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UP: 2015 में ये बने रहे सुर्खियों के सरताज

Mon, 28 Dec 2015 04:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 28 Dec 2015 04:21 PM IST
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Popular personalities of UP in 2015.

इस साल कई चेहरों ने अपनी छाप छोड़ी। वक्त की रेत पर कुछ ऐसे निशां छोड़े, जो चर्चा में रहे। राज्यपाल की कहीं प्यार और कहीं वार की शैली तो आजम खां बनाम अमर सिंह खबरों में रहे। मुलायम सिंह यादव भी इसमें पीछे नहीं रहे।  कई ऐसे भी हैं जिनके हिस्से में सिर्फ विवाद ही आए तो कुछ ऐसे भी जिन्हें सम्मान और पहचान मिली।

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कुछ तो एक कदम आगे और दो कदम पीछे करने की आदत के कारण ही चर्चा में रहे। लोकसेवा आयोग जैसी संस्था से विवादों की विदाई हुई तो सत्ता से टकराव का दीदार भी। तो जीवटता की धनी अरुणिमा सिन्हा को मिले पद्मश्री सम्मान ने 'हौसलों को उड़ान' की बात को भी सच साबित किया।
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राज्यपाल राम नाईक : प्यार और वार

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्यार तो उनकी सरकार के फैसलों पर तेवरों की धार से वार को लेकर राज्यपाल राम नाईक चर्चा में रहे। प्रोटोकॉल व परंपरा से बाहर निकलकर मुख्यमंत्री को जन्मदिन बधाई देने उनके आवास पहुंचने वाले नाईक ने विधान परिषद में मनोनीत होने वाले नौ सदस्यों की सूची को सवालों में ऐसा उलझाया कि बमुश्किल चार नामों को ही सरकार मंजूरी दिला पाई।
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कई विधेयकों को रोककर तो कभी हिंदुस्तान के खून में 'भगवान राम का डीएनए है', और कभी यूपी में खराब कानून-व्यवस्था और उसमें सुधार की सलाह देकर भी राज्यपाल खबरों में रहे। लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सरकार की सिफारिश पर आपत्तियों से भी राज्यपाल चर्चा में रहे। सूबे में 'यादव राज' जैसे बयान ने भी उन्हें सुर्खियों में बनाए रखा।

वीरेंद्र सिंह : अधूरा रहा राजतिलक

Popular personalities of UP in 2015.

जब साल २०१५ की चर्चा होगी तो पूर्व न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह का अधूरा राजतिलक भी याद आएगा। अपनी ३९ साल की नौकरी में जस्टिस वीरेंद्र सिंह उतना चर्चा में नहीं रहे होंगे, जितना साल बीतते-बीतते आ गए।

सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करते हुए उनकी लोकायुक्त पद पर नियुक्ति कर दी। देश में ऐसा पहली बार हुआ।  पर, महज तीन दिनों में ऐसा उलट-फेर हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के ही निर्देश पर जस्टिस वीरेंद्र का सिंह राजतिलक नए साल तक के लिए टल गया।

रवींद्र सिंह यादव : मिला सिर्फ विवाद

पूर्व न्यायाधीश रवींद्र सिंह लोकायुक्त तो नहीं बन पाए, लेकिन विवादों में आकर चर्चाओं में जरूर बने रहे। लोकायुक्त की कुर्सी पर उनकी नियुक्ति की फाइल सरकार और राज्यपाल के बीच चार बार घूमी।

सरकार ने हर बार नए तर्कों से उनके चयन को जायज ठहराने की कोशिश की, तो राज्यपाल राम नाईक ने कभी सूबे के मुख्य न्यायाधीश के सहमत न होने का हवाला देकर तो कभी किसी और तथ्य से सरकार के तर्कों को खारिज कर दिया।

मुनव्वर राणा : इन्कार से इकरार

Popular personalities of UP in 2015.

2014 में उर्दू अकादमी की अध्यक्षी छोड़कर चर्चा में रहे उर्दू साहित्य की दुनिया के जाने-माने चेहरे मुनव्वर राणा इस साल साहित्य अकादमी सम्मान वापसी के तौर-तरीकों को लेकर खबरों में बने रहे।

दादरी के बिसाहड़ा गांव की घटना को लेकर साहित्यकारों के सम्मान वापसी अभियान को लेकर पहले तो उन्होंने कहा, 'जिन्हें अपनी कलम पर भरोसा नहीं वह सम्मान वापस कर रहे हैं। पर, कुछ ही दिन बाद दिल्ली में एक मुशायरे में पहुंचे राणा अचानक एक न्यूज चैनल के दफ्तर में प्रकट हो गए और सम्मान वापसी का 'लाइव' एलान कर दिया। पर, उनको लेकर चर्चा यहीं नहीं रुकी।

उन्होंने यह कहकर कि, पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात में अगर मेरी बात मान ली गई तो सम्मान वापस ले लूंगा, कहकर फिर सुर्खियों में आ गए। लखनऊ में एक प्रेस कॉंनफ्रेस में यह कहकर, 'मुझे पीएमओ से कॉल आया था। मैं कॉल उठा नहीं सका। मुझे बुलाया गया लेकिन मैं अकेले जाना नहीं चाहता।

पीएमओ दस साहित्यकारों को बुला ले तो मैं भी चला जाऊंगा' बात पर भी वह चर्चा रहे। अब चर्चा यह है कि उन्हें बुलावा आएगा भी या नहीं।

अरुणिमा सिन्हा : बुलंदियों का सफर

Popular personalities of UP in 2015.

२०११ में ट्रेन से फेंके  जाने की घटना में एक पैर गंवा चुकी अरुण्मिा सिन्हा को जज्बे और बहादुरी की मिसाल कायम करने के लिए बड़े नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से नवाजा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ अरुणिमा को सम्मानित किया बल्कि उनकी बहादुरी का उदाहरण देते हुए लड़कियों को हौसले से काम लेने की सलाह भी दी। अपनी जीवनी 'बार्न अगेन इन द माउंटेन' से भी अरुणिमा चर्चा में आई।

उतरते साल में अरुणिमा ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा के हाथों उन्नाव में 'शहीद चंद्रशेखर आजाद विकलांग खेल अकादमी एवं प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर' का शिलान्यास कराकर यह साबित कर दिया कि एक पैर की इस लड़की की एवरेस्ट फतह की कहानी महज संयोग नहीं, बल्कि साहस का ही नतीजा थी।

डॉ. रामदरश मिश्र : देर से पहचान
जाते साल ने आखिरकार ९१ वर्षीय प्रतिष्ठित साहित्यकार गोरखपुर के छोटे से गांव डुमरी के डॉ. रामदरश मिश्र को भी सुर्खियों में ला दिया। कविता, गजल, उपन्यास, संस्मरण, कहानी, ललित निबंध और आत्मकथाएं जैसी साहित्य के संसार की हर विधा में सिद्धहस्त डॉ. मिश्र को साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा हुई।

जिस दौर में पूरे देश में सहिष्णुता-असहिष्णुता का संघर्ष समाचार बन रहा हो, उसमें डॉ. मिश्र का साहित्य अकादमी सम्मान स्वीकारना तो चर्चा में रहेगा ही। उनका यह बयान कि सम्मान या पुरस्कार लौटाने वाले चर्चा में बने रहना चाहते हैं वाला उनका बयान सुर्खियों में रहा।

अनिल यादव : विवादों की विदाई

Popular personalities of UP in 2015.

न्यायालय के आदेश पर उ.प्र. लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव की आखिरकर आयोग से विदाई हो ही गई। उनके कार्यकाल में आयोग की साख पर पीसीएस परीक्षा का प्रश्नपत्र आउट होने का धब्बा लगा। विवादित कार्यशैली को लेकर ही सही,  सड़कों से सदन और न्यायालय तक अनिल यादव चर्चा में बने रहे।

विवाद तो उनके आयोग का अध्यक्ष बनने के साथ २०१३ से ही शुरू हो गए थे। पर, इसे और तूल मिला उनकी डिग्री फर्जी होने के आरोप से। उनके अध्यक्ष रहते कोई ऐसा परीक्षा परिणाम नहीं रहा जिस पर विवाद और हंगामा न हुआ हो।

२०११ की पीसीएस मुख्य परीक्षा और पीसीएस (जे) की प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम हो या २०१२ की पीसीएस परीक्षा की कापियां जल जाने का मामला, हर बार उनकी भूमिका पर अंगुलियां उठी।

गलत सवालों को सही मानकर एक जाति विशेष के लोगों को नंबर दिलाने के विवाद में वह घिरे तो यह भी सामने आया कि 20११, १२ और १३ की पीसीएस परीक्षा के साक्षात्कार में मनमाने नंबर देकर ८६ एसडीएम में सिर्फ एक जाति के ५६ लोगों को उन्होंने चयनित करा दिया गया।  पीसीएस ही नहीं लोअर सब ऑर्डिनेट परीक्षा भी बेदाग नहीं रह पाई।

अमिताभ ठाकुर : सत्ता से टकराव

Popular personalities of UP in 2015.

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर चर्चा में तो पहले से ही थे लेकिन इस साल उनके और सूबे की सत्ता के बीच टकराव खबरों में रहा।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के अमिताभ को फोन पर धमकाने के विवाद के साथ अखबारों की खबरों में अहमियत पाने वाले ठाकुर उस समय फिर खबरों का केंद्र बन गए जब वह सपा प्रमुख के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने हजरतगंज कोतवाली पहुंच गए।

डीजीपी के मुख्यालय पर धरना और फिर निलंबन से भी वे चर्चा में रहे। रही सही कसर पूरी कर दी सरकार की तरफ से शुरू कराई गई विजिलेंस जांच ने। इस जांच को लेकर हुआ विवाद भी समाचारों का हिस्सा बनता रहा।

आजम खां : खबरों में अंदाज

Popular personalities of UP in 2015.

लोग कुछ बोलकर चर्चा बटोरते हैं। पर, आजम खां हैं कि उनके अंदाज ही चर्चाओं में छाए रहते हैं। कभी रूठना तो तो कभी मान जाना, कभी सरकार के बचाव में दीवार की तरह आगे खड़े होकर तो कभी खुद निशाना साधकर वह चर्चा में रहे। पिछली बार मुलायम सिंह यादव का रामपुर में जन्मदिन मनाने को लेकर चर्चा में आए थे तो इस बार सैफई में 'झलक दिखला जा' जैसी हाजिरी को लेकर भी वह चर्चा में रहे।

राजभवन व राज्यपाल इस बार भी उनके निशाने पर आए बिना नहीं रहे। मुलायम को अपना महबूब नेता बताने वाले आजम मंत्रिपरिषद विस्तार में 'अपनों की कम पूछ' पर ऐसा रूठे कि उनके इस्तीफा तक दे देने की चर्चा पूरे सूबे में सुर्खियां बटोर ले गई।

बिसाहड़ा कांड पर संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ïठी लिखने का उनका एलान भी खबरों में छाया रहा। अमर सिंह की सपा में बढ़ती तवज्जो पर मुख्यमंत्री आवास पर रोजा इफ्तार में उनका गुपचुप से आना और वापस लौट जाना रोजा इफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तो उन्होंने खूब निशाना साधा।

साल जाते-जाते यह कहकर कि वह प्रधानमंत्री बने तो नेताजी को आपत्ति नहीं होगी, खुद को सपा के भीतर व बाहर फिर चर्चा में ला दिया। अमर सिंह को लेकर 'तूफान के साथ कूड़ा-करकट भी जाता है' बयान को लेकर भी आजम चर्चा में रहे।

मुलायम सिंह : रिश्तेदारी पर भारी राजनीति

Popular personalities of UP in 2015.

केंद्र में कांग्रेस थी तो मुलायम 'केंद्र सरकार बहुत पावर फुल होती है, उसके पास सीबीआई है जैसे बयान देकर चर्चा में रहे थे। इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 'मुलायम' रहने को लेकर खबरों में रहे।

बिहार चुनाव से पहले मोदी सरकार के खिलाफ विरोधी दलों को एकजुट करके महागठबंधन का खाका खींचने वाले मुलायम बिहार चुनाव में ऐन वक्त पर पैंतरा बदलकर चर्चा में आ गए।

समधी लालू प्रसाद यादव को लेकर मुलायम की बेफिक्री ने भी उनकी भावी भूमिका को लेकर चर्चाओं को खूब जन्म दिया। सहारनपुर में एक सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुलायम की भूमिका की तारीफ क्या कर दी, मुलायम की मोदी से गाढ़ी मोहब्बत फिर खासी चर्चा में आ गई।

सपाइयों को बेचैनी हुई तो धोबीपाट जैसा दांव लगाने में माहिर मुलायम ने यह कहकर, 'गैर की महफिल में अगर अपनी चर्चा हो तो दिक्कत क्या है' विरोधियों के आरोपों को हवा में उड़ा दिया।

पिता के रूप में पुत्र अखिलेश को समझाना तो पार्टी के मुखिया के रूप में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को डांटने की घटनाओं ने भी सपा मुखिया को पूरे साल चर्चा में बनाए रखा।

अमर सिंह : रहस्यों में राजनीति

Popular personalities of UP in 2015.

कभी सपा मुखिया मलायम सिंह यादव के साथ तो कभी सीएम अखिलेश यादव के साथ खड़े अमर सिंह पूरे साल खबरों में बने रहे। लगा कि अब वह दिन दूर नहीं कि अमर सपा में होंगे।

मुख्यमंत्री आवास पर एक कार्यक्रम में आए अमर सिंह को जब मुख्यमंत्री खुद हाथ पकड़कर मंच पर ले गए और सपा मुखिया की कुर्सी की बगल की कुर्सी पर बैठा दिया तो खबरें फिर गरम हुईं।

उतरते साल में सैफई में सपा मुखिया के जन्मदिन में पहुंचे अमर के हिस्से में ही मुलायम के हाथ का पहला केक आया। लगा कि मुलायम के अमर को केक खिलाने के बाद उनकी सपा में वापसी के कयास पर भी जल्द ही विराम लग जाएगा।

पर, दिसंबर में अमर ने यह कहकर कि वह मुलायम-अखिलेश के दल में भले न हों लेकिन दिल में बरकरार हैं, अपनी रहस्यपूर्ण राजनीति पर से परदा नहीं उठने दिया।

बंशीधर बौद्ध : चौकीदार से सरकार

Popular personalities of UP in 2015.

यह साल चौकीदार से सरकार बनने का गवाह भी बना। कभी साइकिल का पंक्चर बनाने का काम तो कभी एक कृषि फार्म पर चौकीदारी करने वाले बहराइच के बंशीधर बौद्ध के बारे में कौन जानता था कि झोपड़ी में रहने वाला यह शख्स इस साल भी बुलंदियों की तरफ एक और कदम बढ़ाने में कामयाब होगा।

पिछली साल बलहा सीट से भारी मतों से जीत ने उन्हें चर्चा दिलाई तो इस बार मंत्रिपरिषद में हिस्सेदारी ने उन्हें चर्चा में ला दिया।

झोपड़ी में रहने वाले सीधे-साधे किसान से राज्यमंत्री का मुकाम हासिल कर उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि लोकतंत्र किसी को भी रंक से राजा और राजा से रंक बन सकता है।

मंत्री बनने के बावजूद उनकी झोपड़ी व खेतों में अपने हाथों जोताई चर्चा बने बिना नहीं रहती।

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