गठबंधन की बात खत्म, अब एक-दूसरे को धूल चटाने की तैयारी में सपा-बसपा
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भाजपा के खिलाफ सपा, बसपा व अन्य विपक्षी दलों का गठबंधन फिलहाल दूर की कौड़ी दिख रहा है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती की भाजपा के विरुद्ध महागठबंधन की वकालत के बावजूद नगर निकायों के चुनाव में सभी विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। सपा-बसपा ने तैयारियां शुरू भी कर दी हैं।
लोकसभा व विधानसभा चुनावों में भाजपा ने सपा-बसपा को करारा झटका दिया है। लोकसभा चुनाव में जहां बसपा का खाता नहीं खुला, वहीं सपा को सिर्फ 5 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। इनमें भी मुलायम सिंह व उनके परिवार के सदस्य ही विजयी रहे थे।
विधानसभा चुनाव में तो मुलायम की पुत्रवधू अपर्णा यादव और भतीजे अनुराग यादव भी चुनाव हार गए। मुलायम परिवार से सिर्फ शिवपाल ही अपनी जसंवतनगर सीट को बरकरार रखने में सफल रहे हैं। बसपा का हाल तो और भी खराब रहा।
सत्ता की दावेदारी का सपना देख रही बसपा 19 सीटों पर सिमट गई। चुनाव में मिली करारी हार के बाद सबसे पहले अखिलेश और फिर मायावती ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन की वकालत की थी। लेकिन मौजूदा हालात में महागठबंधन की संभावना धूमिल दिख रही है।
अगले डेढ़ महीने में शुरू हो जाएगी चुनाव की प्रक्रिया
नगर निगम, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में मेयर, अध्यक्ष व पार्षदों के चुनाव की प्रक्रिया एक-डेढ़ माह में शुरू हो जाएगी।
इन चुनावों में प्रदेश की राजनीति के दोनों बड़े खिलाड़ी अकेले ही मैदान में उतरेंगे। सपा-बसपा ने निकाय चुनाव अपने सिंबल पर लड़ने का एलान किया है और तैयारियां तेज हो गई हैं।
सपा ने मांगे दावेदारों के नाम
सपा ने प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मेयर व अध्यक्ष पद के प्रत्याशी सपा नेतृत्व तय करेगा जबकि पार्षदों के टिकट जिला स्तर पर फाइनल किए जाएंगे।
इस संबंध में सपा ने सभी जिलों से मेयर व पालिका अध्यक्षों के दावेदारों के नाम मांगे हैं। जिला इकाइयां संभावित नामों का पैनल प्रदेश इकाई को भेजेंगे।
सपा 10 मई तक प्रत्याशियों के नामों पर विचार पर उम्मीदवारों की घोषणा शुरू कर सकती है।
चुनाव से पहले बसपा की ओवरहॉलिंग
बसपा भी चुनावी तैयारी में पीछे नहीं है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती ने संगठन की ओवरहालिंग कर दी है। इस क्रम में उन्होंने प्रदेश को दो हिस्सों में बांटकर प्रभारी बनाए हैं। मंडल स्तर पर छह-छह को-ऑर्डिनेटरों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
जिलों की टीम में भी बदलाव किया है। इसी टीम को निकाय चुनाव की रणनीति बनाने के निर्देश दिया है। यह भी कहा है कि किसी प्रत्याशी को पैसा लेकर टिकट नहीं दिया जाएगा। अगर किसी ने पैसा लेने की कोशिश की तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
दूसरे दल भी पीछे नहीं
सपा-बसपा के अलावा कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल भी अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में निकाय चुनाव अपने बूते पर लड़ने का फैसला किया है। इससे विपक्षी एकता की कोशिशें फिलहाल अटक गई है।
नगरीय निकायों में भी भाजपा पहले ही मजबूत मानी जाती है। ऐसे में एकजुट विपक्ष के बिना भाजपा के सामने चुनौती पेश करना आसान नहीं होगा।