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सोशल इंजीनियरिंग से भाजपा के ध्रुवीकरण का सामना करेगी सपा

Sat, 01 Apr 2017 02:43 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 01 Apr 2017 02:43 AM IST
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SP plan to face BJP in Uttar Pradesh.
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव

भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति का मुकाबला करने के लिए सपा सामाजिक समीकरण को पुख्ता करेगी। पार्टी संगठन में हर स्तर पर पिछड़ों व अति पिछड़ों को नुमाइंदगी देगी। इसके लिए पार्टी संविधान में संशोधन कर महासचिव, सचिव और उपाध्यक्ष के पद बढ़ाए गए हैं।

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वर्ष 2012 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली सपा को कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद इस बार चुनाव में करारा झटका लगा है। सपा सिर्फ 47 सीट ही जीत पाई, जबकि कांग्रेस मात्र 7 सीट ही जीत सकी। वहीं भाजपा को अगड़ों ही नहीं, बल्कि पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियों के वोट थोक में मिले।
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2007 में बसपा और 2012 में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने में भी इसी वोट बैंक की अहम भूमिका थी।

भाजपा ने पिछड़ों को जोड़ने के लिए चुनाव से पहले काफी काम किया। इसके विपरीत सपा अंदरूनी झगड़ों में उलझी रही। पार्टी में विवाद के चलते संगठनात्मक गतिविधियां ठप पड़ गईं और पार्टी गुटबंदी में फंसकर बैक गियर में जाती रही।

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कांग्रेस-सपा का वोट बैंक 28 फीसदी पर सिमटा

SP plan to face BJP in Uttar Pradesh.
अखिलेश यादव व राहुल गांधी - फोटो : amar ujala

2012 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस को अलग-अलग क्रमश: 29.13 व 11.65 फीसदी वोट मिले थे।

इस बार दोनों साथ चुनाव लड़े फिर भी दोनों का वोट बैंक 28 फीसदी पर सिमट गया। सपा को 21.8 और कांग्रेस को 6.2 फीसदी ही मत मिले।

पिछली बार सपा-कांग्रेस को जितने वोट मिले थे इस बार भाजपा व उसके सहयोगी दलों को उससे ज्यादा वोट मिले।

इसमें भाजपा को 39.70, अपना दल को एक और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 0.7 प्रतिशत मत मिले। इसी वोट बैंक से भाजपा व उसके सहयोगी दल 325 सीट जीतने में सफल रहे।

सपा मुलायम के नेतृत्व में कर चुकी है ऐसे हालात का सामना

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मुलायम सिंह यादव

सपा ने राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पिछड़ों और दलितों पर खास ध्यान देने की योजना बनाई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने जैसे हालात हैं, कमोवेश यही स्थिति 1991 में मुलायम सिंह के सामने थी।

मुलायम 1989 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के चलते वोटों का ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि 1991 में भाजपा की सरकार बनी और मुलायम की जनता पार्टी को मात्र 34 सीटें ही मिलीं।

तब वोटों के धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की काट के लिए मुलायम ने बसपा के तत्कालीन अध्यक्ष कांशीराम से गठबंधन किया और 1993 में सपा-बसपा की सत्ता में वापसी हो गई। उस समय धार्मिक भावनाओं पर जातीय गठजोड़ भारी पड़ा।

भाजपा ने इस बार धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के साथ ही जातीय समीकरणों को भी दुरुस्त किया है।

पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की ये है योजना

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सपा की पिछले दिनों हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संगठन में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का रास्ता निकाल लिया गया है। अब तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक उपाध्यक्ष, छह महासचिव और 6 सचिव होते थे। अब इनकी संख्या बढ़ा दी गई है।

15 अप्रैल से सपा का सदस्यता अभियान शुरू होगा जो 15 जून तक चलेगा। इसके बाद पहले जिलों में और सितंबर में राष्ट्रीय सम्मेलन होगा।

जिला से लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी तक हर स्तर पर सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखा जाएगा। पिछड़े, अति पिछड़े, दलित व मुस्लिमों को प्राथमिकता दी जाएगी।

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