करना पड़ेगा।
- अगर कोई व्यक्ति या संस्था धर्म परिवर्तन का आयोजन करवा रहे हों उन्हें एक माह पहले डीएम या एडीएम को इसकी जानकारी देनी होगी। इसके बाद डीएम के स्तर से पुलिस के जरिए करवाई जाएगी। अगर कोई दबाव बनाकर, लालच देकर या अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके जिला प्रशासन को गलत सूचना देकर धर्म परिवर्तन करवाता पाया जाएगा तो यह अवैध और शून्य हो जाएगा।
- खुद को जबरन धर्मांतरण में निर्दोष साबित करने का भार आरोपी पर ही होगा।
- धर्म परिवर्तन के लिए परामर्श देने वाले, मदद करने वाले और अपराध के लिए दुष्प्रेरित करने वालों को भी इसमें आरोपित बनाया जाएगा।
भूजल को रिचार्ज करने के लिए प्रारंभ की गई अटल भूजल योजना अब सभी 75 जिलों में
भूजल को रिचार्ज करने के लिए प्रारंभ की गई अटल भूजल योजना अब सभी 75 जिलों में लागू होगी। उत्तर प्रदेश अटल भूजल योजना के संचालन व क्रियान्वयन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, मार्गदर्शी सिद्धांत और दिशा-निर्देशों से संबंधित प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। जल शक्ति मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह ने बताया कि अभी अटल भूजल योजना बुंदेलखंड के छह जिलों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों में केंद्र सरकार की मदद से चल रही है। अब इसे शेष 65 जिलों में भी लागू किया जाएगा।
इसके तहत भूजल स्तर को ऊपर उठाने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा। कुओं और तालाबों को सुधारा जाएगा। प्रत्येक सरकारी बिल्डिंग, स्कूल और कॉलेजों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य है। 300 वर्ग मीटर या उससे ज्यादा क्षेत्रफल के भवनों का नक्शा तभी पास होगा, जब रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान होगा। इसके तहत गांव का पानी गांव में, शहर का पानी शहर में और छत का पानी जमीन में अभियान चलाया जाएगा। इसका उद्देश्य डार्क जोन को सेफ जोन में लाना और सेफ जोन के जलस्तर को और ऊपर उठाना है। इसके लिए भूजल प्रबंधन, संवर्धन विनियमन अधिनियम-2019 भी प्रदेश में लागू किया गया है। जल शक्ति मंत्री ने बताया कि इस योजना में शामिल किए गए शुरुआती 10 जिलों में केंद्र सरकार के जो भी निर्देश आएंगे, उसी के तहत कार्य होगा।
इसके तहत भूजल स्तर को ऊपर उठाने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा। कुओं और तालाबों को सुधारा जाएगा। प्रत्येक सरकारी बिल्डिंग, स्कूल और कॉलेजों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य है। 300 वर्ग मीटर या उससे ज्यादा क्षेत्रफल के भवनों का नक्शा तभी पास होगा, जब रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान होगा। इसके तहत गांव का पानी गांव में, शहर का पानी शहर में और छत का पानी जमीन में अभियान चलाया जाएगा। इसका उद्देश्य डार्क जोन को सेफ जोन में लाना और सेफ जोन के जलस्तर को और ऊपर उठाना है। इसके लिए भूजल प्रबंधन, संवर्धन विनियमन अधिनियम-2019 भी प्रदेश में लागू किया गया है। जल शक्ति मंत्री ने बताया कि इस योजना में शामिल किए गए शुरुआती 10 जिलों में केंद्र सरकार के जो भी निर्देश आएंगे, उसी के तहत कार्य होगा।
प्रत्येक राजकीय विश्वविद्यालय में अलग-अलग निर्धारित होंगे आरक्षण
राज्य सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्था (अध्यापक संवर्ग आरक्षण) विधेयक-2021 को मंगलवार को कैबिनेट बाई सर्कुलेशन मंजूरी दे दी है। इसके तहत राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की सीधी भर्ती के लिए प्रत्येक राजकीय विवि को अलग-अलग यूनिट मानकर आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। इसी तरह सहायता प्राप्त महाविद्यालयों को से प्रत्येक को अलग-अलग यूनिट मानकर आरक्षण निर्धारित किया जाएगा। जबकि सभी राजकीय महाविद्यालयों को एक यूनिट मानते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण निर्धारित किए जाएंगे। इस विधेयक को मंजूरी केंद्रीय शैक्षिक संस्थाओं अधिनियम 2019 के अनुसार दी गई है। विधानमंडल के बजट सत्र में इस विधेयक को दोनों सदनों में रखा जाएगा।
भारत सरकार ने केंद्रीय शैक्षिक संस्थाओं (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अधिनियम 2019 में सीधी भर्ती के लिए केंद्रीय विवि या संस्था को एक यूनिट मानते हुए आरक्षण लागू किया है। जबकि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा सीधी भर्ती में एससी को 21 प्रतिशत, एसटी को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। अभी तक प्रत्येक विषय के विभाग को इकाई मानकर आरक्षण निर्धारित किया जाता है। आरक्षित वर्ग के लोगों ने इसे लेकर देश भर में आंदोलन किया था। उसके बाद केंद्र सरकार ने अधिनियम लागू किया था।
प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों, सहायताप्राप्त महाविद्यालयों, सहायताप्राप्त चिकित्सा शिक्षा संस्थानों और ऐसी सरकारी शैक्षिक संस्थाओं जहां सरकार की ओर से राज्य स्तरीय संवर्ग का सृजन किया हो, वहां पर नई व्यवस्था से आरक्षण लागू किया जाएगा। जबकि अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं, उत्कृष्ट संस्थाओं, अनुसंधान संस्थाओं और राष्ट्रीय व सामरिक महत्व की संस्थाओं में यह लागू नहीं होगा।
गौरतलब है कि पिछले साल 24 नवंबर को उत्तर प्रदेश शैक्षिक संस्था (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अध्यादेश-2020 पारित किया गया था। जिस पर राज्यपाल के विधि परामर्शी और प्रदेश सरकार के विधि एवं न्याय विभाग ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिभाषा पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने इस अध्यादेश को वापस ले लिया था। विभाग ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिभाषा अब स्पष्ट कर दी है। इसमें उत्तर प्रदेश लोक सेवा (आर्थिक रूप से कमजोर वर्र्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम 2020 (उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन 2020) के दायरे में आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लोगों को शामिल किया जाएगा।
भारत सरकार ने केंद्रीय शैक्षिक संस्थाओं (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अधिनियम 2019 में सीधी भर्ती के लिए केंद्रीय विवि या संस्था को एक यूनिट मानते हुए आरक्षण लागू किया है। जबकि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा सीधी भर्ती में एससी को 21 प्रतिशत, एसटी को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। अभी तक प्रत्येक विषय के विभाग को इकाई मानकर आरक्षण निर्धारित किया जाता है। आरक्षित वर्ग के लोगों ने इसे लेकर देश भर में आंदोलन किया था। उसके बाद केंद्र सरकार ने अधिनियम लागू किया था।
प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों, सहायताप्राप्त महाविद्यालयों, सहायताप्राप्त चिकित्सा शिक्षा संस्थानों और ऐसी सरकारी शैक्षिक संस्थाओं जहां सरकार की ओर से राज्य स्तरीय संवर्ग का सृजन किया हो, वहां पर नई व्यवस्था से आरक्षण लागू किया जाएगा। जबकि अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं, उत्कृष्ट संस्थाओं, अनुसंधान संस्थाओं और राष्ट्रीय व सामरिक महत्व की संस्थाओं में यह लागू नहीं होगा।
गौरतलब है कि पिछले साल 24 नवंबर को उत्तर प्रदेश शैक्षिक संस्था (अध्यापक संवर्ग में आरक्षण) अध्यादेश-2020 पारित किया गया था। जिस पर राज्यपाल के विधि परामर्शी और प्रदेश सरकार के विधि एवं न्याय विभाग ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिभाषा पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने इस अध्यादेश को वापस ले लिया था। विभाग ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिभाषा अब स्पष्ट कर दी है। इसमें उत्तर प्रदेश लोक सेवा (आर्थिक रूप से कमजोर वर्र्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम 2020 (उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन 2020) के दायरे में आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लोगों को शामिल किया जाएगा।