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यूपी : सियासी वैतरणी पार करने को बसपा फिर ब्राह्मणों को थमाएगी पतवार, अयोध्या से ब्राह्मण सम्मेलनों का होगा आगाज
Tue, 20 Jul 2021 07:47 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/अमित मुद्गल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/अमित मुद्गल
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 20 Jul 2021 07:47 PM IST
सार
बसपा प्रमुख मायावती 2007 की उस सोशल इंजीनयरिंग को दोहराना चाहती हैं जिसमें उन्हें सत्ता के शिखर तक पहुंचाने के लिए ब्राह्मणों ने अहम भूमिका अदा की थी।
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बसपा प्रमुख मायावती
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बसपा एक बार फिर से ब्राह्मणों पर दांव लगाने जा रही है। दरअसल बसपा प्रमुख मायावती 2007 की उस सोशल इंजीनयरिंग को दोहराना चाहती हैं जिसमें उन्हें सत्ता के शिखर तक पहुंचाने के लिए ब्राह्मणों ने अहम भूमिका अदा की थी। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में जिस पार्टी की भी प्रदेश में सरकार बनी, उनमें सबसे ज्यादा ब्राह्मण विधायक रहे।
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ऐसे में एक बार फिर से मायावती ने एलान कर दिया है कि वह अपना पुराना फॉर्मूला वापस ला रही हैं, जिसके केंद्र में मुख्य रूप से ब्राह्मण होेंगे। ब्राह्मणों को एक बार फिर पार्टी से जोड़ने के लिए के सबसे अहम चेहरे राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्रा को कमान दी गई है। यूं तो प्रथम चरण में छह शहरों में ब्राह्मण सम्मेलन करने की पार्टी की योजना है पर इसकी शुरुआत राम नगरी अयोध्या से करने की घोषणा की गई है। इसके सियासी मायने भी हैं।
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चूंकि भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा राम मंदिर रहा है तो बसपा वहीं से संदेश देना चाहती है। प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का हमेशा से अहम योगदान रहा था। बसपा पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ 2007 में सत्ता में आई थी। उस चुनाव में बसपा ने 56 ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जिसमें 41 ने जीत दर्ज की। लेकिन उसके बाद बसपा ने अपनी योजना बदली और सत्ता से बाहर हो गई। 2012 के चुनाव में बसपा के दस ब्राह्मण विधायक जीते तो 2017 में यह संख्या चार ही रह गई।
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ब्राह्मण विधायकों का दबदबा
2007 में बसपा की सरकार बनी तो उसके पास सबसे ज्यादा 41 ब्राह्मण विधायक थे। 2012 में सपा की सरकार बनी तो उसके पास सबसे ज्यादा 21 ब्राह्मण विधायक थे। 2017 में भाजपा की सरकार बनी तो उसके सबसे ज्यादा 46 ब्राह्मण विधायक जीतकर आए।
किस चुनाव में कितने ब्राह्मण विधायक
वर्ष बसपा भाजपा सपा कांग्रेस
1993 कोई नहीं 17 2 5
1996 2 14 3 4
2002 4 8 10 1
2007 41 3 11 2
2012 10 6 21 3
2017 4 46 3 1
60 से ज्यादा जिलों पर खास नजर
मायावती की नजर उप्र के साठ से ज्यादा जिलों पर है। बसपा थिंक टैंक मानना है कि इन जिलों में ब्राह्मण वोटर दस प्रतिशत से ज्यादा है और इनमें से तीस जिलों में यह यह संख्या 13 फीसदी से भी ज्यादा है। खास तौर पश्चिमी उप्र में मेरठ, गाजियाबाद, मथुरा, हाथरस, बुलंदशहर, मुरादाबाद, अलीगढ़, औरैया, सहारनपुर आदि जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है तो वहीं मथुरा में भी ब्राह्मण वोटर काफी मजबूत स्थिति में हैं। उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश में अयोध्या, प्रतापगढ़, महाराजगंज, गोरखपुर, जौनपुर, सिद्धार्थ नगर, वाराणसी, बस्ती, बलरामपुर, गोंडा, संत कबीर नगर, सोनभद्र, मिर्जापुर, कुशीनगर, देवरिया में ब्राह्मण मतदाताओं की औसत उपस्थिति 14 प्रतिशत तक है। इनमें दलितों की संख्या तो कई जिलों में 22 प्रतिशत से ज्यादा है। ऐसे में यदि यह समीकरण बन गया तो बसपा की राह आसान हो सकती है।