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स्पेशल कवरेज: अतीत को भूल जाना चाहती है अयोध्या

Sun, 06 Dec 2015 07:31 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, अयोध्या
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, अयोध्या Updated Sun, 06 Dec 2015 07:31 PM IST
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Present condition of Ayodhya.

संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर सियासत में भले ही हलचल हो, लेकिन न तो सरयू की धारा में कोई उथल-पुथल दिख रही है, न ही इस ऐतिहासिक नदी के किनारे रहने वाले साकेत वासियों में।

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कारसेवक पुरम में भले ही 6 दिसंबर को याद करने के लिए

सम्मेलन की तैयारी चल रही हो या इस मामले के एक पक्षकार हाजी महबूब ने देश के सभी मुस्लिम नेताओं, विद्वानों और प्रमुख लोगों को अयोध्या आने का न्यौता भेज रखा हो, पर अवध की हाट के रोज जैसे ही ठाट दिख रहे हैं। बिल्कुल निश्चिंत लोग। घाटों पर आम दिनों जैसी ही चहल-पहल। मंदिरों में घंटा-घड़ियाल तो मस्जिदों से अजान की आने वाली आवाज चीख-चीखकर मानों यही कह रही हो कि हम अब याद भी नहीं करना चाहते 90 और 92 के दौर को।
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तेईस साल गुजर गए। न श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बन पाया और न बाबरी मस्जिद का फिर से तीमार। कुछ नहीं बदला। न सरयू की धारा बदली और न वह नया घाट वाला पुल जिस पर 30 अक्तूबर और दो नवंबर 1990 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनाने की इच्छा लेकर आए लोगों व सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष में भगदड़ मची थी।
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अगर बदला है तो कुछ अयोध्या का माहौल और इस आंदोलन के प्रमुख किरदारों की सक्रियता। ऐसा लगता है कि समय के चक्र के साथ यहां के लोगों ने खुद को बदल लिया या चलना सीख लिया है। वजह बाहरी लोगों द्वारा छले जाना हो या अपने-अपने लोगों के बयानों का हकीकत में तब्दील न होते देख पाना।

शायद, यही वजह है कि संघ के मुखिया मोहन भागवत का मंदिर निर्माण के लिए तैयार रहने का आह्वान राज्यसभा को भले ही थोड़ी देर स्थगित करा लेता हो, लेकिन अयोध्या इस बयान को तवज्जो देना भी जरूरी नहीं समझती। हिंदू या मुसलमान, अयोध्या का वासी जवाब सिर्फ एक देता है, ‘हमको-हमारे हाल पर छोड़ दो। भाईचारे और प्रेम से रहने दो।’ उड़ीसा के राउरकेला से आए मो. अय्यूब कहते हैं, ‘अयोध्या अच्छी है। यहां के लोग अच्छे हैं पर, सियासत खराब है।’

‘उन्हें मंदिर निर्माण करने से रोका किसने है'

Present condition of Ayodhya.

अयोध्या वास्तव में छह दिसंबर, 1992 को भूल जाना चाहती है। तुलसी उद्यान के पास कपड़ों की सिलाई का काम करने वाले मो. इस्लाम तो पूछ बैठते हैं, ‘कौन सा छह दिसंबर...? हम उस काले दिन को भूल चुके हैं।’ तब एक क्षण के लिए निरुत्तर सा खड़ा रह जाना पड़ता है। कहता हूं, ‘मोहन भागवत ने मंदिर निर्माण की तैयारी की बात कही है।’

मो. इस्लाम के पास खड़े एक बुजुर्गवार हंसने लगते हैं। नाम तो नहीं बताते, लेकिन कहते हैं, ‘यहां कुछ नहीं होने वाला।’ मो. इस्लाम कहते हैं, ‘उन्हें मंदिर निर्माण करने से रोका किसने है। कम से कम किसी मुसलमान ने तो नहीं रोका। राम यहां पैदा हुए हैं तो कहीं न कहीं तो जन्मभूमि होगी ही। पर, जब यहां के हिंदू भाई भी भागवत के बयान को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं तो हम क्यों ले।’

कुछ नहीं बदलने वाला

शाम का धुंधलका छा चुका है। मैं सरयू तट पर पहुंचता हूं। गोरखपुर को जोड़ने वाले नया घाट के पास बने पुराने पुल के एक तरफ सरयू नदी की आरती व महाआरती की तैयारी चल रही है। रोहित जैसे नौजवान आरती दानियों को साफ कर रहे हैं। दूसरी तरफ, तमाम नश्वर शरीर को अग्नि के माध्यम से साकेत में अनंतकाल तक वास के लिए भेजने की सच्चाई बताने वाली चिताएं जल रही हैं। पर, यहां खड़े लोग पुरानी बातों को या तो भूल चुके  हैं अथवा भुलाने की कोशिश कर रहे हैं।

ये लोग चाहते भी नहीं कि नई पीढ़ी इस 23 साल पुराने घटनाक्रम को जाने और समझे। तभी तो भागवत का ताजा बयान यहां किसी को याद भी नहीं है। बुंदेलखंड से आए बृजमोहन कहते हैं, ‘तीन दिन से यहां एक धर्मशाला में रुका हूं। सात को जाऊंगा। अयोध्या रोज जैसी ही है। कोई बदलाव नहीं और लगता भी नहीं कि छह तारीख को कुछ बदलेगा।’

'इस तरह के बयान सुनते-सुनते बूढ़ा हो गया हूं'

Present condition of Ayodhya.

बस्ती के पास एक गांव से अपने किसी आत्मीय का अंतिम संस्कार करने आए 27 साल के राजू से 6 दिसंबर और अयोध्या का रिश्ता व भागवत का बयान जानने की कोशिश करता हूं। बेसाख्ता जवाब, ‘हमें नहीं मालूम।’ पास ही खड़े 60-65 साल के रामखेलावन कहते हैं, ‘कब तक याद रखा जाए।’ आरती की तैयारी करा रहे सुरेश मणि त्रिपाठी कहते हैं, ‘इस तरह के बयान सुनते-सुनते बुढ़ा गया। हमें तो नहीं लगता कि अब मंदिर बनेगा। रही बात भागवत की तो अभी तक तो कुछ असर दिख नहीं रहा।’

नया घाट से गोलाघाट स्थित सियाकिशोरी शरण दास के स्थान की तरफ बढ़ता हूं। रास्ते में एक छोटी सी दुकान के सहारे घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचने की फिक्र में जुटी 30-35 साल की इंद्रासनी और उससे थोड़ी दूर पर खड़े तकरीबन 20 वर्षीय मो. अहमद से इस संबंध में जानना चाहता हूं। दोनों का एक  जैसा जवाब, ‘पता नहीं।

वैसे आप पूछ काहे रहे हो?’ सबसे ताज्जुब तो तब होता है जब मंदिर आंदोलन से जुड़े और विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य व सद्गुरु सदन के महंत सियाकिशोरी शरण के यहां पहुंचता हूं। इसी आश्रम में रहकर पढ़ाई कर रहे 15-16 साल का अमरेश बताता हैं कि गुरुजी बाहर गए हैं। छह दिसंबर के बारे में कहता है, ‘हमें नहीं पता। वैसे इसके बारे में आप पूछ क्यों रहे हैं।’

पक्षकारों को भी कम चिंता नहीं
कारसेवक पुरम में सुबह विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा और मंदिर आंदोलन से जुड़े इस स्थान की व्यवस्था देख रहे वीरेन्द्र की कही गई यह बात याद आ जाती है, ‘युवा पीढ़ी को मंदिर आंदोलन की जानकारी देने के लिए छपवाई गई पुस्तक की काफी डिमांड है।’

हालांकि ये दोनों जब इसकी वजह बताते हैं, ‘प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले युवाओं की तरफ से बढ़ रही इस पुस्तक की डिमांड इस प्रचार को गलत साबित करती है कि युवा पीढ़ी को अपने ‘कॅरिअर’ की चिंता है न कि मंदिर निर्माण की’ तो बेचैनी साफ दिख जाती है।

इस मुद्दे में पक्षकार हाशिम अंसारी भी यह बात कहें, ‘नौजवान क्या करेगा, यह वह जानें। मैं तो अपने बच्चों से यही कहता हूं कि वह पढ़ाएं भले न, लेकिन अपनी आगे की पीढ़ी प्यार-मोहब्बत से रहना जरूर सिखाएं’ तो साफ लग जाता है कि नौजवानों के दिमाग से गायब हो रही मंदिर-मस्जिद की याद कहीं न कहीं इस मामले के प्रमुख किरदारों के दिलों में हलचल जरूर मचाए है।’

ये हाल है अयोध्या के बाजारों का

Present condition of Ayodhya.

अयोध्या के बाजारों में 6 दिसंबर को लेकर कोई हलचल नहीं है, उन स्थानों पर जो कभी इस लड़ाई के केंद्र हुआ करते थे। इनके भीतर अगर कोई चिंता दिख रही है तो सिर्फ इस बात की कि बाहर से अयोध्या घूमने आए लोगों में ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी-अपनी दुकानों पर खींचकर बिक्री कैसे बढ़ा ली जाए। कारसेवकपुरम में कोई हलचल ही नहीं है। पर, मंदिर के लिए कसौटी के खंभों की नक्काशी के लिए बनाई गई कार्यशाला में भी चहल-पहल गायब ही दिखी।

सिर्फ एक-दो लोग दिखे, वे भी तराशे गए पत्थरों के साथ सेल्फी खिंचवाते हुए। इसके अलावा सब कुछ शांत। लगभग 23 साल से श्री रामजन्मभूमि मंदिर में लगने को तैयार कई पत्थरों पर काई जम चुकी है। छेनी-हथौड़ियों की आवाज तो सुनाई देती है, लेकिन पहले जैसी खनक व उत्साह गायब। ऐसा लगता है कि सब कुछ होने के लिए ही हो रहा है। जहां कभी कारीगरों की भीड़ दिखती थी, वहां कुल जमा तीन लोग पत्थरों में नक्काशी कर रहे हैं। वह भी ‘करने के लिए करने जैसी स्टाइल में।’

बाहर निकलने को आगे बढ़ता हूं। इस मामले से जुडे़ हाशिम अंसारी के घर पर भी सन्नाटा ही है तो राम जन्मभूमि थाना के पास स्थित हाजी महबूब के घर पर भी कोई भीड़भाड़ नहीं। टेढ़ी बाजार के पास सुरक्षा बलों की टुकड़ी मार्च करती दिखती है। जनेऊ और चंदन बेचने वाले रामचंद्र से सुरक्षा बलों की सक्रियता, भागवत के बयान और 6 दिसंबर को लेकर सवाल करता हूं। जवाब मिलता है, ‘सब रसम है भैया रसम। कोई हम अयोध्या वालों से पूछे तब तो समझे सच को।’

'मंदिर बना लो। हमे भी उस जगह मस्जिद नहीं बनानी'

Present condition of Ayodhya.

हाजी महबूब कहते हैं, ‘बाहर वाले अयोध्या को क्या समझें। जब देखो, बोल पड़ते हैं। भागवत की बात क्या कहूं। एक जनाब कोई कुरैशी हैं, जिन्होंने लिख डाला कि अयोध्या है ही नहीं। मिलें तो बताऊं कि अयोध्या है या नहीं। जानते कुछ नहीं, बोल पड़ते हैं। यही लोग सारे झगड़े की जड़ हैं। ये हट जाएं तो एक दिन में मसला हल हो जाएगा। बाहर वालों की बातों पर अगर समझोगे तो समझ चुके अयोध्या को। कोई यह समझना ही नहीं चाहता कि यहां कोई झगड़ा नहीं है। कोई मुसलमान यह नहीं कहता है कि यहां भगवान राम नहीं पैदा हुए। जब यह अयोध्या है तो यहीं पैदा हुए हैं। हम तो सिर्फ यही कहते हैं, ‘विवादित जगह छोड़कर मंदिर बना लो। हमे भी उस जगह मस्जिद नहीं बनानी। अयोध्या वाले सहमत हैं, लेकिन बाहर वाले बोल रहे हैं कि उन्हें उसी जगह मंदिर बनाना है।’

वह हंसते हुए कहते हैं कि हमने भी तमाम मुस्लिम लीडरान को अयोध्या बुलाया है। पर, हम जानते हैं कि कोई नहीं आने वाला। आखिर जो मजा है बाहर से बोलने में है वह यहां आने में नहीं।’

वापस लौटते कार्यशाला के पास छत्तीसगढ़ से आए लोगों को देखकर फिर रुक जाता हूं। जानना चाहता हूं कि कहीं ये लोग 6 दिसंबर के सिलसिले में तो नहीं आए हैं। रायपुर के रमेश कहते हैं कि वह तो सरयू नहाने व हनुमान गढ़ी व कनक भवन के दर्शन करने आए थे। यहां भी चले आए पत्थरों को देखने।

ट्रेन पर अखबार में भागवत का बयान पढ़ा जरूर था, पर यहां उस तरह की कोई हलचल नहीं लगी। ऐसा लगता है कि यहां सब कुछ आम दिनों जैसा ही है।

कार्यशाला में वह जगह दिमाग में कौंध जाती है, जहां मंदिर आंदोलन में पुलिस की गोलियों का शिकार कोठारी बंधुओं के चित्र के बगल अब अशोक सिंहल का चित्र लग गया है। अयोध्या को लेकर सारे सवालों का जवाब मिल जाता है। शायद 1990 से 1992 तक का घटनाक्रम अतीत था जिसका 2015 से कोई लेना-देना नहीं है।’

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