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सिम कार्ड की तरह मनचाही कंपनी से खरीद सकेंगे बिजली

Sat, 13 Dec 2014 11:15 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 13 Dec 2014 11:15 AM IST
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Power to be in hands of private companies.

टेलीफोन व मोबाइल की तर्ज पर अब एक ही इलाके में कई कंपनियां बिजली आपूर्ति कर सकेंगी। ऐसे में उपभोक्ता मनचाही कंपनी से बिजली खरीद सकेंगे। संतुष्ट न होने पर वे आपूर्तिकर्ता कंपनी को बदल भी सकेंगे।

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दरअसल, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार बिजली वितरण और आपूर्ति को अलग करने जा रही है। घर के बाहर लगे पोल तक बिजली पहुंचाने की जिम्मेदारी वितरण कंपनी पर होगी जबकि पोल से घर तक की आपूर्ति का जिम्मा दूसरी कंपनी का होगा।
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इसके लिए सरकार विद्युत अधिनियम 2003 में संशोधन करने जा रही है। संशोधन के मसौदे को कैबिनेट ने हरी झंडी दे दी है। संसद के चालू सत्र में इस संशोधन का प्रस्ताव पेश किया जाएगा। संशोधन को मंजूरी मिलते ही बिजली आपूर्ति के क्षेत्र भी निजी कंपनियों के आने का रास्ता साफ हो जाएगा।
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केंद्र सरकार अब बिजली आपूर्ति के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए आपूर्ति व्यवस्था को वितरण से अलग करके ‘मल्टीपल लाइसेंस’ का प्रावधान करने जा रही है। इसके बाद एक ही इलाके में कई-कई आपूर्तिकर्ता मैदान में आ सकेंगे।

प्रतिस्पर्धा से मिलेगी सस्ती बिजली

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इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा से लोगों को सस्ती बिजली मिल सकेगी। दूसरी तरफ बिजली विशेषज्ञों का कहना है कि बिडिंग के जरिये आपूर्ति के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे। ऐसे में आम उपभोक्ताओं को बिजली की ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।

सूत्रों के अनुसार, अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन के तहत घरों के बाहर लगे खंभों को वितरण की श्रेणी में रखा गया है जबकि उसके आगे घर तक बिजली पहुंचाने, मीटर लगाने, रीडिंग लेने तथा बिलों की वसूली को आपूर्ति की श्रेणी में रखा गया है।

इस व्यवस्था को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है। पहले चरण में निजी कंपनियों को आपूर्ति का लाइसेंस तो जारी किया जाएगा लेकिन मालिकाना हक (ओनरशिप) वितरण कंपनी के पास ही रहेगा।

दूसरे चरण में ओनरशिप खत्म करके मल्टीपल लाइसेंसियों को ही पूरी जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी। वितरण कंपनियां मल्टीपल लाइसेंसियों पर नजर तो रखेंगी लेकिन उनके कामकाज में कोई दखलंदाजी नहीं कर सकेंगी।

यूपी में लागू करना नहीं होगा आसान

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केंद्र सरकार की इस पहल को यूपी में लागू करना आसान नहीं होगा। प्रदेश में 1.50 करोड़ से ज्यादा बिजली उपभोक्ता हैं जिनमें लगभग 40 फीसदी बिजली कंपनियों के लेजर पर ही नहीं हैं।

लिखा-पढ़ी में जो बिजली उपभोक्ता नहीं हैं, उन्हें इसके दायरे में कैसे लाया जाएगा? यह बड़ा सवाल है। दावा यह है कि इससे बिजली चोरी रुकेगी लेकिन तकनीकी रूप से देखा जाए तो बिजली चोरी खंभे से घर के बीच खींची जाने वाली केबल के  बजाय सीधे वितरण लाइन से होती है। बिजली क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीपल लाइसेंस के बाद भी यही स्थिति रहने वाली है।

नई व्यवस्था से वितरण कंपनियों की माली हालत और खराब होगी क्योंकि वितरण नेटवर्क जैसे लाइनों व सब स्टेशन का निर्माण तथा उपकरण लगाने आदि पर खर्च वे करेंगी और आपूर्तिकर्ता लाइसेंसी केवल घरों तक बिजली पहुंचाकर मुनाफा कमाएंगे।

यह है इस बदलाव का कारण

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इस पर ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे कहते हैं कि उदारीकरण के बाद पिछले दो दशक में बिजली वितरण कंपनियों का घाटा लगातार बढ़ रहा है। ज्यों-ज्यों इलाज किया, मर्ज और बढ़ता चला गया। पहला प्रयोग बिजली बोर्डों के विघटन का रहा।

उड़ीसा और दिल्ली में निजीकरण विफल रहा तो फ्रेंचाइजी का प्रयोग किया गया। यह भी असफल रहा। अब इस नए प्रयोग से सारा घाटा वितरण कंपनियों के मत्थे जाएगा और आपूर्तिकर्ता निजी कंपनियां बैठे-बिठाए मुनाफा कमाएंगी।

उपभोक्ताओं को भी बिजली महंगी मिलेगी। यह संशोधन किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

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