रामगोपाल की वापसी: अखिलेश का कद बढ़ा, शिवपाल मायूस
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छह साल के लिए निकाले गए रामगोपाल यादव की 25 दिन बाद ही सपा में वापसी होने से सीएम अखिलेश का कद तो बढ़ गया पर शिवपाल को झटका लगा है। अगर गौर करें तो पाएंगे कि गंभीर आरोप लगाकर हटाए गए रामगोपाल यादव की सपा में और पदों पर यूं ही वापसी नहीं हुई है। सपा का विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग उठाने से मुलायम सिंह यादव बैकफुट पर आए। बंद मुट्ठी की तरह पार्टी को एकजुट रखने के लिए उन्होंने निष्कासन के 25 दिन बाद ही रामगोपाल की पुरानी स्थिति बहाल कर दी।
रामगोपाल यादव को 23 अक्तूबर को सपा से 6 साल के लिए निष्कासित किया गया था। परिवार के विवाद में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ खड़े होने वाले रामगोपाल ने चिट्ठियों के जरिये सपा नेतृत्व, खासतौर से मुलायम पर तीखा हमला किया था।
निष्कासन के दिन भी उन्होंने मुंबई से कार्यकर्ताओं के नाम पत्र भेजा था। इसी से नाराज मुलायम ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। निष्कासन के बाद भी वे अखिलेश के साथ खड़े रहे। 14 नवंबर को रामगोपाल ने इटावा में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तीन मांगे उठाई थी। इन्हें पूरा न किए जाने पर पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की थी।
उनकी मांगों में बर्खास्त नेताओं की तत्काल बहाली, टिकट वितरण में अखिलेश की सहमति अनिवार्य रूप से लेने और 2017 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व और चेहरे के साथ लड़ने की मांग शामिल थी।
अपनी ताकत दिखा सकते थे रामगोपाल
उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय अधिवेशन के प्रतिनिधियों, सांसदों, विधायकों की मंशा के अनुरूप ये मांगे उठाई हैं। मतलब था कि राष्ट्रीय अधिवेशन के प्रतिनिधि, सांसद और विधायक उनके साथ हैं। सपा संविधान के मुताबिक राष्ट्रीय सम्मेलन के 40 फीसदी प्रतिनिधियों की मांग पर विशेष अधिवेशन कभी भी बुलाया जा सकता है।
मुलायम को अंदेशा था कि अखिलेश की सहमति से रामगोपाल विशेष अधिवेशन बुलाकर ताकत दिखा सकते हैं। ऐसे में उनकी बंद मुट्ठी खुल जाएगी। देश की राजनीति में उनके परिवार का तिलिस्म टूट जाएगा, पार्टी विभाजन की तरफ चली जाएगी। इसी से बचने के लिए उन्होंने रामगोपाल को राज्यसभा में सपा संसदीय दल के नेता पद से नहीं हटाया।
बृहस्पतिवार को उन्होंने रामगोपाल का निष्कासन तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया। यह भी कहा कि संसदीय दल के नेता, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, प्रवक्ता व संसदीय बोर्ड के सदस्य भी बने रहेंगे।
मुलायम के पास नहीं था कोई विकल्प
रामगोपाल की जगह किसी और को संसदीय दल का नेता बनाने का विकल्प मुलायम के पास नहीं था। दल नेता के लिए कोई सर्वसम्मत नाम नहीं था। कुछ नाम चर्चा में आए, लेकिन उन्हें लेकर कुछ दिक्कतें थीं...
इनके नाम पर ये थीं मुश्किलें
बेनी प्रसाद वर्मा : मुलायम के पुराने साथी है, लेकिन कांग्रेस में लंबी पारी खेलने के बाद कुछ महीने पहले ही उनकी सपा में वापसी हुई है। सपा ने उन्हें राज्यसभा में भेजा है। कांग्रेस में रहते हुए वे मुलायम पर तीखे हमलों के लिए जाने जाते थे। रामगोपाल ने मुलायम के लिए जो कुछ कहा है, बेनी उससे कई गुना कह चुके हैं।
अमर सिंह : मुलायम निजी तौर पर अमर सिंह को पसंद करते हैं, लेकिन पार्टी में उनकी स्वीकार्यता न होने का अंदाजा था। उन्हें राज्यसभा में संसदीय दल का नेता बनाए जाने से अखिलेश समेत पार्टी में कई नेताओं के विरोध की आशंका थी। पार्टी में सुलह की कोशिशों की बीच कलह और तेज हो सकती थी।
नरेश अग्रवाल : नरेश को रामगोपाल का नजदीकी माना जाता है। मुलायम उन्हें विश्वसनीय नहीं मानते हैं। उन्हें नेता बनाए जाने का संदेश यह जाता कि अप्रत्यक्ष तौर पर संसदीय दल रामगोपाल की छाया से मुक्त नहीं हो पाया है। जातीय समीकरणों के लिहाज से भी उन्हें नेता बनाए जाने की संभावना नहीं थी।
रेवती रमण सिंह : मुलायम ने पुराने साथी रेवती रमण सिंह को सम्मान देने के लिए राज्यसभा भेजा है। उन्हें संसदीय दल का नेता बनाने से 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए बड़ा सामाजिक संदेश नहीं जाता। बुजुर्ग और अपेक्षाकृत कम सक्रिय होना भी उनके पक्ष में नहीं था।
रामगोपाल की वापसी से शिवपाल समर्थकों को झटका
रामगोपाल को पार्टी और सभी पदों पर वापसी लिए जाने से अखिलेश यादव खेमे में खुशी है। इस फैसले को शिवपाल समर्थकों के लिए झटका माना जा रहा है। मुलायम के कुनबे में विवाद की शुरुआत शिवपाल और रामगोपाल के रिश्तों में तल्खी से हुई है। पारिवारिक समीकरण के अनुसार अखिलेश के साथ रामगोपाल खड़े हैं तो शिवपाल पर मुलायम का हाथ माना जाता है।
शिवपाल और रामगोपाल के रिश्ते पहले से ही बहुत मधुर नहीं है, लेकिन अन्य कारणों के साथ ही मौजूदा विवाद की शुरुआत मैनपुरी में जमीन पर कब्जों व अवैध कारोबार के आरोपों से हुई। बकौल शिवपाल, एमएलसी अरविंद प्रताप यादव और विधायक राजू के खिलाफ जमीनों पर कब्जे और गलत कामों की शिकायतें मिली थी। ये दोनों रामगोपाल के रिश्तेदार व नजदीकी माने जाते हैं।
मैनपुरी में ही शिवपाल ने पहली बार जमीन पर कब्जे करने वालों पर कार्रवाई न होने पर इस्तीफे की धमकी दी थी। यहीं से आरोप-प्रत्यारोप की शुरूआत हुई। इसकी चरम स्थिति 23 अक्तूबर को रामगोपाल के सपा से निष्कासन के रूप में सामने आई। उनका निष्कासन अखिलेश के लिए झटका था।
उन्होंने अखिलेश के पक्ष में लामबंदी की और कुछ मांगे उठाकर विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की थी। उन्हें राज्यसभा में नेता पद से हटाए जाने की चर्चा थी लेकिन उनकी पार्टी में वापसी हो गई। माना जा रहा है कि इससे अखिलेश पार्टी में मजबूत हुए हैं। सबसे बड़ा झटका खुद शिवपाल को लगा है। शिवपाल ने रामगोपाल और उनके नजदीकियों को ही निशाने पर लिया था। सपा मुखिया ने उनके हमले की धार को कुंद कर दिया है।
पहली चिट्ठी से प्रेस कांफ्रेंस तक : रामगोपाल के मुलायम पर हमले
रामगोपाल यादव ने 15 अक्तूबर को मुलायम को पहली चिट्टी लिखी और एक माह बाद 14 नवंबर को प्रेस कांफ्रेंस की। उन्होंने अखिलेश को निर्विवाद रूप से देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बताया। उनके निशाने पर मुलायम, शिवपाल यादव और नजदीकी रहे। उन पर तीखे वार भी किए...
1- नेताजी (मुलायम सिंह) एक बात याद रखें कि जो जनता समाजवादी पार्टी बनाने के लिए आपकी पूजा करती है, वही पार्टी के पतन के लिए आपको और केवल आपको दोषी ठहराएगी।
2- कुछ गिने-चुने लोगों की सलाह के कारण पार्टी काफी पीछे चली गई है। ये जो आपको सलाह दे रहे हैं, जनता की नजर में उनकी हैसियत शून्य हो चुकी है।
3- इतिहास बहुत निष्ठुर होता है, वह किसी को बख्शता नहीं है।
4- वे चाहते हैं, हर हाल में अखिलेश हारें। हमारी सोच पॉजिटिव है, उनकी निगेटिव।
5- मुख्यमंत्री के साथ वे लोग हैं, जिन्होंने पार्टी के लिए खून बहाया, अपमान सहा, उधर वे लोग है जिन्होंने हजारों करोड़ रुपये कमाये, व्याभिचार किया और सत्ता का दुरुपयोग किया।
रामगोपाल यादव पर शिवपाल के पांच बड़े वार
मुलायम ने सीदे तौर पर रामगोपाल को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने उनका निष्कासन शिवपाल यादव से कराया और हमला भी उन्हीं से कराया। शिवपाल ने रामगोपाल पर आरोपों की बौछार की। निष्कासन के वक्त भी उन पर गंभीर आरोप लगाए।
1- रामगोपाल सीबीआई जांच से खुद को, अपने पुत्र अक्षय यादव व पुत्र वधु को बचाने के लिए सपा के अस्तित्व को सांप्रदायिक ताकतों के हाथों गिरवी रखना चाहते हैं।
2- आपने (रामगोपाल ने) भ्रष्टाचारियों, दलालों, गलत काम करने वालों और जमीन कब्जाने वालों को संरक्षण दिया, अनुशासनहीन आचरण किया।
3- अपने षडयंत्रों को पूरा करने के लिए आप तीन बार भाजपा के बड़े नेता से गोपनीय तौर पर मिल चुके हैं।
4- बिहार चुनाव के दौरान सेकुलर व सोशलिस्ट गठबंधन को आपके षडयंत्र के कारण ही बिखरना पड़ा।
5- आपने सपा के फ्रंटल संगठनों को काफी कमजोर कर दिया। नेताजी की उदारता का दुरुपयोग करते हुए राष्ट्रीय राजनीति में सपा की छवि व विश्वसनीयता को कम किया है।