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जानिए खुद को सुभाषचंद्र कहने वाले जय गुरुदेव और उनके तीन चेलों की पूरी कहानी

Mon, 06 Jun 2016 03:12 PM IST
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 06 Jun 2016 03:12 PM IST
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जय गुरुदेव

दावा किया जाता है कि 1896 में इटावा के खितोरा में एक यादव परिवार में उनका जन्म हुआ। माता-पिता ने तुलसीदास नाम रखा। सात वर्ष की उम्र में वे अपने माता-पिता को खो चुके थे। बताया जाता है कि मृत्यु से पूर्व उनकी माता ने उन्हें भगवान कृष्ण की खोज में जाने के लिए प्रेरित किया था। 

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इसके बाद वे गुरु श्री ओमकारनाथ की शरण में आ गए और मोक्ष की तलाश में निकल पड़े। अलीगढ़ के चिरौली में तुलसीदास की मुलाकात संत घूरेलाल से हुई। उनके साथ वे 18 घंटे साधना में लीन रहने लगे। 
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दिसंबर 1950 में अपनी मृत्यु से पहले संत घूरेलाल ने तुलसीदास को प्रेरित किया कि वे उनके विचारों को दुनिया तक पहुंचाएं। संत तुलसीदास ने 10 जुलाई 1952 में वाराणसी में प्रवचन दिए। इसके बाद उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। वे उन्हें सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए प्रेरित करने लगे। इसी दौरान संत तुलसीदास ने अपना नाम ‘जय गुरुदेव’ चुना और उन्हें इसी नाम से बुलाया जाने लगा।
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देश में जब आपातकाल लगा तो 29 जून 1975 को उन्हें भी कैद कर लिया गया। उन्हें आगरा और बरेली की जेलों में रखा गया, लेकिन उनके अनुयायियों की भारी भीड़ जुटने लगी, जिससे बचने के लिए उन्हें बेंगलोर के सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। वहां से उन्हें तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया गया।

करीब पौने दो साल बाद 23 मार्च 1977 को उन्हें रिहा किया गया। इस दिन को उनके अनुयायियों ने जय गुरुदेव के मुक्ति दिवस के रूप में मनाना शुरू कर दिया। प्रवचनों के जरिए अनुयायी बढ़ाते हुए जय गुरुदेव ने देश भर में 250 आश्रम स्थापित कर लिए। 

यहां बने ट्रस्ट और ऐसे शुरू हुआ विवाद

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जवाहर बाग में फैली हिंसा - फोटो : Amarujala

20 नवंबर, 1977 को जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संघ ट्रस्ट मथुरा ट्रस्ट की स्थापना की। 24 मई, 1979 को जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था नाम से जय गुरुदेव योग स्थली आगरा-दिल्ली रोड महोली मथुरा में दूसरा ट्रस्ट बनाया। तीसरा जय गुरुदेव धर्म प्रचारक कोठी मंदिर ट्रस्ट खितौरा इटावा में बनाया गया। 

इनमें मथुरा में बना दूसरा ट्रस्ट सबसे महत्वपूर्ण माना गया। इसी दौरान जय गुरुदेव ‘दूरदर्शी पार्टी’ बनाकर लोकसभा चुनावों में भी उतरे और 23 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। हालांकि एक भी सीट नहीं जीत पाए।

इन ट्रस्ट के दस्तावेजों में स्पष्ट बताया गया था कि जय गुरुदेव ही तीनों ट्रस्ट के अध्यक्ष होंगे। ट्रस्ट में तीन तरह के सदस्यों की नियुक्ति होगी। पहले ‘नामदानी सदस्य’, दूसरे प्रबंधक सदस्य और तीसरे सामान्य सभा सदस्य।

सभी सदस्यों को अध्यक्ष ही नामित कर सकते थे। ट्रस्ट का अगला अध्यक्ष भी केवल मौजूदा अध्यक्ष यानी जय गुरुदेव ही चुन सकते थे। 18 मई 2012 में उनका निधन हो गया और यहीं से विवाद भी शुरू हो गया।

पंकज कुमार यादव ने ही दी थी जय गुरुदेव की चिता को मुखाग्नि

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पंकज कुमार यादव

जय गुरुदेव की मृत्यु के बाद मथुरा के उनके आश्रम में 13वीं पर भंडारा रखा। आयोजन के तुरंत बाद उनके शिष्य फूल सिंह ने एक पत्र ट्रस्ट सदस्यों के सामने प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया कि जय गुरुदेव ने पंकज कुमार यादव को ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त किया है। 

पंकज कभी उनका ड्राइवर था और बाद में करीबी हो गया था। उसने ही जय गुरुदेव की चिता को मुखाग्नि दी थी। बाद में और दावेदार सामने आए और जयगुरुदेव के उत्तराधिकारी का विवाद मथुरा जिला अदालत व इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। 

पंकज यादव ने डिप्टी रजिस्ट्रार के सामने दावा किया कि जय गुरुदेव ने उन्हें ही अध्यक्ष नामित किया था। उन्हाेंने जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था के अध्यक्ष होने के साक्ष्य के लिए वार्षिक सूची प्रस्तुत की। 

इसमें आगरा की विभिन्न फर्म, सोसाइटी और चिट्स उन्हें अध्यक्ष के तौर पर दर्शा रही थीं। इस बीच पंकज ने प्रवचन देना शुरू कर दिया है।

यूपी सहित उत्तर भारत में उसकी सभाएं होती हैं। वह मुख्य मंच पर नहीं बैठता। वहां गुरुदेव की तस्वीर लगाता है और नीचे बैठकर प्रवचन देता है।

उमाकांत तिवारी ने इंदौर व उज्जैन में बनाए आश्रम

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उमाकांत ‌तिवारी

उमाकांत तिवारी ने स्वीकार नहीं किया। उसने खुद को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करवाना शुरू कर दिया और अजमेर में एक धर्मसभा का आयोजन कर खुद को विविधत रूप से अध्यक्ष के रूप में प्रस्तुत किया। 

वहीं, इंदौर व उज्जैन में उमाकांत तिवारी ने आश्रम बनाए और अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाकर प्रवचन देना शुरू कर चुका था। जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो उमाकांत ने भी एक सूची डिप्टी रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत की, जिसमें उसने खुद को जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था का अध्यक्ष बताया। 

उसने पंकज कुमार की तरह एक और वार्षिक सूची प्रस्तुत की, जिसमें आगरा की कई फर्म, सोसाइटी और चिट्स उसे अध्यक्ष के तौर पर दर्शा रही थीं। उमाकांत तिवारी उज्जैन में फिलहाल बाबा उमाकांत के नाम से आश्रम संचालित करता है। 

वहीं मप्र, राजस्थान, और मध्य भारत केअन्य क्षेत्रों में प्रवचन देता है। इस दौरान वह स्वयं को अध्यक्ष के रूप में दर्शाता है। साथ ही अपनी अलग वेबसाइट संचालित करते हुए अनुयायियों को सोशल मीडिया पर बने जय गुरुदेव के किसी भी पेज से दूर रहने की सलाह देता है।

रामवृक्ष ने बनाया स्वाधीन भारत संगठन

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रामवृक्ष यादव

उत्तराधिकारियों के विवाद में तीसरी कड़ी रामवृक्ष यादव था। वह 1980 में जय गुरुदेव के संपर्क में आया और बाबा की दूरदर्शी पार्टी से गाजीपुर में चुनाव लड़ा मगर हार गया। मथुरा में जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था के साथ काम करने केदौरान 2006 में उसके आक्रामक व्यवहार की शिकायतें जय गुरुदेव के पास पहुंची। 

इस पर उसे संस्था से हटा दिया गया। तब रामबृक्ष ने स्वाधीन भारत संगठन बनाया। जय गुरुदेव के स्वर्गवास के बाद अपने समर्थकों के बल पर वह खुद को उनके उत्तराधिकारी के तौर पर देखने लगा। उसके समर्थकों में अधिकतर जय गुरुदेव के अनुयायी थे। 

अपनी अव्यावहारिक मांगों को मंगवाने केलिए वह ‘स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह’ करने के नाम पर कई समर्थकों को मध्यप्रदेश से लेकर 11 जनवरी 2014 को दिल्ली के लिए चला। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान होता हुआ मथुरा पहुंचा और जवाहर बाग में आकर जम गया। 

यहां जय गुरुदेव के अनुयायी रामवृक्ष से जुड़ते गए और पौने तीन सौ एकड़ के जवाहर बाग में पूरा गांव बस गया। वह प्रशासनिक सख्ती के बावजूद वहां हटने को तैयार नहीं हुआ। जब पुलिस ने सख्ती की तो मथुराकांड सामने आया।

इस विवाद में डिप्टी रजिस्ट्रार ने पंकज कुमार को अध्यक्ष के तौर पर स्वीकार किया। इसका आदेश 24 जुलाई 2012 को दिया गया। बाद में एक और शख्स राम प्रताप ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी।

वह ट्रस्ट का उपाध्यक्ष बताया गया। हाईकोर्ट ने मामले को मथुरा जिला अदालत में चलाने के निर्देश दिए। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिकाएं खारिज करने, उन पर अपीलों, सुप्रीम कोर्ट में विशेष अपीलों का सिलसिला चल पड़ा।

विवाद के पीछे संपत्ति का लालच

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डेमो

उत्तराधिकार के इस पूरे विवाद में कहीं न कहीं जय गुरुदेव द्वारा संग्रह की गई संपत्ति और धन का आकर्षण भी था। 2012 में जय गुरुदेव के स्वर्गवास के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई जानकारियों के अनुसार ट्रस्ट के पास करीब 12 हजार करोड़ की संपत्तियां थीं। 

वहीं, बैंकों में ट्रस्ट के 100 करोड़ रुपये जमा थे। दूसरी ओर जय गुरुदेव की कारों के फ्लीट को बहुत लोकप्रियता हासिल थी। उसमें बीएम डब्ल्यू और मर्सिडीज बेंज समेत 250 कारें शामिल थीं। इनकी कीमत करीब 150 करोड़ रुपये आंकी गई है।

मिर्जापुर में वन विभाग की करीब 300 एकड़ भूमि पर बने आश्रम से लेकर, मथुरा में आश्रम, दिल्ली हाइवे पर आश्रम, मथुरा में ही एक पेट्रोल पंप, स्कूल, कई अंचलों में 100 से अधिक आश्रम ट्रस्ट की संपत्तियों में गिने जाते हैं।

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