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रायबरेली सीट: क्या पहले जैसे नहीं रहे समीकरण?, भाजपा ने की व्यूह रचना, इसलिए भी ठिठका गांधी परिवार

Sun, 31 Mar 2024 08:57 AM IST
रोहित मिश्र मनोज ओझा, अमर उजाला, रायबरेली
मनोज ओझा, अमर उजाला, रायबरेली Published by: रोहित मिश्र Updated Sun, 31 Mar 2024 08:57 AM IST
सार

Rae Bareli Lok Sabha seat: रायबरेली सीट गांधी परिवार के लिए पहले जैसी नहीं रही। ऐसा पहली बार हुआ है कि कांग्रेस अपने गढ़ की सीट रायबरेली पर अब तक प्रत्याशी का चयन नहीं कर पाई है। जानिए इसकी वजहें। 

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Rae Bareli seat: Equations are not the same as before, BJP made a strategy, that's why Gandhi family got shock
Rae Bareli Lok Sabha seat - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चुनावी पन्नों को पलटें तो रायबरेली और कांग्रेस का गहरा जुड़ाव दिखता है। कई ऐसे मौके आते हैं जो रोमांचित भी करते हैं, लेकिन 72 वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है जब कांग्रेस अपने ही गढ़ में प्रत्याशी तय नहीं कर पा रही है। इस बार पार्टी ठिठकी है। इसके वाजिब कारण हैं और समीकरण भी। पहले राज्यमंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने कांग्रेस का साथ ही नहीं छोड़ा, बल्कि सोनिया के खिलाफ चुनाव भी लड़ा। बाद में कांग्रेस के साथ रहीं सदर विधायक अदिति सिंह ने भाजपा के टिकट पर पिछला विधानसभा चुनाव जीता। सोनिया गांधी के चुनाव में खुला समर्थन करने वाले पूर्व मंत्री व विधायक डॉ. मनोज कुमार पांडेय का भाजपा से जुड़ना और बढ़ता कद कांग्रेस के लिए इस बार किसी चुनौती से कम नहीं है। ऊंचाहार के साथ ही जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों में पकड़ रखने वाले मनोज से दूरियां कहीं न कहीं कांग्रेस को परेशान कर रही हैं।

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भाजपा : मजबूत व्यूह रचना
अमेठी में कांग्रेस का दुर्ग ढहाने के बाद इस बार भाजपा ने रायबरेली में मजबूत व्यूह रचना की है। गांधी परिवार के लिए प्रदेश में सुरक्षित मानी जाने वाली इस सीट के समीकरण वर्ष 2019 के चुनाव जैसे कतई नहीं हैं। रायबरेली अब श्रद्धाभाव से निकल रही है। दिनेश और अदिति के बाद मनोज पांडेय के बदले रुख से कांग्रेस चिंतित है। वे सपा में जरूर थे, लेकिन गांधी परिवार के खिलाफ सपा प्रत्याशी नहीं उतारती थी। इसका फायदा कांग्रेस को मिलता था।
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 असल में मनोज ने ऊंचाहार विधानसभा के साथ ही सदर व अन्य क्षेत्रों में ब्राह्मणों के साथ ही दूसरे वोटरों को कांग्रेस से जोड़ने का काम किया, लेकिन चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का यह मजबूत सहयोगी छिटक गया है। ऐसे में रायबरेली की जनता भी सवाल कर रही है कि इतने वर्षों में कांग्रेस से उन्हें मिला क्या? हां, एनटीपीसी, एम्स, रेल कोच फैक्ट्री, निफ्ट की सौगात तो जरूर मिली। पर, इंदिरा गांधी के समय लगे अधिकतर उद्योग बंद हो गए हैं। आईटीआई की भी हालत दयनीय है। बाईपास का भी समाधान नहीं हो सका।
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यूं ही कांग्रेस नहीं गंवाएगी प्रदेश की इकलौती सीट
प्रदेश में इकलौती   बची रायबरेली संसदीय सीट को यूं ही कांग्रेस गंवाने वाली नहीं है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी को लेकर एक दूसरे का मुंह ताक रहे हैं। जिले के कांग्रेसियों में अब भी प्रियंका के मैदान में उतरने की आस नहीं टूटी है। यह तो तय है कि कांग्रेस-सपा गठबंधन और भाजपा प्रत्याशी के बीच रोमांचक मुकाबला होगा।

लगातार गिरता गया कांग्रेस का मत प्रतिशत

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रायबरेली में सोनिया गांधी - फोटो : अमर उजाला
वर्ष : 2009
सोनिया गांधी कांग्रेस- 72.23 प्रतिशत
आर एस कुशवाहा- बसपा 16.40 प्रतिशत
आरबी सिंह भाजपा 3.82 प्रतिशत

2014
सोनिया गांधी कांग्रेस 63.80 प्रतिशत
अजय अग्रवाल भाजपा 21.05 प्रतिशत

2019
सोनिया गांधी कांग्रेस 55.80 प्रतिशत
दिनेश प्रताप सिंह भाजपा 38.36प्रतिशत 

जिले की पांच में से चार सीटों पर सपा के विधायक

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अखिलेश यादव और राहुल गांधी - फोटो : अमर उजाला
 संसदीय क्षेत्र रायबरेली की पांच विधानसभाओं में बछरावां से श्यामसुंदर, हरिचंदपुर से राहुल राजपूत, सरेनी से देवेंद्र प्रताप सिंह व ऊंचाहार से मनोज पांडेय ने सपा के टिकट पर जीत हासिल की है। बस रायबरेली विधानसभा से ही भाजपा की अदिति सिंह जीती हैं। रायबरेली हमेशा सुर्खियों में रही है। 1967 और 1971 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विजय पताका फहराया, लेकिन 1977 में राज नारायण ने कांग्रेस का यह किला ढहा दिया था।

इंदिरा गांधी ने जमाई थीं मजबूत जड़ें

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भाषण देतीं इंदिरा गांधी - फोटो : फाइल फोटो

पहले आम चुनाव में जब सन 1952 में फिरोज गांधी रायबरेली से चुनाव मैदान में उतरे तो इस सीट को देश में वह पहचान नहीं मिली थी। कारण फिरोज गांधी के लिए रायबरेली राजनीतिक जमीन से अधिक उनकी कर्मस्थली थी। वहीं जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का पूरा ध्यान इलाहाबाद और फूलपुर लोकसभा सीट पर रहता था। फिरोज गांधी के निधन के बाद 1967 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली को अपनी राजनीतिक जमीन बनाई और उसके बाद यह सीट गांधी परिवार की विरासत के साथ देश की सबसे प्रतिष्ठित लोकसभा सीट बन गई। यहां के चुनाव नतीजे के साथ मुकाबले को लेकर हर किसी की निगाह रहने लगी

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