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यूपी में हर बार फेल हुए गठबंधन, जानें कब, क्या हुआ

Thu, 19 Nov 2015 12:47 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 19 Nov 2015 12:47 AM IST
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Stories of alliances in Uttar Pradesh.

बिहार चुनाव में जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल के महागठबंधन की सफलता के बाद सूबे में एक बार फिर संभावित सियासी गठबंधन चर्चा के केन्द्र में आ गए हैं। कोई इसके पक्ष में बोल रहा है तो कोई इसकी संभावनाओं को सिरे से ही खारिज कर रहा है।

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राजनीति में कुछ असंभव न होने का भी तर्क दिया जा रहा है और सूबे की सियासत में सपा और बसपा के बीच दुश्मनों जैसे व्यवहार के बाद भी गठबंधन की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा रहा है। लेकिन अतीत पर नजर डालें तो बीते ढाई दशक में उत्तर प्रदेश में कई गठबंधन हुए, कुछ चुनाव पूर्व तो कुछ चुनाव बाद, पर इनमें से कोई भी प्रयोग टिकाऊ नहीं रहा।
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पड़ोस की हवा का असर नहीं : राजनीतिक समीक्षकों का निष्कर्ष है कि दूसरे राज्यों के विपरीत प्रदेश को गठबंधनों की राजनीति कभी रास नहीं आई। बिहार से उत्तर प्रदेश की तुलना भी नहीं की जा सकती। बिहार में तो जनता दल-भाजपा का गठबंधन एक दशक से ज्यादा चल गया। इसी तरह, पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन लंबे अरसे से चल रहा है।
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यूपी की बात करें तो यहां गठबंधन का हर संभावित प्रयोग किया जा चुका है। यहां तक एक-दूसरे के घोर सियासी दुश्मन कम्युनिस्ट और भारतीय जनसंघ भी एक ही सरकार में साथ-साथ रह चुके हैं, पर इनमें कोई भी पांच साल तक सरकार नहीं चला सका।

पहली बार 1967 में हुआ था गठबंधन

Stories of alliances in Uttar Pradesh.

चौधरी चरण सिंह से शुरुआत : यूपी में गठजोड़-गठबंधन  की राजनीति और अलग-अलग दलों को साथ लेकर सरकार बनाने का प्रयोग पहली बार 1967 में हुआ। जब चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर भारतीय क्रांति दल (लोकदल) बनाया और सरकार बनाई। उस सरकार में कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ भी शामिल हुआ। पर, यह सरकार एक साल भी नहीं चली।

चरण सिंह के बाद 1970 में कांग्रेस से अलग हुए विधायकों ने त्रिभुवन नारायण सिंह  (टीएन सिंह) के नेतृत्व में साझा सरकार बनाने का प्रयोग किया। इसमें कई अन्य दलों के साथ जनसंघ भी शामिल था, पर यह सरकार छह महीने भी नहीं चली। सिंह को छह महीने के बाद किसी न किसी सदन की सदस्यता लेना अनिवार्य था।

उन्हें गोरखपुर की मनीराम सीट से चुनाव लड़ाया गया, पर कांग्रेस के पं. रामकृष्ण द्विवेदी ने उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह सूबे के इतिहास में शायद पहली और अंतिम बार बिना किसी सदन के सदस्य बने मुख्यमंत्री रहने वाले के रूप में टीएन सिंह का नाम दर्ज हो गया।

नहीं चला आपातकाल के दर्द से निकला प्रयोग : तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने से नाराज राजनीतिक दलों ने 1977 में जनता पार्टी के नाम से फिर एक गठबंधन तैयार किया। फिर बाद में जनसंघ तक की आम सहमति से जनता पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा गया।

सूबे में रामनरेश यादव के मुख्यमंत्रित्व में जनता पार्टी की सरकार बनी, पर अलग-अलग विचारधारा के नेताओं की इंदिरा की नीतियों के विरुद्ध बनी एकजुटता कुछ ही दिन में बिखर गई। वर्ष 1980 में हुए चुनाव में कांग्रेस बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गई।

न मुलायम-भाजपा और न सपा-बसपा की चली दोस्ती

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वर्ष 1989 में देश व प्रदेश में फिर गठबंधन राजनीति का प्रयोग किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में खरीदी गई बोफोर्स तोपों में घोटाले का आरोप लगाकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत की। कांग्रेस के विरोधी दलों ने देश से लेकर प्रदेश तक जनमोर्चा फिर जनता दल के नाम से गठबंधन बनाया। भाजपा भी इन्हें बाहर से समर्थन  को राजी हो गई।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में 5 दिसंबर 1989 को जनता दल की सरकार बनी, पर यह भी पांच साल नहीं चल सकी। राम मंदिर आंदोलन के चलते टकराव से पहले भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। फिर कांग्रेस, मुलायम सिंह के साथ आई, यह दोस्ती भी ज्यादा नहीं टिक सकी। इसके बाद हुए चुनाव में जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुत देकर गठबंधन राजनीति से तोबा बोलने का ऐलान किया, पर ढांचा ढहने पर कल्याण सिंह सरकार भी बरखास्त हो गई। फिर चुनाव की घड़ी आ गई।

भाजपा से निपटने के लिए सपा-बसपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन का प्रयोग दोहराया। चुनाव में इस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला। मुलायम सिंह यादव 5 दिसंबर 1993 को दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बने, पर दोनों दलों के अंतर्विरोध और अहम का टकराव भारी पड़ा।

यह सरकार भी 3 जून 1995 को गेस्ट हाऊस कांड के चलते बसपा के सपा से नाता तोड़ने के चलते गिर गई। तब भाजपा, बसपा के समर्थन में खड़ी हो गई। मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, पर यह भी भाजपा व बसपा के बीच टकराव के चलते टिकाऊ नहीं रह पाई।

छह-छह महीने के मुख्यमंत्री का प्रयोग

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वर्ष 1996 में फिर हुए चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भाजपा व बसपा के बीच समझौते के तहत छह-छह महीने के मुख्यमंत्री पर सहमति बनी। मायावती 21 मार्च 1997 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। सरकार में भाजपा भी शामिल हुई, पर छह महीने बाद मायावती ने कल्याण सिंह को सत्ता सौंपने से इन्कार कर दिया।

भाजपा ने बसपा के विधायकों सहित उसके कुछ समर्थक दलों को तोड़कर कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। यह सरकार 2002 तक चली। वर्ष 2002 में हुए चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भाजपा और बसपा ने पुरानी कटुता भूलकर तीसरी बार फिर दोस्ती से सरकार बनाने का फैसला किया।

लगभग डेढ़ साल बीतते-बीतते भाजपा व बसपा के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि 29 अगस्त 2003 को यह सरकार भी चली गई। नाटकीय घटनाक्रम में मायवती ने तत्कालीन राज्यपाल से सरकार बरखास्तगी की सिफारिश कर दी। भाजपा ने दावा किया कि उसने तो बरखास्तगी की सिफारिश से पहले ही अपना समर्थन वापसी का पत्र राज्यपाल को सौंप दिया है। विधानसभा तो नहीं भंग हुई लेकिन भाजपा व बसपा सरकार से बाहर हो गए। भाजपा के समर्थकों और बसपा के लोगों को तोड़कर मुलायम सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी।

प्रयोगों से ऊबी जनता ने दिया पूर्ण बहुमत का संदेश : प्रयोगों से ऊबी जनता ने आखिरकर 2007 में सूबे में बसपा को पूर्ण बहुमत देकर गठबंधन की राजनीति को समर्थन न देने का संदेश दिया। वर्ष 2012 में भी सूबे का जनमत एक दल को ही बहुमत की नीति का समर्थन कर चुका है, पर वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं कि बड़ा प्रदेश होने के कारण गठबंधन की राजनीति की संभावना को बिल्कुल सिरे से खारिज तो नहीं किया जा सकता। पर इसकी राह भी कोई खास आसान नहीं दिखती है।

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