सपा 'नरेश' ने फिर दिया विवादित बयान!
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मोहनलालगंज कांड में पुलिस की तफ्तीश को लेकर हो रही फजीहतों के बाद आखिरकार मामला सीबीआई को सौंपने को राज्य सरकार को मजबूर होना पड़ा।
इस सबके बीच वरिष्ठ सपा नेता नरेश अग्रवाल कहते हैं कि ‘आजकल तो हर जांच सीबीआई से कराने की मांग फैशन बन गई है’ तो सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? ऐसी मांगें यूं ही तो नहीं उठतीं।
उसके पीछे घटता भरोसा है। सनसनीखेज वारदातों में तफ्तीश का भटकाव है। ढेरों वजहें हैं जिनकी वजह से पुलिस और राज्य की जांच एजेंसियों की साख को बट्टा लगा।
रिटायर्ड पुलिस अफसर भी मानते हैं कि प्रोफेशनलिज्म की कमी और राजनीतिक दबावों के चलते जांचों के प्रभावित होने के मामलों के सामने आने से लोगों का भरोसा पुलिस और राज्य की जांच एजेंसियों से टूटा है।
अनुभवी अफसरों की नाकामी एक वजह
पिछले एक दशक पर नजर दौड़ाएं तो 80 से ज्यादा मामलों की जांच सीबीआई से कराने की यूपी की सरकारों ने संस्तुति की। इनमें से 75 मामलों की जांच सीबीआई कर रही है।
यह आलम तब है जब कई मामलों की जांच करने को लेकर सीबीआई असहमति जता चुकी है। इसके बावजूद मामले सीबीआई को संदर्भित किए जा रहे हैं तो यह कहीं न कहीं प्रदेश की जांच एजेंसियों और पुलिस की कार्यकुशलता पर बड़ा सवाल है।
मोहनलालगंज कांड का ही उदाहरण लें तो जिस तरीके से इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को नजरअंदाज कर पुलिस ने थ्योरी गढ़ी उससे सवाल उठने ही थे।
तफ्तीश में अनुभवी अफसर थे ऐसे में किसी के गले ये बात आसानी से नहीं उतर सकती कि यह महज एक चूक हो सकती है। अब अगर पुलिस की मंशा को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है।
सरकार में दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी
लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डी आर साहू साफ कहते हैं कि पुलिस तंत्र में बढ़ते राजनीतिक दखल का नतीजा है कि सरकार का अपनी एजेंसियों पर सही नियंत्रण नहीं रह गया है। ऊपर से लेकर नीचे तक फैली अव्यवस्था ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसकी ही गल्तियां अब उस पर हावी होने लगी हैं।
इनमें सुधार तो लाया जा सकता है लेकिन इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा, जो मौजूदा हालात में संभव नहीं दिखाई दे रहा।
हालात बिगड़ते-बिगड़ते अब इस सीमा तक पहुंच चुके हैं वह सरकार के नियंत्रण में नहीं आ रहे हैं। जो गड़बड़ी सामने आ रही है वह अच्छा शासन न होने की वजह से है। हुक्मरानों में परिपक्वता का अभाव ही इस ओर ले जाता है।
सीआईडी की तैनाती में भाई-भतीजावाद
सूबे की पुलिस-व्यवस्था पर पूर्व डीजीपी श्रीराम अरुण का कहना है कि राज्य की पुलिस में प्रोफेशनलिज्म की कमी साफ दिखती है। पहले ऐसा नहीं था। यूपी की सीआईडी ब्रांच का डंका बोलता था।
कठिन से कठिन केस सुलझा लिए जाते थे। पर अब सामान्य मामलों को हल करने में पसीना आता है। इसकी सीधी वजह है पुलिस और जांच एजेंसियों में अनुभवी लोगों की कमी। जो अनुभवी हैं भी उन्हें दरकिनार रखा जाता है।
तैनाती उन्हीं की होती है जो अपने होते हैं। सीआईडी आदि में तो अब सजा के तौर पर तैनाती की जाती है। अच्छे नतीजे लाने के लिए अच्छे अफसरों की तैनाती करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि पुलिस में राजनेताओं के दखल को बंद करना होगा।
सियासी दखल हद से ज्यादा
पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता का कहना है कि ‘पहले राजनेता पुलिस के काम में दखल नहीं देते थे। अब तो सिपाही और दरोगा तक की तैनाती के लिए सियासी दबाव है।
साथ ही महत्वपूर्ण मामलों में सियासी दखल बहुत ज्यादा है। जब छूट ही नहीं मिलेगी तो निष्पक्ष जांच कैसे होगी?
अब तो पुलिस के इकबाल के साथ ही उसकी कार्यकुशलता पर सवाल खड़ा हो रहा है।
इसके लिए पुलिस से अधिक राजनीतिक तंत्र जिम्मेदार है। सीबीआई में क्या कहीं बाहर से लोग आते हैं। वे भी पुलिसकर्मी होते हैं। फर्क यह है कि वे प्रोफेशनल तो हैं ही, साथ ही उनके काम में कोई दखलंदाजी नहीं की जाती है।’
इन मामलों की जिम्मेदारी सीबीआई को
- मधुमिता हत्या कांड
- आरुषि-हेमराज हत्याकांड
- बरेली में नीरज गुप्ता की फर्जी मुठभेड़ में मौत
- मुरादाबाद में मेडिकल छात्रा की हत्या का मामला
- आगरा में शोध छात्रा की हत्या का मामला
- बांदा का शीलू कांड
- यूपीएसआईडीसी घोटाला
- अनाज घोटाला
- मनरेगा घोटाला
- मिल-डे मील घोटाला
- एनआरएचएम घोटाला
ये मामले भी सीबीआई के हवाले
- सीएमओ डॉ. बीपी सिंह व डॉ. विनोद आर्य हत्याकांड
- लखनऊ जिला कारागार में डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान की मौत का मामला
- लखीमपुर का सोनम कांड
- प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक की हत्या का मामला
- बदायूं में दो किशोरियों की दुराचार के बाद हत्या का मामला।