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उस खेत में खिलखिलाता है बचपन, जहां थी मौत की भट्ठी

Mon, 11 Jan 2016 02:57 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 11 Jan 2016 02:57 AM IST
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Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

मलिहाबाद जहरीली शराब दुखांतिका में 55 मौतें देख चुके दतली गांव में अब कोई शराब का नाम भी नहीं लेता। एक साल पहले गांव के बीच जहां कच्ची शराब बनाने की भट्ठी लगी थी, वहां आज सरसों की फसल लहलहा रही है। पीली सरसों के बीच खाली जगह में बच्चे गुच्ची खेलते मिलते हैं।

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पास-पड़ोस के गांवों से भले ही शराब बनने-मिलने की बात सुनने में आ जाए लेकिन दतली और उससे जुड़े खड़ता गांव के लोग अब और मौतें नहीं देखना चाहते, इसलिए उन्होंने शराब से तौबा कर ली है।
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दूसरी तरफ वे परिवार जिन्होंने अपने घर के मुखिया से लेकर बेटों तक को जहरीली शराब दुखांतिका में खोया, वे जीवन को पटरी पर लाने के लिए नए सिरे से संघर्ष में जुट गए हैं। घर का खर्च चलाने के लिए बच्चे पढ़ाई छोड़कर छोटे-मोटे काम कर रहे हैं तो महिलाएं खेतों में मजदूरी।
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परिवार की बुजुर्ग महिलाएं अपने जवान बेटों की मौत को भुला नहीं पाई हैं तो सुहाग खो चुकी बहुओं की सूनी आंखें अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता में भीगी हैं। परिवार में कमाने वाले सदस्य को खोने के बाद सरकार से मिली मदद भी खत्म होने लगी है। इस शराब दुखांतिका के एक साल पूरे होने पर रिपोर्टर अभिषेक यादव और फोटो जर्नलिस्ट रिमांशु सिंह ने इन परिवारों के हालात को समझा। पेश है रिपोर्ट:

पहले ही बता दिया था कि वह नहीं बचेगा

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

(दतली गांव) नहीं मिली कोई मदद  -मीना देवी, मृतक कल्लू की मां
शराब दुखांतिका के बाद 30 साल के कल्लू 18 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे। जवान बेटे को धीरे-धीरे मौत की मुंह में समाते देख चुकीं मीना देवी बताती हैं कि डॉक्टरों ने पहले ही बता दिया था कि वह नहीं बचेगा, घर ले जाइए।

सरकार ने सभी मृतकों के आश्रितों को सहायता दी, लेकिन उन्हें भूल गई। बूढ़ी मीना देवी किसी तरह गुजर बसर कर रही हैं। कल्लू पेशे से मजदूर था और बिहार में काम करने के दौरान वहां की लड़की से शादी कर उसे यहां ले आया था।

दो बेटियां हुईं, लेकिन कल्लू की मौत के कुछ दिनों बाद बहू मायके लौट गई। तब से वह नहीं लौटी है। घर में अकेली रह रहीं मीना देवी की आंखें अपनी पोतियों का इंतजार कर रही हैं।

आंखों की रोशनी गई, बेटी बनी सहारा

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

40 वर्षीय परांतु सिंह शराब पीने के आदी थे, लेकिन पिछले साल हुए हादसे के बाद उन्हें इस जहर के खतरे का अहसास हुआ। वे कहते हैं कि न केवल वे, बल्कि गांव के सभी लोग शराब छोड़ चुके हैं।

शराब बनाने के लिए बदनाम हुए दतली के माथे से 55 मौतों का दाग तो पता नहीं कब धुलेगा, लेकिन इनके परिवारों को बचाना ग्रामीणों की प्राथमिकता हो गया है। परांतु सिंह ने इस हादसे में अपनी आंखें खो दी थीं।

साल भर के इलाज के बाद भी आंखों की 90 फीसदी रोशनी चली गई। अपने रोजमर्रा के कामों के लिए भी बच्चों पर निर्भर हैं। बेटी दामिनी उनका सहारा बनी है जो जरूरत के समय उन्हें कहीं लाती और ले जाती है।

एक बिटिया की पढ़ाई छूटी, घर अंधेरे में

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

चालीस वर्षीय गंगाराम अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उनकी पत्नी लीलावती बताती हैं कि पति की मौत के बाद बड़ी बेटी साक्षी ने किसी तरह ग्रेजुएशन अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और पास भी हुई लेकिन आगे पढ़ नहीं सकती क्योंकि शहर जाकर पढ़ने का आसरा नहीं है।

दूसरा बेटा रुद्रप्रताप भी इंटर के बाद कॉलेज में एडमिशन नहीं ले पाया। छोटा बेटा रूपेंद्र नवोदय विद्यालय में कक्षा सात में पढ़ रहा है। पिछले 20 दिनों से घर आया हुआ है।

डीएम ने वादा किया था, लेकिन बिजली कनेक्शन नहीं मिला। शराब और दवा की खाली बोतलों में केरोसिन भरकर बनाई गई ढिबरी की रोशनी में रूपेंद्र पढ़ता है। सरकार से मिली आर्थिक मदद परिवार के रोजाना के खर्च पूरे करने में खर्च हो रही है।

एक बेटी की शादी करवाई, दो और की कैसे होगी, पता नहीं

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परिवार में कमाने वाले इकलौते सदस्य शिवराज की मौत के बाद उनकी पत्नी जमना देवी को सरकार से सवा सात लाख रुपये की मदद मिली थी। करीब साढ़े तीन लाख रुपये बड़ी बेटी की शादी में खर्च हो गए।

जो बचे हैं, वे भी धीरे-धीरे खर्च हो रहे हैं। एक बेटा हरीशचंद्र मजदूरी करता है, वे नहीं चाहतीं कि उसे भी शराब की लत लगे, इसलिए उसे कसम दिलवाई है।

कहती हैं, कशीदाकारी का काम करके पांच बच्चों का पेट नहीं भर पा रही। असली चिंता दूसरी बेटियों की शादी की है। वे चिंतित स्वर में कहती हैं कि भविष्य क्या होगा, पता नहीं।

पता नहीं कितने दिन चलेगा जीवन

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सुद्धेश्वरी, मृतक सिद्धेश्वर की पत्नी
अपने अबोध बच्चों शुभांगी और शुभम की ओर इशारा करते हुए सुद्धेश्वरी बताती हैं कि सरकारी मदद का अधिकतर पैसा रोजाना की जरूरतें पूरी करने और कर्ज चुकाने में खत्म हो चुका है।

वे खुद बीमारी की वजह से मजदूरी नहीं कर सकतीं। घर में कोई और कमाने वाला नहीं है। ऐसे में पता नहीं, कब तक जीवन चलेगा।

पढ़ाई छोड़कर भाई कर रहा मजदूरी
रेनु रावत, मृतक मंगल प्रसाद की बड़ी बेटी
जहरीली शराब रेणु रावत के पिता मंगल प्रसाद का जीवन लील गई। परिवार के मुखिया की मौत के बाद 16 साल के भाई को पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

घर खर्च चलाने के लिए वह दूसरों के खेतों में मजदूरी करने को मजबूर है। फीस न भर पाने के कारण एक और भाई की पढ़ाई छूट गई। खुद रेणु की भी पढ़ाई किसी तरह चल रही है।

डीएम के वादे के बावजूद बिजली कनेक्शन नहीं मिल पाया है। इस सबके बावजूद रेणु आत्मविश्वास से कहती है कि वह पढ़ाई नहीं छोड़ेगी, उसे कुछ बनना है।

‘मजदूरी नाही करिबे तो पैसा कहां से अइहै?’

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- ज्ञानमति, मृतक दीनदयाल की पत्नी
ज्ञानमति अपने पांच बच्चों को किसी तरह पाल रही है। मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए अपने झुंझला देने वाले संघर्ष से परेशान ज्ञानमति कहती हैं ‘मजदूरी नाही करिबे तो पैसा कहां से अइहै?'

विधवा पेंशन उन्हें नहीं मिल रही है, घर में बिजली का कनेक्शन भी नहीं दिया गया है। खेतों में मजदूरी के दौरान कभी अपने बच्चों को साथ ले जाती हैं तो कभी पड़ोसियों के भरोसे घर छोड़ देती हैं।

इकलौता बेटा गंवाया, कच्चे घर में बसर
नन्हा और रामपति
मृतक निर्मल कुमार के पिता व मां नन्हा के 30 साल के बेटे निर्मल कुमार की इस हादसे में मौत हुई थी। एक वर्ष बाद उनके घर के हालात मुश्किलों में हैं। बहू रेशमा और पोते शिवम के भविष्य की चिंता उन्हें खाए जा रही है।

कच्चे घर में वे कैसे रहेंगे, पता नहीं। डीएम के आश्वासन के बावजूद न बिजली मिली, न सीएम के आश्वासन के बाद लोहिया आवास का कुछ हुआ।

कभी नहीं सोचा था कि ऐसे दिन देखने पड़ेंगे

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संजय, मृतक सजीवन के बेटे
जीवन में कभी पढ़ाई नहीं कर पाए संजय ने अपने पिता को खोया तो अहसास हुआ कि परिवार चलाना कितनी जिम्मेदारी का काम है। वे घर में बड़े हैं, इसलिए मजदूरी करके परिवार को पाल रहे हैं।

उनकी मां रामदुलारी बताती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था ऐसे दिन देखने पड़ेंगे। वे बताती हैं कि गांव के अधिकतर पुरुष अब शराब छोड़कर अपने परिवारों को बचाने में लगे हैं।

जो हमने सहा, कोई और न सहे- शिवदुलारी, मृतक बाबू की मां
पांच बेटों और दो बेटियों की मां शिवदुलारी ने इस हादसे में अपने एक बेटे को खो दिया था। वे बताती हैं कि शराब से उनके परिवार को ऐसा सबक दिया कि वे आज भी सिहर जाती हैं। वे चाहती हैं कि गांव में अब कोई शराब न पिए। जो उन्हाेंने सहा, कोई और न सहे।

पता नहीं, तीन बेटियों का क्या होगा?
राजरानी, मृतक राजू की पत्नी
जहरीली शराब से तीस वर्षीय पति राजू को खोने वाली राजरानी खेतों में मजदूरी करके परिवार को पाल रही हैं। उन्हें नहीं पता उनका और तीन बेटियों का क्या होगा। अपने कच्चे घर की ओर देखकर बताती हैं कि अगर सरकार अपने वादे के अनुसार पक्का घर दिलवा दे और डीएम बिजली लगवा दें तो कुछ राहत मिलेगी।

55 लोगों की मौत का जिम्मेदार कोई नहीं

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

मलिहाबाद के दतली गांव में जहरीली शराब पीने से हुई 55 मौतों पर हंगामा खड़ा हुआ तो शराब की भट्ठियां बंद करा दी गईं। कुछ अधिकारी निलंबित भी हो गए। हालांकि कुछ को तुरंत बाद ही नई जगहों पर तैनाती मिल गई। सूत्रों के मुताबिक, पूरे मामले की जांच में आबकारी विभाग को क्लीन चिट दे दी गई। इससे भी मौतों के जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो सकी।

सजा या इनाम

शराब दुखांतिका के लिए जिम्मेदार मलिहाबाद के तत्कालीन सीओ श्यामाकांत त्रिपाठी अब भी लखनऊ में ही सीओ मोहनलालगंज के रूप में तैनात हैं। एसडीएम संजीव सिंह का तबादला बिजनौर हो चुका है। वहीं जिन अधिकारियों की नाक के नीचे जहरीली शराब बन रही थी, उनका तबादला कर बेहतर जिलों में तैनाती मिल गई।

उन्नाव के जिला आबकारी अधिकारी अवधेश कुमार वर्मा अब रायबरेली में उसी पद पर तैनात हैं। हादसे के समय लखनऊ के जिला आबकारी अधिकारी लालबहादुर यादव को आगरा में तैनाती दी गई है। इन सभी अधिकारियों को खुद मुख्यमंत्री के आदेश पर निलंबित किया गया था।

डीएम राजशेखर ने फिर दिलाया मदद का भरोसा

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

- अब भी शराब की चोरी-छिपे सप्लाई हो रही है, क्या सख्ती की गई?
डीएम: आबकारी विभाग और पुलिस को निर्देश दिए गए हैं। ऐसे गांवों या ठिकानों की सटीक सूचना पर कार्रवाई की जाएगी।

- कई पीड़ितों के परिवारों को आर्थिक मदद नहीं दी जा सकी, ऐसा क्यों?

डीएम : सभी पीड़ितों को सूचीबद्ध कर मुआवजा दिलवाया गया था। अगर कोई छूट गया है तो वह अपना नाम सूची में जुड़वा सकता है। उसकी पूरी मदद की जाएगी।

- पीड़ितों को लोहिया आवास का आश्वासन दिया गया था, अब तक इसका इंतजार है।
डीएम :
जिला प्रशासन को पिछले साल लोहिया आवास नहीं मिल सके। हमारी पूरी कोशिश है कि पीड़ित परिवारों को लोहिया आवास दिए जाएं।

- पीड़ितों के गांव में बिजली तक नहीं है?
डीएम:
संबंधित गांवों में बिजली कनेक्शन देने केलिए लेसा का एक प्रोजेक्ट राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में पास हुआ है। केंद्रीय मदद के बाद कनेक्शन दे दिए जाएंगे।

आरोपियों को जमानत पर छोड़ना मजबूरी

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

जिला आबकारी अधिकारी जेबी यादव से बातचीत-
- जहरीली शराब फिर से बिकने लगी, विभाग क्या कर रहा है?
यादव- हर महीने हम जिले के अलग-अलग गांवों में 10-15 दबिश देते हैं। किसी वजह से पिछले महीने यह दबिश नहीं हो सकीं। कार्रवाई जारी है।

- लोगों का कहना है कि विभागीय अधिकारी सख्ती नहीं दिखाते।
यादव- दबिश के समय कहीं भी पुरुष नहीं मिलते। केवल महिलाएं ही पकड़ी जाती हैं। उन्हें जमानत पर छोड़ना मजबूरी बन जाती है। जहां पुरुष आरोपी मिलता है, वहां कार्रवाई की जाती है।

- हादसे के बाद सख्ती के लिए क्या किया?
यादव- यूपी आबकारी अधिनियम की धारा-7 में केवल सात साल तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में दोषी जमानत पर छूट जाते हैं। सजा बढ़ाने से जमानत के रूप में राहत नहीं मिलेगी। इससे ऐसे लोगों पर शराब नहीं बनाने का दबाव बनेगा।

कोई सटीक आंकड़ा विभाग के पास नहीं

Special coverage on Malihabad hooch tragedy.

- अवैध शराब की कितनी भट्ठियों को बंद कराया गया?
यादव-
इसका कोई सटीक आंकड़ा विभाग के पास नहीं है। हमारी कार्रवाई लगातार चल रही है। जहां भी ऐसी भट्ठियां मिलती हैं, उनको ध्वस्त कराकर संबंधित व्यक्ति पर कार्रवाई की जाती है।

-बाहर से आने वाली जहरीली शराब पर रोक के लिए क्या कर रहे हैं?
यादव-
आबकारी विभाग बाहर से आने वाली अवैध शराब पर नजर रखता है। ऐसे अड्डों पर भी हम दबिश देकर कार्रवाई करते हैं।

प्रमुख सचिव आबकारी को नहीं मिली जांच रिपोर्ट

प्रमुख सचिव आबकारी किशन सिंह अटोरिया ने बताया कि पिछले साल जनवरी में मलिहाबाद में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के बारे में उन्हें कोई जांच रिपोर्ट नहीं मिली है। हो सकता है रिपोर्ट उनके दफ्तर में आई भी हो, लेकिन उनकी जानकारी में नहीं है।

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