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कहां है हमारा हिस्सा!
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Fri, 30 May 2014 03:28 PM IST
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‘अरे, पैसे पेड़ पर उगते हैं क्या?’ भले ही यह कुछ अटपटा लगे लेकिन पेड़-पौधों वाले एक विभाग के मंत्री ने इसे सच साबित कर दिया है।
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हर महीने होने वाली समीक्षा बैठक में वे मातहतों को जल्द बजट खर्च करने की हिदायत देते हैं। जिन्होंने ज्यादा खर्च किया, उनकी पीठ थपथपाते हैं, जिसने कम, उसे फटकार लगाते हैं।
अफसर समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर माजरा क्या है? धीरे-धीरे समझ में आ गया। बैठक खत्म होने के फौरन बाद मंत्रीजी ज्यादा बजट खपा देने वाले अफसरों को बुलाकर पूछ बैठते हैं, भई, इतना खर्च कर दिया।
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मेरा भी तो इतना हिस्सा हुआ। कहां है मेरा हिस्सा? अफसर परेशान हैं कि पैसा तो योजना में खप गया, अब मंत्रीजी का हिस्सा कहां से लाएं।
अब हाल यह हो गया कि समीक्षा बैठक के लिए अफसर रिपोर्ट तैयार करने में यह ध्यान रखते हैं कि बजट खर्च कम से कम बताया जाए ताकि मंत्रीजी को हिस्सा देने की टेंशन तो न रहे।
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विभाग में चर्चा आम है कि रोपा गया पौधा बचे या न बचे, लेकिन मंत्रीजी के लिए हरियाली ही हरियाली है।