यूपी की राजनीति की दिशा और दशा बदलेगा अयोध्या पर फैसला, भाजपा को मिलेगा बड़ा फायदा
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उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के ज्यादातर हिस्सों में राजनीतिक उलटफेर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के व्यापक सियासी मायने हैं। यह फैसला न सिर्फ प्रदेश की राजनीतिक दिशा व दशा बदलेगा बल्कि नए सियासी समीकरणों की भी नींव रखेगा।
अभी तक इस मुद्दे पर मुस्लिमों के ध्रुवीकरण को धार देकर भाजपा के खिलाफ मैदान में ताल ठोकने वाले विरोधी दलों को सियासत के लिए नए उपकरण तलाशने होंगे। यह सही है कि इस फैसले को लेकर कोई अपनी पीठ ठोककर सियासी लाभ लेने की कोशिश नहीं कर सकता। अब चुनाव में यह मुद्दा उस तरह नहीं दिखेगा जैसा अभी तक दिखता रहा है। फिर भी किसी न किसी रूप में यह भाजपा की सियासी साख बढ़ाने में मददगार जरूर बनेगा।
दरअसल, अयोध्या मामले के तूल पकड़ने के साथ 90 के दशक से इस मुद्दे पर हिंदू व मुस्लिम ध्रुवीकरण की शुरू हुई सियासत पर इस निर्णय ने विराम लगा दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह का फैसला दिया है उसको लेकर कोई भी अपनी जीत और दूसरे के हारने का दावा नहीं कर सकता।
बावजूद इसके यह ध्यान में रखना होगा कि भाजपा शुरू से कहती रही है कि वह अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण की बाधाएं दूर कर उसके निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी। आपसी सहमति और न्यायालय के निर्णय से यह हो गया तो ठीक वरना केंद्र में दो तिहाई बहुमत की सरकार बनने पर कानून बनाकर मंदिर का रास्ता निकालेगी। इसलिए भले ही सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ हो लेकिन भाजपा को इसका किसी न किसी रूप में लाभ जरूर मिलेगा। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने यह कहकर कि उनकी भूमिका श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण है जिसे वे करेंगे, साफ कर दिया है कि संतों के साथ संघ परिवार आगे भी इस मुद्दे पर सक्रिय दिखेगा। जाहिर है कि इसका लाभ किसी न किसी रूप में भाजपा को मिलेगा।
विपक्ष की बढ़ेगी चुनौती, मुस्लिमों के बीच बढ़ेगा भाजपा का भरोसा
विपक्ष की चुनौती इसलिए भी बढ़ेगी क्योंकि मंदिर निर्माण के सहारे संघ परिवार किसी न किसी रूप में अपने मूल उद्देश्य हिंदुत्व की एकजुटता के अभियान को भी आगे बढ़ाएगा। इसका उसे पहले की तुलना में अधिक लाभ होगा लेकिन दूसरी तरफ भाजपा विरोधी दलों के पास मुस्लिम ध्रुवीकरण को धार देने का फिलहाल कोई मु्द्दा नहीं है।
ऊपर से संघ परिवार और भाजपा मुस्लिमों के बीच भी संपर्क और संवाद करते हुए पकड़ व पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके नतीजे भी भले ही बड़े उलटफेर वाले न हों लेकिन सांकेतिक रूप से संघ परिवार का उत्साह बढ़ाने वाले तो रहे ही हैं। इसे देखते हुए भी विपक्ष के लिए भाजपा का मुकाबला करना और कठिन होगा।
कारण, अयोध्या पर फैसले के मद्देनजर भाजपा सरकार ने प्रदेश में शांति बनाए रखने में सफलता हासिल कर अपनी साख बढ़ाई है। इससे उसे मुस्लिम समाज के बीच अपना भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे भी विपक्ष की चुनौती बढ़ेगी। उन्हें प्रदेश में भाजपा के विरोध में सियासी मजबूती हासिल करने के लिए जाति और मुस्लिम तुष्टीकरण की राह छोड़कर आम लोगों के वास्तविक मुद्दों पर फोकस करना होगा। इस फैसले के बाद अब उनके पास जाति और धर्म के नाम पर वोट हासिल करने का मौका नहीं रहा।
समाज में विखंडन पैदा करने वालों की राजनीति से विदाई तय
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. कौशल किशोर भी कहते हैं कि इस फैसले से छद्म धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करके समाज में विखंडन पैदा करने वालों की राजनीति से विदाई तय हो गई है। उन्हें अस्तित्व बचाना है तो मुद्दों पर राजनीति करना सीखना होगा। यह फैसला सियासत में भारतीयता का पुट बढ़ाएगा। वोट की खातिर हिंदू-मुसलमानों को अपने-अपने पक्ष में भड़काने वाले भी सबक लेंगे।
मुस्लिम वोट बैंक और जातीय सियासत पर भी विराम लगेगा क्योंकि मुसलमानों ने यह समझ लिया है कि भाजपा की सरकारों में उन्हें वैसा नुकसान नहीं होने वाला जैसा उनके दिमाग में भरने की कोशिश होती रही है। वे यह भी समझ चुके हैं कि सपा और बसपा अपना जातीय वोट नहीं संभाल पा रही हैं। उनके साथ रहने से कुछ नहीं हासिल होने वाला। परिस्थितियों पर गौर करें तो प्रो. किशोर की बात सही लगती है कि विपक्ष के जातीय गणित की राजनीति पहले ही काफी कमजोर हो चुकी है। जिस तरह मुलायम और मायावती जैसे चेहरों के बावजूद भाजपा ने पिछड़ों व काफी ठीक तरह यादव व अनुसूचित जाति के बीच सेंध लगाकर चुनावी सफलता हासिल की, उससे यह साबित हो चुका है।
रही मुस्लिमों की बात तो इस फैसले के बाद ऐसा नहीं लगता कि वे पहले की तरह ही भाजपा के विरोध में इनके साथ खड़े होंगे। यह बात अलग है कि बदली परिस्थितियों में वे कोई नया विकल्प तलाशने की कोशिश करें। हालांकि सपा और बसपा मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कोई नया रास्ता तलाशने की कोशिश करेंगी। कांग्रेस की बात करें तो सबसे ज्यादा संकट में वही है। इस फैसले के बाद उसे उत्तर प्रदेश में नए सिरे से राजनीति की दिशा व दशा तय करनी होगी।