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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   The politics of the area revolving around the Gorakshapeeth: The story of Ram temple movement and till the construction of the temple cannot be completed without the contribution of Gorakshapeeth.

गोरक्षपीठ के इर्द-गिर्द घूमती इलाके की सियासत : राम मंदिर आंदोलन और मंदिर बनने तक की कथा बिना गोरक्षपीठ के योगदान के नहीं हो सकती पूरी

Tue, 30 Nov 2021 07:47 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव टीपी शाही, अमर उजाला, गोरखपुर
टीपी शाही, अमर उजाला, गोरखपुर Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Tue, 30 Nov 2021 07:47 AM IST
सार

राममंदिर आंदोलन का जिक्र तो बिना गोरक्षपीठ की चर्चा किए पूरी ही नहीं हो सकती। वहीं सियासी दुनिया की बात करें तो महंत दिग्विजय नाथ से शुरू हुआ सफर, महंत अवेद्यनाथ से होते हुए योगी आदित्यनाथ तक जारी है। 

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The politics of the area revolving around the Gorakshapeeth: The story of Ram temple movement and till the construction of the temple cannot be completed without the contribution of Gorakshapeeth.
गोरखनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गोरक्षपीठ न केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है, बल्कि आजादी की लड़ाई और सामाजिक आंदोलनों को भी इस पीठ ने धार दी। राममंदिर आंदोलन का जिक्र तो बिना गोरक्षपीठ की चर्चा किए पूरी ही नहीं हो सकती। वहीं सियासी दुनिया की बात करें तो महंत दिग्विजय नाथ से शुरू हुआ सफर, महंत अवेद्यनाथ से होते हुए योगी आदित्यनाथ तक जारी है। यह सफर उस मुकाम तक आ पहुंचा कि प्रदेश की राजनीति गोरक्षपीठ के इर्द-गिर्द घूमने लगी।

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बात आजादी की लड़ाई की करें तो गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ ने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। चौरी-चौरा की घटना जिसमें थाना फूंक दिया गया था, उसमें महंत दिग्विजयनाथ को गिरफ्तार किया गया था। देश आजाद हुआ तो पहले ही लोकसभा चुनाव में गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से हिंदू महासभा के बैनर तले चुनाव मैदान में उतर गए। हालांकि वह लोकसभा चुनाव जीते 1967 में। पर, 1969 में ही उनका देहावसान हो गया। उनकी मृत्यु पर इंदिरा गांधी भी भावुक हो गई थीं। उन्होंने कहा था-ऐसे लोग धरती पर नहीं मिलते। अब बात राममंदिर के लिए गोरक्षपीठ के योगदान की। बात 1949 की है। यह वही कालखंड है जब अयोध्या में रामलला का प्राकट्य हुआ था। यह बात जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक पहुंची तो उन्होंने मूर्ति को हटाने का आदेश दे दिया। इसकी जानकारी होते ही महंत दिग्विजयनाथ अयोध्या पहुंच गए। 

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उन्होंने संतों के साथ भक्तों का आह्वान किया। बताया जाता है कि थोड़ी देर में ही राम जन्भूमि पर पांच हजार से अधिक साधु-संत और भक्त एकत्रित हो गए थे। जन्मभूमि पर भजन-कीर्तन शुरू हो गया। इतना ही नहीं उनके अनुरोध पर वहां भक्तों के आने का सिलसिला भी शुरू हो गया। माहौल ऐसा बना कि सरकार को मूर्ति हटाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। महंत दिग्विजयनाथ जब तक जिंदा रहे, मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। उनके निधन के बाद 1984 में विश्व हिंदू परिषद के बैनर तले राम जन्मभूमि का आंदोलन शुरू हुआ। महंत अवेद्यनाथ को राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया गया। महंत अवेद्यनाथ इसके आजीवन अध्यक्ष रहे। जब विवादित ढांचा ढहाया गया तो उसके गवाह भी वे बने। विवादित ढांचा ढहाए जाने पर उन्होंने कहा था-जनभावनाओं का जब आदर नहीं होगा, जनाक्रोश इसी तरह से कलंक की निशानी को मिटा देगा। आज अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। इसकी अगुवाई योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं।

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राजनीति से संन्यास लेकर छुआछूत मिटाने के अभियान में जुट गए थे अवेद्यनाथ
गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. महेंद्र कुमार सिंह बताते हैं, महंत दिग्विजयनाथ भले ही 1967 में सांसद बने, पर अवेद्यनाथ 1962 में ही मानीराम विधानसभा क्षेत्र से विधायक बन चुके थे। वह पांच बार मानीराम से विधायक रहे। 1979 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके बाद वह छुआछूत मिटाने के लिए देश भर में अभियान चलाने में जुट गए। उनका यह अभियान 1989 तक जारी रहा।

 
संतों के कहने पर दोबारा सक्रिय हुए 
रामजन्म भूमि आंदोलन के बीच 1989 का लोकसभा चुनाव होने जा रहा था। राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े संतों ने महंत अवेद्यनाथ से कहा था कि संसद में हमारा कोई प्रतिनिधि होना चाहिए। जो हमारी बात पूरी दमदारी से रख सके। संतों के आग्रह पर वह फिर राजनीति में सक्रिय हो गए। अवेद्यनाथ हिंदू महासभा से गोरखपुर संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतर गए। जनता दल की उस समय चल रही लहर भी महंत अवेद्यनाथ के संसद पहुंचने का रास्ता नहीं रोक सकी। वे चार बार सांसद चुने गए।


योगी सबसे कम उम्र के बने सांसद
1998 में महंत अवेद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ को लोकसभा चुनाव लड़ने का आदेश दे दिया। गुरु का आदेश मिलने के बाद आदित्यनाथ चुनाव मैदान में उतर गए। वह चुनाव जीते और उस समय के सबसे कम उम्र के सांसद बन गए। 1998 से 2014 तक वह लगातार पांच बार सांसद चुने गए। 

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