चार-पांच साल तक पैंट गीली तो हो जाइए अलर्ट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आमतौर पर लोगों में यह भ्रम रहता है बच्चों को सिर्फ बच्चों की किडनी ट्रांसप्लांट की जा सकती है, लेकिन सच्चाई यह है कि पांच साल से अधिक उम्र के बच्चों में किडनी ट्रांसप्लांट आसानी से किया जा सकता है और बच्चों में बड़ों की किडनी बेहतर काम करती है। इससे कोई खतरा भी नहीं होता है।
एसजीपीजीआई में यूरोलॉजी एसोसिएशन ऑफ यूपी यूएयूकॉन 2015 के दौरान संस्थान के यूरोलॉजिस्ट और किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. अनीस श्रीवास्तव ने रविवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किडनी रोग किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। बच्चा हो या बड़ा इस बीमारी की चपेट में आने वाले व्यक्ति का सही समय पर सही इलाज और डोनर मिल जाए तो उसे नई जिंदगी दी जा सकती है।
अगर अचानक फूलने लगे बच्चे का शरीर
उन्होंने बताया कि एसजीपीजीआई में हर वर्ष करीब 140 मरीजों में किडनी ट्रांसप्लांट किया जाता है। इसमें छह बच्चे होते हैं। प्रो. अनीस ने बताया कि बच्चे का शरीर अचानक फूलने लगे और पेशाब से प्रोटीन निकलने लगे तो इसका सीधा असर किडनी पर पड़ता है।
बहुत समय तक इलाज न करवाने या बीमारी का पता नहीं लगने पर किडनी डैमेज हो सकती है। ऐसी स्थिति में माता-पिता हिम्मत दिखाएं तो उनके लाडलों को नई जिंदगी मिल सकती है।
प्रो. राकेश कपूर बताते हैं कि बड़ों की किडनी को बच्चों में प्रत्यारोपित करना थोड़ी जटिल प्रक्रिया होती है। शरीर का आकार बड़ों की तुलना में छोटा होता है तो कोशिकाएं भी बहुत छोटी होती हैं। ऐसी स्थिति में जब प्रत्यारोपण शुरू होता है तो नसों को आपस में जोड़ने से लेकर किडनी को कम जगह में प्रत्यारोपित करना सबसे अधिक चैलेंजिंग होता है।
बच्चा पैंट कर रहा है गीली तो डॉक्टर को दिखाएं
अगर आपका बच्चा चार-पांच साल की उम्र पर पैंट में ही पेशाब कर देता है तो यूरोलॉजिस्ट की सलाह लेना बहुत जरूरी है। प्रो. अनीस के मुताबिक, इसका प्रमुख कारण यूरेटर का ब्लैडर में नहीं खुलना हो सकता है। यह समस्या जन्मजात होती है। इससे निजात दिलाने के लिए सिस्टोमेटोग्राम किया जाता है।
इससे पता लगाया जाता है कि बच्चे का इलाज किस तरीके से करना है। इस तरह की समस्या छोटी बच्चियों में अधिक होती है। इस समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज करने पर किडनी में संक्रमण के चलते खराबी आने का खतरा रहता है। पीजीआई में महज 20 से 25 हजार रुपये खर्च कर इस बीमारी का बेहतर इलाज हो सकता है।
औरतों के लिए कमजोरी नुकसानदायक
vयूएयूकॉन 2015 के वीडियो सेशन में प्रो. राकेश कपूर ने वीडियो टेकभनोलॉजी की मदद से बताया कि महिलाओं में कमजोरी कैसे उनके लिए परेशानी का सबब बन जाती है।
कमजोरी अधिक होने पर कई महिलाओं की बच्चेदानी या निजी अंग बाहर आ जाती है। इससे असहनीय दर्द के साथ जान को खतरा रहता है। इससे बचने के लिए जाली (मेस) तकनीक से बच्चेदानी या निजी अंग को भीतर किया जाता है।
इस बीमारी का सही समय पर इलाज शुरू नहीं कराने पर बच्चेदानी या निजी अंग के आसपास की कोशिकाएं डैमेज होने लगती हैं। इससे परेशानी बढ़ सकती है। यह इलाज पूरे देश में सिर्फ पीजीआई और चेन्नई में उपलब्ध है।
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के लक्षण हैं पेशाब में जलन और बदबू, पेशाब लगने पर भी उतर न पाना, पीठ व एब्डॉमेन में दर्द, थकावट, आलसपन, बार-बार बुखार के साथ उल्टी और पेशाब का रंग लाल, पिंक या भूरा होना।
पेशाब गाढ़ा और सफेद तो संक्रमण का खतरा
पेशाब का रंग अचानक सफेद हो जाए और पेशाब गाढ़े दूध की तरह निकलने लगे तो तुरंत डॉक्टरी सलाह जरूरी है। ये लक्षण कायुलिरिया बीमारी का है। इसकी चपेट में आने पर व्यक्ति का सेहत तेजी से गिरती है और समय पर इलाज न मिलने से संक्रमण का खतरा रहता है।
इस तरह की समस्या अधिक उम्र के लोगों और खासकर महिलाओं में सबसे अधिक देखी जाती है। किडनी के आसपास अधिक फैट जमा होने पर लिम्फनोड फैट जाता है और पेशाब से सफेद द्रव्य निकलने लगता है।
समय पर इलाज शुरू हो जाए तो दवा से राहत मिल सकती है। इलाज में देरी होने पर सर्जरी दूसरा तरीका है। कायुलिरिया से ग्रसित 40 से 50 मरीज इलाज के लिए हर साल पीजीआई पहुंचते हैं। बीमारी का इलाज शुरू करने से पहले पेशाब की जांच कराई जाती है, जिससे पता लगाया जाता है कि पेशाब में फैट क्यों आ रहा है।
पहले चरण में जहां पर ब्लास्ट हुआ है उसे भरने के लिए बिटाडिन का घोल दूरबीन के माध्यम से किडनी के आसपास की कोशिकाओं के पास इंजेक्ट किया जाता है। घोल इंजेक्ट होते ही छोटे-छोटे छेद बंद हो जाते हैं और उससे फैट नहीं निकलता है। छिद्र अगर दवा के घोल से बंद होता है तो सर्जरी करनी पड़ती है।