यूपी को करोड़ों का नुकसान पहुंचाएगा जेटली का बजट
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केंद्रीय बजट से फौरी तौर पर यूपी को फायदा के बजाय नुकसान ज्यादा होने जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 के बजट में 2015-16 का बजट पुनरीक्षित किया है जिससे चालू वित्त वर्ष में केंद्रीय करों में प्रदेश की हिस्सेदारी 3340 करोड़ रुपये कम हो गई है।
राज्य सरकार द्वारा विधानमंडल में पेश किए गए सूबे के 2016-17 के बजट पर भी इसका असर पड़ेगा। बजट में घोषित नई योजनाओं पर भी इसका प्रभाव नजर आ सकता है।
केंद्र ने 2015-16 के बजट में केंद्रीय करों से प्रदेश की हिस्सेदारी 94,313 करोड़ रुपये तय की थी, लेकिन 2016-17 के बजट के साथ केंद्र ने 2015-16 का बजट पुनरीक्षित कर दिया है।
इससे यूपी की हिस्सेदारी 94,313 करोड़ रुपये से घटकर 90,973 करोड़ रह गई है। इसके अलावा केंद्र ने 2016-17 में यूपी का आवंटन 1,02,650 करोड़ करने की बात कही है जो 2015-16 के मूल बजट से मात्र 1.84 फीसदी ज्यादा है। राज्य सरकार केंद्र के मूल आवंटन से 10-11 प्रतिशत की वृद्धि मानते हुए अपना अगला बजट बनाती है।
अब केंद्र से आवंटन में कमी हो जाने से प्रदेश के बजट अनुमानों पर पर असर पड़ना तय है। हालांकि अभी विधानमंडल से बजट पास होना बाकी है।
ऐसे में केंद्र द्वारा पुनरीक्षित बजट के आधार पर राज्य सरकार को भी अपने वर्ष 2016-17 के बजट के आकार में बदलाव करना पड़ सकता है।
सूबे के सभी गांवों में अक्तूबर तक पहुंच जाएगी बिजली
केंद्र ने भले ही 1 मई 2018 तक देश के सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा हो, पर प्रदेश में अक्तूबर 2016 तक ही सभी गांवों और मजरों में बिजली पहुंचा देने की तैयारी है।
इसके लिए तेजी से काम हो रहा है और लगातार मॉनिटरिंग भी हो रही है। पावर कॉर्पोरेशन के आला अधिकारियों की मानें तो प्रदेश में बमुश्किल 400-500 गांवों का ही विद्युतीकरण शेष रह गया है।
वहीं लगभग डेढ़ लाख मजरों में बिजली पहुंचनी बाकी है। मार्च तक लगभग 50 हजार मजरों के विद्युतीकरण का लक्ष्य है। शेष एक लाख मजरों में अक्तूबर तक विद्युतीकरण कराने की कार्ययोजना तैयार की गई है।
इस पर लगभग 11,900 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। शेष गांवों और मजरों के विद्युतीकरण के लिए केंद्र से लगभग 5000 करोड़ की मदद मांगने का प्रस्ताव है।
पावर कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक एपी मिश्र का कहना है कि अक्तूबर तक प्रदेश के सभी गांवों व मजरों के विद्युतीकरण का काम पूरा करा लिया जाएगा।
दलहन की खेती का बढ़ सकेगा रकबा
दलहनी फसलों के बीजों पर ज्यादा अनुदान मिलने से इसके रकबे को बढ़ाने में मदद मिलेगी। फिलहाल इन बीजों पर केंद्र सरकार 2500 रुपये प्रति क्विंटल और राज्य सरकार 800 रुपये प्रति क्विंटल अनुदान देती है।
यूपी में दलहनी फसलों का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। सबसे ज्यादा दलहनी फसलें बुंदेलखंड में बोई जाती हैं। लेकिन, इस बार सूखे के कारण वहां के 50 फीसदी रकबे में बोआई ही नहीं हुई है।
वेस्ट यूपी और अवध में जहां सिंचाई की ठीकठाक व्यवस्था है, वहां भी किसान दलहनी फसलों की खेती में रुचि नहीं ले रहे हैं। इसकी वजह कभी मौसम तो कभी बीमारी की मार बताई जाती है।
कृषि विभाग के मुताबिक, वित्त वर्ष 2015-16 में अभी तक किसानों को दलहनी फसलों पर कुल 142 करोड़ रुपये अनुदान बांटा गया। इसमें 100 करोड़ रुपये केंद्र ने दिए थे, जबकि 42 करोड़ रुपये राज्य सरकार का हिस्सा था।
इस मद में कृषि विभाग के पास कुल उपलब्ध बजट 185 करोड़ रुपये है, जिसमें से 50 करोड़ रुपये राज्य सरकार ने दिया है।
कृषि विभाग के मुताबिक, दालों के क्षेत्र में आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए जरूरी है कि दलहनी फसलों के लिए अनुदान बढ़ाया जाए। आम बजट में दलहनी फसलों पर अनुदान योजना का दायरा बढ़ाने का जो फैसला किया गया है, उसका फायदा यूपी को भी मिलेगा।
बढ़ेगा फसल बीमा का दायरा किसानों को होगा फायदा
केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 5500 करोड़ रुपये का प्रावधान किए जाने से यूपी के किसानों को ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद है।
चालू वित्त वर्ष में फसल बीमा के प्रीमियम के तौर पर केंद्र और राज्य सरकार 300-300 करोड़ रुपये देगी। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में प्रीमियम की राशि कम होने से जहां इसके दायरे में ज्यादा किसान आ सकेंगे, वहीं जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़े प्रदेश होने के नाते उसके हिस्से में ज्यादा बजट आने की भी संभावना है।
यहां बता दें कि वर्ष 2014-15 से उत्तर प्रदेश के 65 जिलों में संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना लागू है। बाकी दस जिलों यानी मैनपुरी, मथुरा, मुरादाबाद, शाहजहांपुर, फतेहपुर, फैजाबाद, रायबरेली, जौनपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र में मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू है।
दोनों ही योजनाओं में बीमित राशि का 4-16 प्रतिशत तक बीमा कंपनियों को बतौर प्रीमियम भुगतान किया जाता है। इसमें किसान से अधिकतम बीमित राशि का 6 प्रतिशत हिस्सा लिया जाता है।
बाकी राशि केंद्र और राज्य सरकार बराबर-बराबर वहन करती है।खरीफ-2014 में 2.33 करोड़ किसानों में से 7.36 लाख का ही फसल बीमा हुआ और इसका लाभ केवल 3.23 लाख किसानों को ही मिला।
उन्हें कुल 566.15 करोड़ रुपये मुआवजा बांटा गया। कृषि विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में राज्य के हिस्से में कितनी राशि आएगी, यह तो बाद में ही पता चल पाएगा, लेकिन इतना तय है कि थोड़े प्रयासों से लाभार्थी किसानों की संख्या 50 लाख तक पहुंचाई जा सकती है।