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मुजफ्फरनगर दंगा: टूट रहा सपा से सालों पुराना नाता
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
Updated Sat, 21 Sep 2013 02:37 PM IST
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मुजफ्फरनगर-शामली में सांप्रदायिक हिंसा के बाद वेस्ट यूपी में सपा से जुड़े जाट नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी है।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री और पूर्व विधायक रतनलाल पंवार के बाद शुक्रवार को बागपत जिले के दो पूर्व विधायकों डॉ. महक सिंह और डॉ. अजय कुमार ने इस सिलसिले को आगे बढ़ा दिया।
कई जाट नेता ऊहापोह में हैं। सभी की नजरें अब पूर्व सांसद अनुराधा चौधरी और मुकेश चौधरी पर टिकी हैं।
सपा नेताओं के निशाने पर आने के बाद से वे चुप्पी साधे हुए हैं। मुजफ्फरनगर के कवाल में तीन युवाओं की हत्या के बाद प्रशासनिक चूक से ऐसा माहौल बना कि सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई।
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दंगा उन ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा भड़का जहां हमेशा से मुस्लिम और जाटों के बीच सामाजिक सद्भाव कायम रहा था। पूरे घटनाक्रम में शासन-प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई के आरोप लगे। निष्पक्ष कार्रवाई न होने पर अंगुलियां स्थानीय नेताओं से लेकर वरिष्ठ मंत्रियों तक पर उठीं।
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फिलहाल शांति है, लेकिन गहरे जख्मों से न केवल सामाजिक तानाबाना टूटा बल्कि राजनीतिक समीकरण भी बदल गए हैं। जाट नेता सपा से किनारा करने लगे हैं।
बागपत सीट से सपा के लोकसभा प्रत्याशी और पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री ने जहां चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया वहीं कांधला के पूर्व विधायक रतनपाल पंवार ने सपा से नाता तोड़ लिया।
शुक्रवार को बागपत जिले की छपरौली सीट से पूर्व विधायक डॉ. महक सिंह और डॉ. अजय कुमार ने भी शासन-प्रशासन की एकपक्षीय कार्रवाई से खिन्न होकर सपा से इस्तीफा दे दिया।
सपा में नजर नहीं आ रहा भविष्य सामाजिक चिंतक और सेवानिवृत्त प्रोफेसर मेरठ निवासी डॉ. अशोक शास्त्री कहते हैं कि सपा से जाट नेताओं के इस्तीफे मुजफ्फरनगर-शामली में हिंसक घटनाओं की तात्कालिक प्रतिक्रिया है।
जाट लीडरशिप को सपा में भविष्य नजर नहीं आ रहा है। हिंसक वारदातों ने जाटों और मुसलमानों के बीच विभाजन पैदा कर दिया है। मुस्लिम वोट ज्यादा है और सपा की प्राथमिकता भी मुसलमान हैं।
सालों तक जाटों और मुसलमानों के एक मंच पर आने की संभावना नहीं है इसलिए जाट नेता सपा से किनारा करना बेहतर समझ रहे हैं। यह सिलसिला और आगे बढ़ सकता है।
पार्टी छोड़ने वाले समाजवादी नहीं
जाट बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले सपा के प्रदेश सचिव राजपाल सिंह शास्त्री के तर्क से इत्तफाक नहीं रखते। वह कहते हैं कि जाट सेकुलर होता है। जाट-मुसलमानों के बीच सामाजिक एकता रही है।
मुजफ्फरनगर की हिंसा को दुर्घटना के रूप में लिया जाना चाहिए। सांप्रदायिक ताकतों ने आग में घी का काम किया। वह कहते हैं, सपा के जो जाट नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं वे कभी समाजवादी नहीं रहे।
वे चाहे सोमपाल हों, महक सिंह या अजय कुमार। उनके जाने से पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। जाट बिरादरी से संबंधित जो नेता सपा की विचारधारा से जुड़े हैं, वे कभी अलग नहीं हो सकते।
वे ही समाज में पैदा हुई खाई को पाटने का काम करेंगे। सपा का शीर्ष नेतृत्व जातिवादी सोच नहीं रखता। सपा चौधरी चरण सिंह के आदर्शों और नीतियों पर चलने वाली पार्टी है।
अनुराधा और मुकेश को लेकर अटकलें तेज
कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की उपाध्यक्ष अनुराधा चौधरी के अगले कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं। मुजफ्फरनगर की बघरा से विधायक और कैराना से सांसद रहीं अनुराधा पर सपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने दंगा भड़काने के आरोप लगाए हैं।
उन्हीं के साथ राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त मुकेश चौधरी को भी आरोपों के घेरे में लिया गया है। ये दोनों जाट हैं और पार्टी नेताओं के आरोपों पर फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं।
अनुराधा पिछला लोकसभा चुनाव रालोद-भाजपा गठबंधन से मुजफ्फरनगर सीट से लड़ीं थी। वह रालोद की अकेली प्रत्याशी थीं जिनके चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी आए थे। सपा नेताओं के निशाने पर आने के बाद उन्हें लेकर अटकलों का दौर तेज है।