... तो सपा ने इसलिए लगाया पुराने चेहरों पर ही दांव
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पर, शहर की पांचो सीटों के प्रत्याशी घोषित हो जाने से भावी सियासी परिदृश्य का संकेत जरूर मिलने लगा है। इन सीटों पर सपा के सामने साख बचाने तो भाजपा के सामने खोई प्रतिष्ठा लौटाने की चुनौती है।
बसपा की बात करें तो उसके लिए यहां इस बार खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कॉंग्रेस ने अभी किसी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। बंटवारे में उसे यहां कितनी सीटें मिलेंगी यह भी साफ नहीं हो पाया है।
इसलिए फिलहाल वह दर्शक की ही भूमिका में दिखाई दे रही है।दरअसल, 2012 के पहले लखनऊ की पांच शहरी सीटें एक तरह से भाजपा का गढ़ जैसी मानी जाने लगी थी। इन सीटों में दो लखनऊ पश्चिम व मध्य पर तो 1989 से 2012 चुनाव के पहले तक भाजपा का कब्जा रहा।
शेष तीन सीटों पूरब, मध्य व कैंट पर 1991 से 2012 के पहले तक भाजपा जीतती रही थी। पर, विधानसभा के पिछले चुनाव में उसे इन सीटों में एक को छोड़कर सभी पर पराजय का सामना करना पड़ा।
मध्य से सपा के रविदास मेहरोत्रा, पश्चिम से सपा के ही रेहान और उत्तर से इसी पार्टी के अभिषेक मिश्र विजयी रहे थे। कैंट से रीता बहुगुणा जोशी कॉंग्रेस के टिकट पर जीती थी तो पूरब सीट से भाजपा के टिकट पर कलराज मिश्र ने सफलता पाई थी। ग्रामीण इलाके की मोहनलालगंज, सरोजनीनगर, मलिहाबाद और बख्शी का तालाब सीट भी सपा के ही हिस्से में गई थी।
सीट बरकरार रखने की चुनौती
सपा ने मेहरोत्रा, रेहान और मिश्र को इस बार भी उन्हीं की सीटों से मैदान में उतारा है। स्वाभाविक है कि इन सबके सामने न सिर्फ अपनी सीट बरकरार रखने की चुनौती है बल्कि शहरी मतदाताओं में भी सपा की स्वीकार्यता के दावे को साबित करने का सवाल है।
भाजपा ने मेहरोत्रा के खिलाफ बसपा से आए बृजेश पाठक को तो बसपा ने राजीव श्रीवास्तव को उम्मीदवार बनाया है। विधानसभा के पिछले चुनाव में बसपा यहां चौथे नंबर पर रही थी।
सपा के रविदास मेहरोत्रा ने भाजपा के विद्यासागर गुप्त को लगभग 22 हजार वोटों से हराया था। सपा के रेहान के मुकाबले के लिए भाजपा ने इस बार फिर पुराने चेहरे सुरेश श्रीवास्तव पर ही भरोसा जताया है।
पिछली बार रेहान ने सुरेश को लगभग 7 हजार वोटों से हराया था। बसपा ने इस सीट पर अरमान खान को उम्मीदवार बनाया है। पिछले चुनाव में इस सीट पर भी बसपा चौथे स्थान पर रही थी।
उत्तर सीट से अभिषेक मिश्र के सामने भाजपा ने इस बार नीरज बोरा तो बसपा ने अजय श्रीवास्तव को उतारा है। पिछली बार इस सीट से भाजपा के टिकट पर आशतोष टंडन लड़े थे। बोरा कॉंग्रेस के टिकट पर अभिषेक का मुकाबला कर रहे थे।
अभिषेक मिश्र उन्हें कांटे के संघर्ष में लगभग एक हजार वोटों से हरा पाए थे। बसपा यहां भी चौथे स्थान पर रही थी। जाहिर है कि इन तीनों पर इस बार भी कांटे का संघर्ष होगा। बसपा के उम्मीदवार कायस्थ और मुसलमानों के वोटों का बंटवारा करने की कोशिश करेंगे। जिससे समीकरणों में उलटफेर भी हो सकता है।
कैंट में सपा व भाजपा दोनों की साख कसौटी पर
सपा ने यहां मुलायम की बहू अपर्णा यादव को मैदान में उतारा है। बसपा ने योगेश दीक्षित को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा उम्मीदवार रीता के सामने न सिर्फ अपनी जीत के सिलसिले को जारी रखने की चुनौती है बल्कि इसे भाजपा की झोली में फिर डालने का भी सवाल खड़ा हुआ है।
पिछले चुनाव में रीता को कॉंग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर 63 हजार तो भाजपा के सुरेश तिवारी को 41 हजार वोट मिले थे। बसपा तीसरे नंबर पर रही थी। मुलायम की छोटी बहू अर्पणा यादव के सियासी मैदाने में आने के बाद से सीट पर कांटे की टक्कर के आसार बन गए हैं।
लखनऊ पूरब सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने मौजूदा विधायक आशुतोष टंडन उर्फ गोपाल को ही उतारा है। सपा ने अभी इस सीट पर उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।
बसपा के टिकट पर सरोज शुक्ल चुनाव लड़ रहे हैं। यही एक सीट ऐसी है जिस पर भाजपा की जीत का सिलसिला 2012 में भी नहीं टूटा था। स्वाभाविक रूप से भाजपा के सामने इस बार और बड़ी चुनौती होगी और इसके लिए उसे कांटे की टक्कर का सामना करना पड़ेगा।