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झील व तालाबों के संरक्षण से 30 फीसदी सुधर जाएगा भूगर्भ जलस्तर
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राजधानी में कभी 12563 तालाब थे। इनसे भूगर्भ जल रीचार्ज होता था। इसी भूगर्भ से गोमती नदी को पानी मिलता था। अब 70 प्रतिशत से अधिक तालाब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी तालाबों व झीलों का संरक्षण अगले पांच साल तक कर लिया जाए तो करीब भूगर्भ जलस्तर की गिरावट 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है।
यानी, जो औसत गिरावट अभी एक मीटर तक सालाना है। उसे घटाकर 70 सेमी किया जा सकता है। इससे नदी में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
बीबीएयू के प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. वैंकटेश दत्ता का कहना है कि भूगर्भ जल प्रबंधन के लिए ड्राफ्ट तैयार करते समय इस पर काम किया गया।
गोमती नदी जैसे रिवर सिस्टम में प्रवाह बनाए रखने के लिए भूगर्भ जल स्तर बना रहना बेहद जरूरी है। इसे विस्तृत रूप में देखें तो झीलों और तालाबों को प्रदूषण मुक्त व उनके पुराने स्वरूप में लाने पर हम गोमती नदी को उसके पुराने स्वरूप में ला पाएंगे।
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तालाब और झील में बारिश का पानी इकट्ठा होना चाहिए। इससे प्राकृतिक भूगर्भ जल रीचार्ज सिस्टम तैयार होता है। भूगर्भ जल का संग्रहण बढ़ेगा तो नदी को भी पूरे साल पानी मिलता रहेगा। सीधे तौर पर आम जन ही इससे लाभान्वित होगा।
संरक्षण के नाम पर पक्का निर्माण उचित नहीं
एलडीए के मुख्य अभियंता इंदुशेखर सिंह का कहना है कि झील और तालाबों के विकास के नाम पर पक्के निर्माण कराने का तरीका उचित नहीं है। झीलों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में ही वापस लाकर संरक्षित करना होगा। फोटो-रेमेडिएशन जैसी तकनीक में धूप और प्राकृतिक तरीकों से पानी को साफ करने का काम होता है। यहां सौर ऊ र्जा का उपयोग होना चाहिए। यदि निर्माण करना ही हो तो ऐसे करें कि तालाब, झील का उपयोग प्रभावित न हो।
कचरा डालकर पाटी जा रहीं झीलें
झीलों, तालाब के संरक्षण की जगह उनको कूड़ा और मिट्टी डालकर पाटा जा रहा है। ऐशबाग की जमुना झील का प्रकरण काफी चर्चा में रह चुका है। यहां आसपास की कॉलोनियों का कूड़ा डंप कर झील को मृतप्राय किया जा रहा है। वहीं मिट्टी डालकर झील को पाटकर वहां पक्के मकान बनाए जा रहे हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी तालाबों व झीलों का संरक्षण अगले पांच साल तक कर लिया जाए तो करीब भूगर्भ जलस्तर की गिरावट 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है।
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यानी, जो औसत गिरावट अभी एक मीटर तक सालाना है। उसे घटाकर 70 सेमी किया जा सकता है। इससे नदी में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
बीबीएयू के प्रोफेसर और पर्यावरणविद डॉ. वैंकटेश दत्ता का कहना है कि भूगर्भ जल प्रबंधन के लिए ड्राफ्ट तैयार करते समय इस पर काम किया गया।
गोमती नदी जैसे रिवर सिस्टम में प्रवाह बनाए रखने के लिए भूगर्भ जल स्तर बना रहना बेहद जरूरी है। इसे विस्तृत रूप में देखें तो झीलों और तालाबों को प्रदूषण मुक्त व उनके पुराने स्वरूप में लाने पर हम गोमती नदी को उसके पुराने स्वरूप में ला पाएंगे।
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तालाब और झील में बारिश का पानी इकट्ठा होना चाहिए। इससे प्राकृतिक भूगर्भ जल रीचार्ज सिस्टम तैयार होता है। भूगर्भ जल का संग्रहण बढ़ेगा तो नदी को भी पूरे साल पानी मिलता रहेगा। सीधे तौर पर आम जन ही इससे लाभान्वित होगा।
संरक्षण के नाम पर पक्का निर्माण उचित नहीं
एलडीए के मुख्य अभियंता इंदुशेखर सिंह का कहना है कि झील और तालाबों के विकास के नाम पर पक्के निर्माण कराने का तरीका उचित नहीं है। झीलों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में ही वापस लाकर संरक्षित करना होगा। फोटो-रेमेडिएशन जैसी तकनीक में धूप और प्राकृतिक तरीकों से पानी को साफ करने का काम होता है। यहां सौर ऊ र्जा का उपयोग होना चाहिए। यदि निर्माण करना ही हो तो ऐसे करें कि तालाब, झील का उपयोग प्रभावित न हो।
कचरा डालकर पाटी जा रहीं झीलें
झीलों, तालाब के संरक्षण की जगह उनको कूड़ा और मिट्टी डालकर पाटा जा रहा है। ऐशबाग की जमुना झील का प्रकरण काफी चर्चा में रह चुका है। यहां आसपास की कॉलोनियों का कूड़ा डंप कर झील को मृतप्राय किया जा रहा है। वहीं मिट्टी डालकर झील को पाटकर वहां पक्के मकान बनाए जा रहे हैं।