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सीतापुर लोकसभा सीट: मतदाताओं का बड़े दलों पर भरोसा कायम, इस बार साफ नहीं मिजाज, अब तक ये रहा है इतिहास

Fri, 19 Apr 2024 03:26 PM IST
ishwar ashish उदय प्रकाश सिंह, अमर उजाला, सीतापुर
उदय प्रकाश सिंह, अमर उजाला, सीतापुर Published by: ishwar ashish Updated Fri, 19 Apr 2024 03:26 PM IST
सार

सीतापुर में 17 लोकसभा चुनाव में वोटरों ने 16 बार राष्ट्रीय पार्टियों को जिताया है। 1996 में मतदाताओं का बड़े दलों से भरोसा डगमगाया तो सपा ने जीत दर्ज की थी।

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Sitapur Loksabha seat: voters had faith on big parties.
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala

विस्तार

संसदीय सीट सीतापुर के मतदाताओं ने आजादी के बाद से अब तक बड़े दलों (राष्ट्रीय पार्टियों) पर ही भरोसा जताया है। एक बार का चुनाव छोड़ दें, तो अब तक हुए 17 लोकसभा के चुनाव में वोटरों ने 16 बार जीत का ताज कांग्रेस, जनसंघ, बीएलडी, भाजपा, बसपा इत्यादि राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को पहनाया है। हालांकि, 1996 में मतदाताओं ने सपा प्रत्याशी पर भी दरियादिली दिखाकर संसद पहुंचाया है। इस बार भी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच ही मुख्य मुकाबला होने के आसार हैं।

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बहरहाल, वोटर का मिजाज इस बार फिलहाल साफ नहीं है। चुनावी शंखनाद के बाद से सियासी बयार तेज जरूर हो गई है। सीतापुर लोकसभा क्षेत्र का गठन पहली लोकसभा के साथ 1951 में हुआ था। पहले चुनाव में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई की पत्नी उमा नेहरू जीतीं थीं। 1957 का चुनाव भी उन्हीं के नाम रहा। फिर 1962 में जनसंघ के सूरज वर्मा ने उमा नेहरू का विजयरथ रोककर सीट पर कब्जा कर लिया। 1967 के चुनाव में जनसंघ का टिकट पूर्व प्रधानमंत्री अटल के सहयोगी शारदानंद दीक्षित को दिया गया।
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शारदानंद ने कसौटी पर खरे उतरते हुए विजय पताका फहरा दी। 1971 के चुनाव में कांग्रेस के जगदीश चंद दीक्षित ने शारदानंद का तख्ता पलट दिया। 1977 के चुनाव में भारतीय लोकदल के हरगोविंद वर्मा का डंका बजा। वर्ष 1980-84 और 86 के चुनाव में कांग्रेस की राजेन्द्र कुमारी वाजपेयी ने लगातार जीत दर्ज कर सीतापुर संसदीय सीट के इतिहास में पहली बार हैट्रिक तो लगाई, मगर 1991 में भाजपा के जनार्दन प्रसाद मिश्र ने इन्हें शिकस्त देकर चौथी बार जीतने से रोक दिया। 

- 1996 के चुनाव में जनता ने फिर बदलाव करते हुए सपा के मुख्तार अंसारी को कुर्सी सौंप दी। इस साल वोटरों का भरोसा राष्ट्रीय पार्टियों से डगमगा गया। हालांकि, 1998 में फिर भाजपा के जनार्दन प्रसाद मिश्र पर भरोसा जताते हुए जनता ने उन्हें जिता दिया। 1999 से लेकर 2004 और 2009 में यह सीट बसपा के कब्जे में रही। 1999 तथा 2004 में बसपा के राजेश वर्मा, जबकि 2009 में कैसरजहां यहां से सांसद निर्वाचित हुईं। 2014 के चुनाव में कभी बसपाई रहे राजेश वर्मा ने भाजपा का दामन थाम लिया।


- पहली बार बसपा के खाते में यह सीट दिलाने वाले राजेश वर्मा ने 2014 के चुनाव में भाजपा के सिंबल पर जीत दर्ज कर बसपा के विजयरथ पर ब्रेक लगा दिया। 2019 के चुनाव में भी भाजपा के राजेश पर वोटरों का भरोसा कायम रहा। अब 2024 की चुनावी हलचल तेज हो गई है। मगर सीतापुर के मतदाता चुप्पी साधे हैं। यहां के वोटर अबकी किस दल अथवा प्रत्याशी पर भरोसा जताकर कौन सा नया गुल खिलाएंगे, फिलहाल यह वक्त की आगोश में है।

- चुनावी कश्ती पर हर बार छोटे दल होते सवार, नहीं लगते पार : सीतापुर लोकसभा क्षेत्र की चुनावी कश्ती पर हर साल कई छोटे दल भी सवार होते हैं। लेकिन अब तक कोई चुनावी वैतरणी पार नहीं कर पाया है। 2019 के चुनाव में आम जनता पार्टी, अवामी समता पार्टी, भारत प्रभात पार्टी, बहुजन अवाम पार्टी व प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी मैदान में थे। 2014 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लाक, जय हिंद समाज पार्टी, नैतिक पार्टी, नव भारत डेमोक्रेटिक पार्टी, नागरिक एकता पार्टी व बहुजन मुक्ति पार्टी ने उम्मीदवार दंगल में उतारा था। इसी तरह हर चुनाव में छोटे दल अपना प्रत्याशी तो उतारते हैं, पर मतदाताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रह जाते हैं।

- बाहरी उम्मीदवारों पर मेहरबान रहे मतदाता : सीतापुर बाहरी उम्मीदवारों पर खासा मेहरबान रहा। अब तक होने वाले 17 लोकसभा के चुनाव में सात बार गैर जनपद के प्रत्याशी को जीत का ताज पहनाकर संसद भेजा है। 1951 के पहले चुनाव में ही आगरा की उमा नेहरू को अपना सांसद चुना। मतदाताओं ने 1957 में भी उमा नेहरू पर भरोसा कायम रखा। 1962 में जनसंघ प्रत्याशी लखनऊ डालीगंज निवासी सूरजलाल को संसद भेजा। 1971 में कांग्रेस के जगदीश चंद्र को नुमांइदा चुना। जगदीश चंद्र भी लखनऊ के रहने वाले थे। 1980-84 और 1989 में लगातार तीन बार कांग्रेस की राजेंद्र कुमारी वाजपेयी को प्रतिनिधित्व सौंपा। राजेंद्र कुमारी बिहार के भागलपुर की रहने वाली थीं।

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