{"_id":"5cfab369bdec22076357bf0b","slug":"the-right-to-revise-the-budget-is-out-of-hand-the-mayor","type":"story","status":"publish","title_hn":"महापौर के हाथ से निकला बजट संशोधन का अधिकार, नगर आयुक्त की ओर से पेश बजट ही माना जाएगा पास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महापौर के हाथ से निकला बजट संशोधन का अधिकार, नगर आयुक्त की ओर से पेश बजट ही माना जाएगा पास
Sat, 08 Jun 2019 12:26 AM IST
सौरभ दिक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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Published by: सौरभ दिक्षित
Updated Sat, 08 Jun 2019 12:26 AM IST
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लखनऊ
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बीती 25 फरवरी को नगर निगम कार्यकारिणी ने जो बजट पास किया था, अब वही लागू माना जाएगा। इसमें संशोधन करने का अधिकार महापौर के हाथ से निकल गया है। नगर निगम अधिनियम की धारा 146 में दिए प्रावधान के तहत जो बजट नगर आयुक्त ने कार्यकारिणी में पेश किया था, उसी को पास माना जाएगा।
इससे अब 95 लाख के पार्षद कोटे में 50 लाख के काम 14वें वित्त से और शेष 45 लाख के काम नगर निगम निधि से कराए जाएंगे। नए वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए नगर निगम कार्यकारिणी ने 21 अरब रुपये का बजट पास किया था।
हालांकि, इसकी कार्यवाही तीनजून को जारी नहीं हुई थी और नगर निगम प्रशासन की ओर से सामान्य तौर पर खर्च किया जा रहा था। बिना बजट लागू हुए नगर निगम कैसे खर्च कर रहा है, इसे लेकर जब महापौर से बात की गई तो उन्होंनेकार्यकारिणी की कार्यवाही जारी होने और बजट न लागू हो पाने के पीछे नगर निगम प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।
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कहा कि प्रशासन ने उन्हें संशोधित कार्यवाही और बजट नहीं भेजा। इस कारण कार्यवाही जारी नहीं हो पाई। इसे लेकर ‘अमर उजाला’ ने चार जून को प्रमुखता से खबर प्रकाशित की। इसके बाद नगर निगम प्रशासन सकते में है। कार्यकारिणी सदस्यों ने भी इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि ऐसा कैसे हुआ।
बजट की कार्यवाही समय से जारी होनी चाहिए थी। वहीं, महापौर ने भी तीन जून की तारीख में नगर आयुक्त को कार्यकारिणी की संशोधित कार्यवाही भेजने का पत्र भेज दिया। इसके बाद कानूनी पेंच फंस गया। पत्र मिलने से पहले माना जा रहा था हो सकता है कि कार्यवाही 31 मार्च से पहले की तारीख में जारी हो जाएगी।
इससे बजट पर संकट नहीं आएगा, लेकिन महापौर के पत्र से खेल बिगड़ गया। इसके बाद अब कानूनी सलाह लेने और कार्यकारिणी सदस्यों के राय के बाद बजट कार्यकारिणी और सदन की बजाए नगर आयुक्त का मान लिया गया है। इससे अब बजट में जो संशोधन किए जाने की तैयारी थी वह नहीं हो पाएंगे और जो बजट नगर आयुक्त ने पेश किया था वही माना जाएगा।
अब नगर आयुक्त का हो गया बजट
भाजपा से नगर निगम कार्यकारिणी के सदस्य नागेंद्र सिंह चौहान का कहना है कि निगम के मुख्य वित्त एंव लेखाधिकारी से बात हुई है। उन्होंने बताया कि नगर निगम अधिनियम की धारा 146 के तहत यदि कार्यकारिणी और सदन से किसी कारण बजट पास नहीं हो पाया तो नगर आयुक्त की ओर से पेश किया गया बजट ही माना जाएगा। इसमें किसी तरह का संशोधन नहीं किया जाएगा। ऐसे में अब यह नगर आयुक्त का बजट हो गया।
कार्यकारिणी में जो पेश हुआ वही रहेगा बजट
वरिष्ठ पार्षद व कांग्रेस से कार्यकारिणी सदस्य गिरीश मिश्रा का कहना है कि नगर निगम के इतिहास में पहली बार इस तरह का संवैधानिक संकट आया है। इसे दूर करने के लिए विधिक राय भी ली गई। मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी से भी बात हुई। इसमें यह सहमति बनी कि अब बजट में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता और न ही अब दो महीने से अधिक देरी होने के बाद कार्यवाही जारी की जा सकती है। जो बजट 25 फरवरी को कार्यकारिणी में पेश हुआ था वह अब उसी स्वरूप में रहेगा।
नियम अनुसार होगा काम
महापौर संयुक्ता भाटिया ने बताया कि जो काम होगा व नियम के तहत होगा। सबकी सहमति से जो भी तय होगा उस पर काम किया जाएगा। बजट जनहित के कार्यों के लिए है। इसके लिए ही खर्च होना चाहिए। नगर निगम अधिनियम में जो भी व्यवस्था है उसको सभी लोग मानेंगे।
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इससे अब 95 लाख के पार्षद कोटे में 50 लाख के काम 14वें वित्त से और शेष 45 लाख के काम नगर निगम निधि से कराए जाएंगे। नए वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए नगर निगम कार्यकारिणी ने 21 अरब रुपये का बजट पास किया था।
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हालांकि, इसकी कार्यवाही तीनजून को जारी नहीं हुई थी और नगर निगम प्रशासन की ओर से सामान्य तौर पर खर्च किया जा रहा था। बिना बजट लागू हुए नगर निगम कैसे खर्च कर रहा है, इसे लेकर जब महापौर से बात की गई तो उन्होंनेकार्यकारिणी की कार्यवाही जारी होने और बजट न लागू हो पाने के पीछे नगर निगम प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।
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कहा कि प्रशासन ने उन्हें संशोधित कार्यवाही और बजट नहीं भेजा। इस कारण कार्यवाही जारी नहीं हो पाई। इसे लेकर ‘अमर उजाला’ ने चार जून को प्रमुखता से खबर प्रकाशित की। इसके बाद नगर निगम प्रशासन सकते में है। कार्यकारिणी सदस्यों ने भी इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि ऐसा कैसे हुआ।
बजट की कार्यवाही समय से जारी होनी चाहिए थी। वहीं, महापौर ने भी तीन जून की तारीख में नगर आयुक्त को कार्यकारिणी की संशोधित कार्यवाही भेजने का पत्र भेज दिया। इसके बाद कानूनी पेंच फंस गया। पत्र मिलने से पहले माना जा रहा था हो सकता है कि कार्यवाही 31 मार्च से पहले की तारीख में जारी हो जाएगी।
इससे बजट पर संकट नहीं आएगा, लेकिन महापौर के पत्र से खेल बिगड़ गया। इसके बाद अब कानूनी सलाह लेने और कार्यकारिणी सदस्यों के राय के बाद बजट कार्यकारिणी और सदन की बजाए नगर आयुक्त का मान लिया गया है। इससे अब बजट में जो संशोधन किए जाने की तैयारी थी वह नहीं हो पाएंगे और जो बजट नगर आयुक्त ने पेश किया था वही माना जाएगा।
अब नगर आयुक्त का हो गया बजट
भाजपा से नगर निगम कार्यकारिणी के सदस्य नागेंद्र सिंह चौहान का कहना है कि निगम के मुख्य वित्त एंव लेखाधिकारी से बात हुई है। उन्होंने बताया कि नगर निगम अधिनियम की धारा 146 के तहत यदि कार्यकारिणी और सदन से किसी कारण बजट पास नहीं हो पाया तो नगर आयुक्त की ओर से पेश किया गया बजट ही माना जाएगा। इसमें किसी तरह का संशोधन नहीं किया जाएगा। ऐसे में अब यह नगर आयुक्त का बजट हो गया।
कार्यकारिणी में जो पेश हुआ वही रहेगा बजट
वरिष्ठ पार्षद व कांग्रेस से कार्यकारिणी सदस्य गिरीश मिश्रा का कहना है कि नगर निगम के इतिहास में पहली बार इस तरह का संवैधानिक संकट आया है। इसे दूर करने के लिए विधिक राय भी ली गई। मुख्य वित्त एवं लेखाधिकारी से भी बात हुई। इसमें यह सहमति बनी कि अब बजट में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता और न ही अब दो महीने से अधिक देरी होने के बाद कार्यवाही जारी की जा सकती है। जो बजट 25 फरवरी को कार्यकारिणी में पेश हुआ था वह अब उसी स्वरूप में रहेगा।
नियम अनुसार होगा काम
महापौर संयुक्ता भाटिया ने बताया कि जो काम होगा व नियम के तहत होगा। सबकी सहमति से जो भी तय होगा उस पर काम किया जाएगा। बजट जनहित के कार्यों के लिए है। इसके लिए ही खर्च होना चाहिए। नगर निगम अधिनियम में जो भी व्यवस्था है उसको सभी लोग मानेंगे।