जीतने अवध का मैदान, चुनाव में उतरा आलाकमान
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मुल्क की सियासी फिजां में अवध ने हमेशा नए रंग भरे हैं और एक बार फिर वह अपनी इस भूमिका को देश की सबसे बड़ी पंचायत के चुनाव में निभाने को तैयार है।
खास बात यह है कि देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष इसी क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली से तो लखनऊ से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के राष्ट्रीय अध्यक्षों के लिए अवध क्षेत्र के तहत आने वाली 17 लोकसभा सीटों को लेकर प्रतिष्ठा दांव पर है।
उलटफेर का रहा है मामला
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन क्षेत्रों की 17 सीटों में से 10 पर जीत दर्ज कर न सिर्फ भाजपा को बड़ा झटका दिया था बल्कि सपा और बसपा से भी कई सीटें हथियाईं थीं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 2014 की सियासी जंग में फतेह का झंडा कौन बुलंद करता है।
पिछली बार अवध क्षेत्र में मुंह की खाने वाली भाजपा ने शायद यही सोचकर इन 17 सीटों पर अपनी नजरें गड़ा रखी हैं।
राजनाथ सिंह के लखनऊ से चुनाव लड़ने के पीछे एक रणनीति यह भी है कि किसी भी तरह से इन अहम सीटों पर कांग्रेस को पिछली बार मिली सफलता को दोहराने से हर हाल में रोका जाए।
2009 में भाजपा को यहां से केवल एक सीट लखनऊ पर ही कामयाबी मिल सकी थी जबकि 2004 में उसे दो और 1999 में चार सीटें प्राप्त हुई थीं।
नहीं रहा अच्छा सपा और बसपा का पिछला रिकॉर्ड
जहां तक सपा और बसपा की बात है तो इस क्षेत्र में पिछला लोकसभा चुनाव इन दोनों पार्टियों के लिहाज से अच्छा नहीं रहा।
2009 में सपा और बसपा को तीन-तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा था जबकि 2004 में सपा को पांच व बसपा को सात सीटें मिली थीं।
हालांकि अंबेडकरनगर में हुए उपचुनाव में यह सीट बसपा केपाले से निकलकर सपा के पाले में चली गई।
1999 में सपा को छह और बसपा को तीन सीटें मिलीं जबकि एक सीट हरदोई से लोकतांत्रिक कांग्रेस के पाले में गई।
अवध क्षेत्र में धौरहरा सीट 2009 से जोड़ी गई जहां से कांग्रेस के जितिन प्रसाद ने जीत दर्ज की। यह सीट इससे पहले अस्तित्व में नहीं थी।
खुद को मजबूत करने की कवायद
मंदिर आंदोलन से सत्ता तक पहुंचने वाली भाजपा जब अपने ही गढ़ में कमजोर हुई तो उससे केंद्र की बागडोर भी छूट गई।
इसका नतीजा यह हुआ कि अवध क्षेत्र में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा हाशिए पर आ गई और केवल एक सीट से ही उसे संतोष करना पड़ा।
आंकड़ें भी बताते हैं कि 1999 में जब भाजपा यहां से चार और कांग्रेस ने दो सीटें जीतीं तो केंद्र की सत्ता की चाभी भी भाजपा के हाथ आई लेकिन जब इस क्षेत्र में भाजपा कमजोर हुई तो उससे सत्ता भी दूर हो गई।
इसका परिणाम भाजपा को 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला।