यूपी विधानसभा चुनाव : विपक्ष के आरोप भी बनेंगे भाजपा के चुनावी हथियार, राष्ट्रवाद से मिलेगी धार
प्रधानमंत्री के काशी और शाहजहांपुर के कार्यक्रम में भले ही पांच दिन का अंतर हो। पर, मोदी की बातों का सिरा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण समारोह में कही गई बातों को ही आगे सिलसिलेवार बढ़ाता दिखा।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सांस्कृतिक राजधानी और अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी से 13 दिसंबर को बाबा विश्वनाथ धाम के नवनिर्मित कॉरिडोर के पहले चरण के लोकार्पण से 2022 की चुनावी बिसात पर यूपी में विरासत एवं विकास पर विपक्ष की घेराबंदी का संकेत दिया था। पांच दिन बाद उन्होंने पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां एवं ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारियों की धरती शाहजहांपुर से यह साफ कर दिया कि विपक्ष उन पर या भाजपा की सरकारों पर जो आरोप लगाएगा, उन्हीं हथियार बनाकर उसके खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।
इसे ताकत देगा ‘यूपी प्लस योगी बहुत हैं उपयोगी’ नारा। धार मिलेगी काशी, अयोध्या सहित सनातन संस्कृति को सहेजने तथा संवारने के लिए हो रहे अन्य कामों से। विपक्ष खासतौर से सपा को भाजपा घेरेगी पांच साल पहले पश्चिमी यूपी में सूरज डूबते ही सड़़कों पर कट्टा लहराने, बेटियों के स्कूल-कॉलेज जाने में होने वाली कठिनाइयों व माफिया को संरक्षण के साथ कानून-व्यवस्था के सवालों पर।
प्रधानमंत्री के काशी और शाहजहांपुर के कार्यक्रम में भले ही पांच दिन का अंतर हो। पर, मोदी की बातों का सिरा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण समारोह में कही गई बातों को ही आगे सिलसिलेवार बढ़ाता दिखा। उन्होंने काशी विश्वनाथ कारिडोर के उल्लेख से यह कहते हुए कि कुछ लोगों को देश के विरासत और विकास दोनों पर उनके काम करने से दिक्कत होती है।
मेरठ से प्रयागराज तक बनने वाले गंगा एक्सप्रेस-वे के शिलान्यास के लिए शनिवार को शाहजहांपुर आए मोदी ने किसी का नाम लिए बिना जो कुछ कहा उससे साफ दिखा कि निशाना सपा और उसके मुखिया अखिलेश यादव ही हैं। मोदी ने शाहजहांपुर से एक बार फिर यह साफ कर दिया कि वे उन नेताओं में नहीं हैं जो आरोपों का खंडन करें। उनका जवाब दें। वे ऐसे नेता हैं जो विपक्ष के तीरों को ज्यादा गति और धार देकर उसी दिशा में मोड़ने की महारथ रखते हैं।
हिंदुत्व पर विपक्ष को घेरने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने शायद वाराणसी को संसदीय क्षेत्र बनाने का फैसला बिना हिंदुत्व का नाम लिए बिना प्रतीकों के इस्तेमाल से ही धार देने की रणनीति के तहत किया था ताकि विपक्ष को अयोध्या के नाम पर मुसलमानों का ध्रुवीकरण का मौका भी न मिले और हिंदुत्व पर राजनीतिक बिसात मजबूती से बिछती चली जाए। सनातन संस्कृति, विरासत जैसे शब्द इसी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं। जिसे कहते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। राजनीतिक शास्त्री प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं कि राजनीति में एक चाल ऐसी भी होती है जिसमें सामने वाले पर हमला करने के बजाय उसकी तरफ से लोगों के सरोकारों व संस्कृति के कामों पर हमलों को मुद्दा बनाकर उसे जनाक्रोश के केंद्र में ले आया जाए।
योगी के नाम से मिलेगी धार
वैसे तो अक्तूबर से ही प्रधानमंत्री मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की तरफ से योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ने का संदेश दिया जा रहा है। शाहजहांपुर की सभा में प्रधानमंत्री की बातों से यह भी साफ हो गया कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश की 2022 की चुनावी बिसात में योगी आदित्यनाथ के चेहरे को दूरगामी रणनीति के तहत आगे किया है। शायद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जानता है कि योगी के मैदान में होने पर विपक्ष उन्हीं को केंद्र बनाकर तीखे हमले बोलेगा। अपने वोट को सहेजने के लिए उन्हें एक वर्ग विशेष का दुश्मन बताएगा। संकेत साफ है कि विपक्ष खासतौर से सपा योगी पर जितना हमला बोलेगी भाजपा को भ्रष्टाचारियों, माफिया और अपराधियों के संरक्षण को लेकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने का उतना ही मौका मिलेगा।
विरासत के साथ सामर्थ्य व राष्ट्रवाद भी सियासी हथियार
मोदी ने करीने से खुद के और योगी सरकार के कामों को विरासत के साथ देश व प्रदेश तथा लोगों की सामर्थ्य के साथ राष्ट्रवाद के सरोकारों से जोड़ते हुए भी विपक्ष की घेराबंदी की कोशिश की है। राजनीतिक शास्त्री प्रो. एस.के. द्विवेदी कहते हैं कि पक्ष व विपक्ष किसी को सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि गैर भाजपा सरकारों ने विकास का काम ही नहीं किया है। पर, वह अपने काम बताने और वर्तमान सरकार के कार्यों को जारी रखने का आश्वासन देने के बजाय सिर्फ एक वर्ग का वोट हासिल करने के लिए जिस रणनीति पर चल रहा है, वह उसके लिए कठिनाइयां बढ़ाएगा। प्रधानमंत्री ने रणनीति के तहत ही ‘यूपी प्लस योगी बहुत हैं उपयोगी’ का नारा दिया ताकि लोगों को यह संदेश मिल जाए कि चुनाव में उनकी जरा सी चूक न सिर्फ सनातन संस्कृति की विरासत के संरक्षण व सहेजने के काम में ब्रेक लगा सकती है, बल्कि गरीबों के कल्याण के काम व प्रदेश के विकास की गति भी रोक सकती है।