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निर्देशक मनीष मुंद्रा से खास बातचीत : सिया का संघर्ष हर दुष्कर्म पीड़िता के लिए मांग रहा न्याय

Sun, 11 Sep 2022 07:36 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Sun, 11 Sep 2022 07:36 PM IST
सार

मनीष मुंद्रा ने अपील की कि फिल्म के राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है। यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ  दुष्कर्म पीड़िता और उसके परिवार की पीड़ा को पर्दे पर दिखाती है, ताकि हम सब हर हाल में गुनहगार को सजा तक ले जाएं।

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Special conversation with director Manish Mundra: Siya's struggle is seeking justice for every rape victim
मनीष मुंद्रा

विस्तार

मसान, न्यूटन, रामप्रसाद की तेरहवीं, आंखों देखी जैसी हमारे-आपके बीच की कहानियों वाली फिल्मों से जुड़ा नाम है मनीष मुंद्रा का। पांच राष्ट्रीय पुरस्कार की उपलब्धियों, ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रवेश के बाद मनीष ने निर्माता से निर्देशक बनने की ओर पहला कदम बढ़ाया है। बतौर निर्देशक वे हिंदी सिने प्रेमियों के लिए लेकर आ रहे हैं फिल्म सिया, जो 16 सितंबर से सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी। रविवार को इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग लखनऊ में हुई।

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अमर उजाला से खास बातचीत में मनीष मुंद्रा ने फिल्म निर्माण और निर्देशन से जुड़े कई अहम पहलुओं पर बात की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा और सभी से अपील की कि फिल्म के राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है। यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ  दुष्कर्म पीड़िता और उसके परिवार की पीड़ा को पर्दे पर दिखाती है, ताकि हम सब हर हाल में गुनहगार को सजा तक ले जाएं। सिया की शूटिंग का ज्यादातर हिस्सा प्रतापगढ़ में पूरा किया गया है। मनीष कहते हैं कि अगला प्रोजेक्ट तैयार है, उसमें राजस्थानी पृष्ठभूमि और एक अहम मुद्दे पर फिल्म तैयार होगी। पेश है रोली खन्ना की उनसे बातचीत के अंश...।
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अच्छी कहानी का इंतजार कर रहा था
निर्माता से निर्देशक बनने के सवाल पर मनीष मुंद्रा ने कहा कि सोचा पहले आर्थिक रूप से खुद को मजबूत कर लूं, तो वहीं अच्छी कहानी की भी तलाश थी। दो साल के रिसर्च, तीन पीड़िताओं के परिवारों से हर पहलू पर बातचीत, उनके संघर्ष को समझने के बाद इस कहानी को लिखना शुरू किया। स्क्रिप्टिंग भी मैंने ही की है और फिर तय किया निर्देशन करूंगा।
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आंखें नहीं बंद कर सकते, जिम्मेदारी लेनी ही होगी
मनीष कहते हैं कि मिशन शक्ति जैसे प्रयास उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से किए जा रहे हैं। महिलाओं के प्रति अपराध रोकने के लिए ऐसे प्रयास जरूरी हैं। देखिए, आंखें मूंदी नहीं जा सकतीं। न्याय, सरकार, समाज, अखबार और हम फिल्म मेकर्स को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। सिर्फ सुर्खियां बने रहने तक नहीं, बल्कि दोषी को सजा मिल जाने तक हम सबको जिम्मेदारी निभानी होगी।


दुष्कर्म सदियों से हो रहा, अब और वीभत्स हो गया
यह कोई आज की समस्या नहीं है, सिर्फ एक स्थान की समस्या भी नहीं है। दुष्कर्म जैसे घिनौने कृत्य को सदियों से अंजाम दिया जा रहा है। हाल के दिनों में इसका रूप कहीं ज्यादा विभत्स हो गया है। पीड़ित लड़की और परिवार एक लड़ाई कोर्ट में लड़ते हैं, दूसरा समाज में। यह पीड़ा असहनीय है, इसे समझने की जरूरत है।

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