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चीनी मिल बिक्री घोटाला : गड़बड़ियां साबित होने के बाद भी किसी पर नहीं हुई कोई कार्रवाई

Sun, 28 Apr 2019 12:28 AM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Sun, 28 Apr 2019 12:28 AM IST
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sugar mill selling scam, no action taken after fraud proven
चीनी मिल - फोटो : अमर उजाला
मायावती सरकार में हुए बहुचर्चित चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती हुई। सीएजी की रिपोर्ट में परत-दर-परत गड़बड़ियों का खुलासा होने के बावजूद किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 
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लोकायुक्त की जांच भी मिलों की बिक्री प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक अफसरों, मिलों को बेचने के निर्णय में शामिल रहे तत्कालीन मंत्रियों और पूरी प्रक्रिया संपन्न कराने वाले कंसल्टेंटों से पूछताछ, बयान दर्ज करने और जवाब तलब करने तक ही सिमटकर रह गई। 
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सीएजी की जांच रिपोर्ट में सब कुछ पानी की तरह साफ होने के बाद भी लोकायुक्त की जांच में घोटाले के लिए सीधे तौर पर किसी को जिम्मेदार न ठहराते हुए गेंद फिर से सरकार के पाले में डाल दी गई। सात साल बाद चीनी मिल बिक्री घोटाले का जिन्न फिर बाहर आया है।
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मायावती सरकार के दौरान 2010-11 में राज्य चीनी निगम की 21 मिलों की बिक्री में 1179 करोड़ रुपये का घोटाला सीएजी की जांच रिपोर्ट में सामने आया था। 2012 के विधानसभा चुनाव में चीनी मिल बिक्री समेत अन्य घोटालों में भ्रष्टाचार का मुद्दा उभारकर समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी। 

चुनाव अभियान के दौरान घोटालों को लेकर सपा ने मायावती सरकार के प्रति जितनी आक्रामकता दिखाई थी, सत्ता संभालने के बाद उतनी आक्रामकता नहीं दिखी। सीएजी की रिपोर्ट में गड़बड़ियों का पर्दाफाश होने के बाद चीनी मिल बिक्री घोटाले की जांच लोकायुक्त को सौंपी तो गई लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। 

तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा ने न तो किसी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की और न ही सरकार की तरफ से और गहन जांच कराकर सरकारी खजाने को चपत लगाने वालों को चिह्नित करके कार्रवाई करने की पहल हुई। पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

आला अफसरों, मंत्रियों व कंसल्टेंट से पूछताछ

चीनी मिल बिक्री घोटाले की लोकायुक्त जांच लगभग डेढ़ साल तक चली। इस दौरान लोकायुक्त ने चीनी मिलों को बेचने की प्रक्रिया से जुड़े रहे तत्कालीन मुख्य सचिव, औद्योगिक विकास, गन्ना विकास विभाग, वित्त विभाग, सार्वजनिक उद्यम ब्यूरो व अन्य संबंधित विभागों के आला अधिकारियों, डेढ़ दर्जन से ज्यादा जिलों के डीएम व पीसीएस अफसरों से पूछताछ कर उनके बयान दर्ज किए। 

तत्कालीन गन्ना एवं चीनी उद्योग मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मिलों को बेचने की प्रक्रिया के लिए नियुक्त दो कंसल्टेंट फर्मों से भी जवाब तलब किया था। हालांकि लंबी चली जांच आखिरकार बेनतीजा रही। योगी सरकार ने पिछले साल अप्रैल में केंद्र से इस मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। ठीक एक साल बाद सीबीआई ने मामला दर्ज करते हुए अब जांच शुरू की है।

सीएजी की आपत्तियां

भारत केनियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। शराब कारोबारी पौंटी चड्ढा को फायदा पहुंचाने के लिए बिडिंग से पहले ही तय कर लिया गया था कि मिलें किसे बेचनी हैं। बिडर्स को वित्तीय बिड भी पहले ही बता दी गई थी। फिर भी काम नहीं बना, तो बिडिंग के बीच में ही प्रक्रिया बदल दी गई। 

यही नहीं, मिलों की जमीन, प्लांट व मशीनरी की कीमत तय करने के पीछे भी खजाने को चपत लगाने की बदनीयती रही। बाद में, रजिस्ट्री केलिए स्टांप ड्यूटी भी कम तय कर दी गई। इसके अलावा सीएजी ने यह भी माना है कि चीनी मिलों के मूल्यांकन और अपेक्षित मूल्य निर्धारण में 840.34 करोड़ रुपये की कमी रही है। 

इसका पूरा आकलन नहीं किया जा सका हैै। इससे सरकार को लगभग 1180 करोड़ की चपत लगी। इसके अलावा स्टांप शुल्क के जरिये भी सरकार को 100.77 करोड़ की चपत लगाई गई। 
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