{"_id":"5c67c971bdec2273a032613c","slug":"story-of-former-chief-minister-veer-bahadur-singh","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"मुख्यमंत्री की जेब में नहीं रहते थे पैसे, हर रोज कॉफी हाउस में बैठकी के बाद कोई और भरता था बिल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मुख्यमंत्री की जेब में नहीं रहते थे पैसे, हर रोज कॉफी हाउस में बैठकी के बाद कोई और भरता था बिल
Sat, 16 Feb 2019 01:57 PM IST
ishwar ashish
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 16 Feb 2019 01:57 PM IST
विज्ञापन
पूर्व सीएम वीर बहादुर
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ में कॉफी हाउस ऐसा ठिकाना रहा है जहां एक जमाने में लखनऊ की ही नहीं बल्कि प्रदेश की विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां बैठी मिल जाया करती थीं। वीर बहादुर सिंह कांग्रेस के बड़े नेता थे। वह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। कॉफी हाउस में नियमित रूप से उनकी बैठकी होती थी।
वीर बहादुर सिंह के साथ बैठने वालों में वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह सूर्य, गिरधारी लाल पाहवा, फोटोग्राफर सतपाल प्रेमी, कामिल किदवई, जवाहर अग्रवाल, यूपी सिंह प्रमुख थे। वह मंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बावजूद कॉफी हाउस के अंदर साधारण नागरिक के रूप में ही आया करते थे।
सिक्योरिटी व अफसरों को कॉफी हाउस के बाहर ही छोड़ देते थे। वह जब कॉफी हाउस में आकर बैठते तो मेजों से दूसरी मेज जोड़कर बैठने वालों का दायरा बड़ा होता चला जाता।
विज्ञापन
विज्ञापन
वीर बहादुर सिंह के साथ बैठने वालों में वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह सूर्य, गिरधारी लाल पाहवा, फोटोग्राफर सतपाल प्रेमी, कामिल किदवई, जवाहर अग्रवाल, यूपी सिंह प्रमुख थे। वह मंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बावजूद कॉफी हाउस के अंदर साधारण नागरिक के रूप में ही आया करते थे।
विज्ञापन
सिक्योरिटी व अफसरों को कॉफी हाउस के बाहर ही छोड़ देते थे। वह जब कॉफी हाउस में आकर बैठते तो मेजों से दूसरी मेज जोड़कर बैठने वालों का दायरा बड़ा होता चला जाता।
विज्ञापन
दूसरे लोग ही कर देते पेमेंट
बैठते ही उस मेज पर चल रही बैठक का एजेंडा पूछते और उसी विषय में बहस में शामिल हो जाते। हर बार वह कॉफी पीने के बाद जेब में हाथ डालते लेकिन लोगों को पता रहता था कि उनकी जेब में पैसे तो रहते ही नहीं थे। इसलिए दूसरे लोग ही पेमेंट कर देते।
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर ने ‘लखनऊ का कॉफी हाउस’ किताब में एक संस्मरण में लिखा है, ‘वीर बहादुर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। स्वतंत्रता दिवस का दिन था। मुख्यमंत्री ने ध्वजारोहण किया और समारोह के बाद सीधे कॉफी हाउस आ गए। बड़ी महफिल जमी थी। तमाम पत्रकार बैठे थे।
जाहिर है कि सियासी चर्चा हो रही होगी। मुख्यमंत्री भी आकर उसी मेज पर बैठकर चर्चा में शामिल हो गए। सभी ने कॉफी पी। बाद में पेमेंट के लिए मुख्यमंत्री ने जेब में हाथ डाला। जेब तो उस दिन भी खाली ही थी। हालांकि इसी बीच, सारा पेमेंट कामिल किदवई ने कर दिया।’
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर ने ‘लखनऊ का कॉफी हाउस’ किताब में एक संस्मरण में लिखा है, ‘वीर बहादुर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। स्वतंत्रता दिवस का दिन था। मुख्यमंत्री ने ध्वजारोहण किया और समारोह के बाद सीधे कॉफी हाउस आ गए। बड़ी महफिल जमी थी। तमाम पत्रकार बैठे थे।
जाहिर है कि सियासी चर्चा हो रही होगी। मुख्यमंत्री भी आकर उसी मेज पर बैठकर चर्चा में शामिल हो गए। सभी ने कॉफी पी। बाद में पेमेंट के लिए मुख्यमंत्री ने जेब में हाथ डाला। जेब तो उस दिन भी खाली ही थी। हालांकि इसी बीच, सारा पेमेंट कामिल किदवई ने कर दिया।’