बाप रे! MNREGA में खरीद लिए एक करोड़ के खिलौने
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प्रदेश में हुए मनरेगा घोटाला तूल पकड़ता जा रहा है। इस मामले में सीबीआई ने कुछ दिन पहले तीन जिलों में हुई धांधली को लेकर मुकदमे दर्ज किए थे।
मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी इस मामले में दखल देते हुए सात जिलों गोंडा, बलरामपुर, महोबा, सोनभद्र, मिर्जापुर, कुशीनगर व संत कबीरनगर में बड़े पैमाने पर घोटाला कर कई सौ करोड़ की रकम का वारा-न्यारा किए जाने के आरोप का मुकदमा दर्ज किया है।
ईडी ने सात जिलों की अनियमितता को लेकर कुल आठ मुकदमे किए हैं। ईडी के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय कार्यालय में यह सभी मुकदमे सहायक निदेशक नवेंदु कुमार दास के पर्यवेक्षण में मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत दर्ज किए गए।
ईडी ने इस मामले में दो दर्जन से अधिक प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा अन्य को अपनी जांच के दायरे में लिया है। इडी इन सभी की चल-अचल स़ंपत्ति की जानकारी में जुट गई है। इसके साथ ही उनके करीबियों के खातों को भी टटोलेगी।
इस तरह सामने आए अफसरों के नाम
ईडी के सूत्रों का कहना है कि जांच का आधार मनरेगा घोटाले की तत्कालीन क्वालिटी मैनेजर आईएएस विनोद शंकर चौबे की जांच रिपोर्ट पर आधारित है। इसमें तकरीबन 25 आईएएस अफसरों के अलावा अन्य के नाम सामने आए थे।
जबकि जुलाई के अंतिम पखवारे में सीबीआई द्वारा गोंडा, बलरामपुर व महोबा जिले में हुई अनियमितता को लेकर जो मुकदमे दर्ज किए हैं, सिर्फ उसकी जांच के दायरे में तत्कालीन नौ डीएम व आठ सीडीओ आ रहे हैं। इनके अलावा परियोजना निदेशक व अन्य भी जांच के दायरे में हैं।
वैसे प्रारंभिक जांच में यह तथ्य कमोबेश सामने आ चुके हैं कि किस जिले में कौन सा अधिकारी इस अनियमितता के लिए दोषी था, लेकिन ईडी इसके बाद भी घोटाला अवधि में संबंधित जिलों में तैनात रहे सभी अधिकारियों की भूमिका आकलन करेगी।
इन जगहों पर थी इन अफसरों की तैनाती
जहां घोटाले के समय महोबा में डीएम विजय विश्वास पंत और अनीता चटर्जी तथा सीडीओ जयराम लाल वर्मा, रवि कुमार और प्रमोद श्रीवास्तव के अलावा परियोजना प्रबंधक हरि नारायण तैनात रहे।
वैसे ही गोंडा में डीएम मुकेश मोहन मिश्र, यूपी सिंह व मधुकर द्विवेदी और सीडीओ राज बहादुर और रामदास तैनात रहे। जबकि बलरामपुर में डीएम सच्चिदानंद दुबे, मोहम्मद मुस्तफा व पंचम वर्मा तैनात रहे।
जिले में इस अवधि में हरि प्रसाद तिवारी, दीनानाथ गुप्त और यशवंत राव सीडीओ के पद पर तैनात रहे। इसी तरह सोनभद्र के तत्कालीन डीएम पंधारी यादव का नाम भी जांच के दायरे में आ रहा है। यादव मौजूदा समय में पंचम तल पर तैनात हैं।
चार साल तक चला घोटाला
मनरेगा योजना के कई सौ करोड़ बजट में घोटालेबाज चार साल तक सेंध लगाते रहे। जब केंद्र ने इसकी शिकायत की तब जाकर मामले की जांच शुरू हो सकी।
प्रारंभिक दौर में सात जिलों की जांच में छह सीडीओ, आठ परियोजना निदेशकों, 30 विकास खंड अधिकारियों तथा 52 फील्ड स्तरीय अधिकारियों पर विभागीय जांच शुरू की गई थी।
इसके अलावा एक अधीक्षण अभियंता, एक डीएफओ, 4 अधिशासी इंजीनियर, तीन सहायक अभियंता, 16 अवर अभियंता तथा 28 ग्राम प्रधानों के विरुद्घ कार्यवाही की गई। इन मामलों में दस एफआईआर भी दर्ज करवायी गई थी।
इसलिए सीबीआई को दी गई जिम्मेदारी
सरकार ने तब योजना के राज्य मॉनीटर विनोद शंकर चौबे से जांच कराई थी। जिन्होंने कई जिलों में अनियमितता की बात कही थी। प्रारंभिक दौर में जांच का दायरा 17 जिलों से अधिक फैले होने की बात सामने आई थी।
बाद में मामला उच्च अदालत पहुंचा जहां से इसकी जांच सीबीआई से कराए जाने के निर्देश दिए गए। अदालत ने सीबीआई को शुरूआत में सात जिलों गोंडा, बलरामपुर, महोबा, सोनभद्र, मिर्जापुर, कुशीनगर व संत कबीरनगर में जांच के लिए कहा और यह भी सलाह दी कि अगर जांच की कड़ी में अन्य जिलों में भी अनियमितता सामने आती है तो जांच का दायरा बढ़ाया जाए।
गोंडा: 50 लाख की पानी की टंकी
एक करोड़ के खरीद लिए खिलौने। यह खिलौने मनरेगा में लगी महिलाओं के बच्चों के पालनघर के नाम पर खरीद गए। यही नहीं 1.09 करोड़ के टेंट भी खरीद लिया गया।
50 लाख की पानी टंकी, दो करोड़ के फावड़े, तसला व गैती की फर्जी खरीद हुई। ज्यादातर खरीद उप्र उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड ने बिना टेंडर के की। प्रदेश सरकार ने स्पष्ट किया कि यह संस्था सरकारी नहीं निजी है।यह सब वर्ष 2007-08 में हुआ।
महोबा:
वर्ष 2008-09 में लखनऊ की फर्म से 51 लाख रुपये के टेंट खरीदे गए और 50 लाख का भुगतान भी हो गया। इस फर्म को अभी तक खोजा नहीं जा सका है।
जांच में टेंट भी नहीं मिले। अफसरों ने इस खरीद का ठीकरा 140 ग्राम सभाओं पर मढ़ा है। लेकिन इसका जवाब आना है कि सभी ग्राम सभाओं ने इसी फर्म से खरीद का फैसला कैसे कर लिया?
बलरामपुर: खरीद लिए 80 लाख के टेंट
यहां मनरेगा फंड से डेढ़ लाख रुपये के कलेंडर, 80 लाख के टेंट और सात लाख के प्राथमिक उपचार वाले बाक्स खरीद लिए गए। इसके अलावा छह लाख की पानी की टंकी खरीदी गई।
जांच टीम ने पाया कि यह सामान भी पंचायतों में नहीं मिला। केवल दो-एक अफसरों पर ही हुई अब तक कार्रवाई। यह सब गड़बड़ियां वर्ष 2007-08 के दौरान हुईं।
कुशीनगर
यहां राज्यस्तरीय क्वालिटी मॉनीटर की जांच में पता चला कि कई पंचायतों ने राजेश नाम के एक व्यक्ति को 50 लाख रुपये तक के चेक बांट दिए। जांच अधिकारी ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी या किसी अन्य संस्था से कराने को कहा गया है।
यहां 20 लाख के फर्स्ट एड बाक्स, 75 लाख का फावड़ा, 25 लाख की पानी टंकी खरीदी गई। इसके अलावा तीस लाख से फर्नीचर खरीदा गया।
मिर्जापुर-दबंगों ने की खूब मनमानी
मिर्जापुर जिले में बिना मानकों को पूरा किए मनरेगा फंड से सामान की खरीद की गई। इस तरह चार करोड़ रुपये की धनराशि के दुरुपयोग का मामला सामने आया है। यहां दबंगों ने खूब मनमानी की।
सोनभद्र- वर्ष 2009-10 में इस छोटे से जिले में मनरेगा के नाम पर 250 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। यहां खूब धांधली की गई। जो चेकडैम बनाए गए या मरम्मत करवाई गई, वहां कुछ समय बाद दरारें पड़ गईं।
संतकबीर नगर
यहां भी मानकों की अनदेखी कर उस ईंट भट्टों से ईटों की खरीद की गई, जिसका मालिक बसपा नेता का रिश्तेदार बताया जाता है।