फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   RSS policy behind comment on reservation issue.

RSS का आरक्षण मुद्दे के पीछे है खास एजेंडा, यूं ही नहीं हो रही बयानबाजी!

Sun, 22 Jan 2017 02:13 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 22 Jan 2017 02:13 AM IST
विज्ञापन
RSS policy behind comment on reservation issue.
demo pic

भले ही लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य का आरक्षण के मुद्दे पर दिया गया बयान भाजपा के लिए खतरे की घंटी नजर आ रहा हो। विरोधी दलों के छोटे-बडे़ नेता वैद्य के विरोध में मैदान में उतर आए हों।

विज्ञापन


ये सभी खुश हो रहे हों कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा की वकालत ने जिस तरह बिहार में भाजपा की लुटिया डुबो दी थी, वैसा ही कुछ यूपी में होने जा रहा है। पर, गहराई से नजर डालें तो न वैद्य ने बिना सोचे-समझे इस मुद्दे को उछाला है और न मोहन भागवत ने बिन सोचे-समझे बिहार चुनाव के वक्त इस मामले पर बयान दिया था।
विज्ञापन


इन बयानों के पीछे भगवा परिवार की कोशिश किसी न किसी तरह अपने एजेंडे को धार देने की है। रही बात बिहार में भाजपा की पराजय की, तो उसके अलग कारण थे।

बिहार में पिछड़े वर्ग के दो बड़े पिछड़े नेता लालू यादव व नीतीश कुमार एक साथ थे। साथ ही वहां कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूले के तहत अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण तय है।

विज्ञापन
विज्ञापन

इस तरह किया गया आरक्षण का इस्तेमाल

RSS policy behind comment on reservation issue.

यही नहीं, नीतीश सरकार ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले पंचायतों में भी अति पिछड़ों के लिए आरक्षण तय करके इन जातियों को एक तरह से लामबंद कर लिया था। पर, यूपी में बिहार जैसी स्थिति नहीं है।

यहां न तो सपा व बसपा में गठजोड़ की संभावना है और न ही अति पिछड़ों को लुभाने के लिए सपा या बसपा की सरकारों ने कुछ किया है।

रुख भांपने की कोशिश
वैद्य का बयान तालाब में कंकड़ फेंकने जैसा है। उन्होंने इस बहाने से जहां अगड़ों को भाजपा व संघ की तरफ खींचने की कोशिश की है, वहीं अति पिछड़ों व अति दलितों को भी इस मामले में भगवा टोली के इरादों का संदेश देने का प्रयास किया है। साथ ही यह कहकर, इस आरक्षण को धार्मिक आरक्षण की तरफ बढ़ाया जा रहा है।

एक तरह से इन जातियों को यह समझाने की कोशिश की है कि वे चुप बैठे रहे तो उनके हिस्से का आरक्षण मुसलमानों के हिस्से में चला जाएगा।

भाजपा ने बनाई थी सामाजिक न्याय समिति

RSS policy behind comment on reservation issue.

दरअसल, संघ और भाजपा लगभग डेढ़ दशक से आरक्षण की समीक्षा के मुद्दे को हवा देते रहे हैं। दोनों संगठनों के महत्वपूर्ण लोग अलग-अलग शब्दों में यह बात उठाते रहे हैं कि आरक्षण का लाभ सिर्फ चुनिंदा जातियों तक ही सिमटकर रह गया।

ऐसी जातियों की बड़ी संख्या है जिन्हें इसका लाभ नहीं मिल सका है। इसी तर्क के साथ 2001 में भाजपा की तत्कालीन राजनाथ सिंह सरकार ने आरक्षण का लाभ पिछड़ों व दलितों में सभी जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में मुहैया कराने के लिए सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू की थी।

भाजपा नेता हुकुम सिंह की अध्यक्षता में गठित इस समिति ने आरक्षण में आरक्षण का फॉर्मूला बनाया था। इसके मुताबिक, पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण को यादव के साथ कुर्मी, लोध, माली, नाई, तेली, तमोली, काछी, शाक्य व मौर्य जैसी पिछड़ी जातियों में बांटने की व्यवस्था की गई थी तो अनुसूचित जाति को मिलने वाले 21 प्रतिशत आरक्षण को भी जाटव के साथ पासी, वाल्मीकि, खटिक, तरमाली व धोबी सहित अन्य दलित जातियों में बांटा गया था।

इस मसले पर सपा-बसपा ने साध ली थी चुप्पी

RSS policy behind comment on reservation issue.
मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala

यह बात दीगर है कि राजनाथ सिंह की सरकार के ही एक मंत्री अशोक यादव की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर  रोक लगा दी कि यह निर्णय जल्दबाजी में किया गया।

बाद में बनी मुलायम सिंह यादव, मायावती और मौजूदा अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने इस मामले में चुप्पी साधे रखना ही उचित समझा क्योंकि इससे सपा के यादव तो बसपा के जाटव वोटों की नाराजगी का खतरा था।

इसलिए डोरे डालने की कोशिश
यूपी की सियासत में मुलायम सिंह यादव और मायावती के उभरने से जिस तरह पिछड़े व दलित अलग-अलग लामबंद हुए, उसके बाद से ही भगवा खेमे की चिंता कहीं न कहीं अति पिछड़ी व अति दलित जातियों में सेंधमारी की रही है, जिससे सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में किया जा सके।

पिछड़ी जातियों में यादवों की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत

RSS policy behind comment on reservation issue.

यही वजह थी कि प्रदेश की आबादी में 54 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली पिछड़ी जातियों में यादवों की हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत है। बाकी जातियों की हिस्सेदारी 6 से 1 प्रतिशत के बीच ही है। इसी तरह दलितों की 21 प्रतिशत आबादी में जाटव की आबादी 14 प्रतिशत है।

गैर जाटव अन्य जातियों की आबादी 8 से 1 प्रतिशत के बीच ही है। यादवों की मुलायम सिंह यादव तो जाटव बिरादरी की मायावती के साथ लामबंदी ही इन दोनों नेताओं को काफी मजबूत बनाती है।

ऐसे में भगवा टोली को अपने आधार को मजबूत करने के लिए गैर यादव व गैर जाटव बिरादरी को लामबंद करने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है।

शायद यही वजह है कि भाजपा की तरफ से केंद्र सरकार के जरिये जहां यूपी चुनाव के बाद यूपी की सामाजिक न्याय समिति रिपोर्ट के फॉर्मूले को पूरे देश में लागू करने का संकेत दिया जा रहा है, वहीं कई मौकों पर भाजपा नेताओं की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि यूपी में भाजपा सरकार बनी तो सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में दिए गए स्थगन आदेश को निरस्त करने की पैरवी की जाएगी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed